अयोध्या में सिर्फ दो लाख दिये ही नहीं जले, इसमें जोड़िये धीमे सुलग रहे लंपट लिबरल भी

कपटी कॉमरेडों का नया नैरेटिव देखें तो दो लाख दीयों और बारह हजार लीटर सरसों के तेल से अयोध्या की दीपावली की सजावट पर है. इस पर कई पाखंडी प्रगतिशीलों ने पुलिस के दिए जलाने में काम करवाने जैसी अफवाहें फ़ैलाने की भी कोशिश की. लोगों ने वहां भी पहचान लिया कि ये हुलिया-टोपी तो एन.सी.सी. की है! असत्य की पराजय भी हुई और अफवाहबाजों की पहचान भी.

भारतीय त्योहारों को गौर से देखिये तो समझ आएगा कि कैसे ये समाज से जुड़े हैं. दुर्गा पूजा से कुछ पहले से ही बाजारों में आपको कई छोटे व्यवसायी दिखने लगेंगे. इनके पास कोई दुकान-रेहड़ी, कोई ठेला जैसा कुछ नहीं होता. ये सड़क के किनारे प्लास्टिक शीट, कागज़ वगैरह बिछा कर बैठे होते हैं. इनका व्यापार भी कोई हजारों-लाखों का नहीं होता. इनके पास मिट्टी के दिए-बर्तन, बांस का बना सूप-डगरा, छोटे मोटे पूजा प्रसाधन, चूड़ी-टिकली-सिन्दूर जैसी चीज़ें होती हैं.

इन सबका व्यवसाय इन त्योहारों की वजह से ही होता है. पूजा का मौसम बीतने के बाद ये शहरों में भी नहीं दिखेंगे. ये आस पास के गाँव से आये हुए लोग होते हैं, जिनके लिए ये पूजा का समय खेती-मज़दूरी के अलावा थोड़ी आय कमा लेने का मौका होता है. ऐसे ही कई छोटे व्यवसायियों ने इस दिवाली पर पटाखे भी खरीदे होंगे. उनके पास साल भर के लिए कोई बिक्री का लाइसेंस या दुकान नहीं. हिन्दुओं के त्योहारों में अदालत के जबरन, असंवैधानिक रूप से टांग घुसाने के कारण ऐसे ही गरीब हिन्दुओं का नुकसान हुआ है.

जहाँ तक दीयों के अयोध्या में जलने का सवाल है, ये मिट्टी के दिए किसी फैक्ट्री में नहीं बनते. गरीब कुम्हारों के पास से उन्हें खरीदा गया होगा. जैसे आलू की फैक्ट्री नहीं होती, वैसे ही सरसों के तेल की भी फैक्ट्री नहीं होती. वो खेतों में उपजे सरसों से बनता है, और खेती आज भी भारत में चालीस से पचास फीसदी ग्रामीणों को रोजगार मुहैया करवाने वाला काम है. श्रम से कमा कर खाने देने के बदले इस तेल से गरीब के घर पूड़ी छनती कहने वाले, श्रमिकों को भिखारी क्यों बनाना चाहते हैं ?

असल में अशिक्षित, खेती के काम के अलग-अलग स्तर जैसे सरसों की सही मौसम में बुवाई से लेकर कटाई और तेल निकालने से लेकर इस प्रक्रिया में बचे उत्पाद के जानवरों के चारे में इस्तेमाल, बिक्री इत्यादि से अनभिज्ञ रखकर वो अगली पीढ़ी को कौशल विहीन करना चाहते हैं. कुम्हार का काम अगली पीढ़ी तक ना पहुंचे ताकि उनके फादरलैंड चीन से दिए, मिट्टी के खिलौने-मूर्तियाँ वगैरह भारत आकर बिक सकें. सबसे ख़ास बात कि जो कौशल विहीन गरीब अब अशिक्षित और भूखा बैठा होगा, उसे रोटी के बदले बन्दूक थमा कर वो हिन्दू से नास्तिक नक्सली आतंकी भी बना पायेंगे.

अखबार-समाचार चैनल और विश्वविद्यालयों पर कब्ज़ा जमा कर जो उन्होंने संचार या कहिये ब्रॉडकास्ट के माध्यमों पर कब्ज़ा जमाया था उसके सोशल मीडिया और इन्टरनेट के खुले माहौल में टूटने से उनका छटपटाना स्वाभाविक भी है. सौ साल की मेहनत से बना उनका किला पांच साल से कम में टूटता जो दिख रहा है! भारत के बहुसंख्यक समाज की 1000 से ज्यादा साल से किले की घेराबंदी और आक्रमण की आदत नहीं रही है. कम अभ्यास और बिना स्थापित नेतृत्व के डागयुद्ध (गुरिल्ला हमलों) में ऐसी कामयाबी काबिले तारीफ है.

दीपावली जीत कर लौटे श्री राम, लक्ष्मण और सीता के स्वागत का पर्व है तो ऐसे में मोर्चा दर मोर्चा फतह कर रहे छोटे-बड़े सभी शेर-लकड़बग्घों को भी बधाई बनती है. बाकी हिसाब सही-सही जोड़ा जाए, बारह हज़ार लीटर तेल में सिर्फ अयोध्या के दो लाख दिए नहीं जले. धीमे सुलग रहे लम्पट लिबरलों को भी जोड़ा जाए!

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