धैर्य का दीया जलाएं, न बुझने दें आशाओं की लौ

आज कुछ राहत है. हो भी क्यों न. फेसबुक पर अपने छोटे से राष्ट्रवादी समुदाय में मोदी को गरियाने वालों की बहुसंख्या होती दिख रही थी. सबकी अपनी-अपनी शिकायतें हैं. कोई जीएसटी से नाराज है तो कोई विमुद्रीकरण से, तो कोई पूछ रहा है कि मंदिर तो वहीं बनाओगे पर तारीख तो बताओ? ये देखो! कुछ भाई लोग तो दीपावली पर दिल्ली में पटाखा बैन का ठीकरा भी साहेब पर फोड़ने लगे हैं.

और फिर सुर बदला. मोदी निंदा की जगह योगी जी की जय-जयकार चल रही है. मैं यही सोचता रहा कि मोदी न होते तो योगी जी जैसे ‘घनघोर सांप्रदायिक’ संत मुख्यमंत्री कैसे बन पाते जो दिया जलाने अयोध्या पहुंच जाएं?

फिर और भी कई चीज़ें देखता हूं और सोचता हूं कि सामने खतरे कितने विकराल हैं. वाजपेयी जी को याद करें. उनके जाने के बाद कांग्रेस ने सबसे पहले काम किया पोटा हटाने का. 2006 से 2008 के बीच इंडियन मुजाहिदीन के जलवे किसी को याद हैं? तब इसी दिल्ली में दीपावली की खरीददारी करने में डरने लगे थे. अपने टुटपुंजिया से मुहल्ले में भी मुस्तैद पुलिस लाउडस्पीकर से लगातार आगाह कर रही थी- कोई भी लावारिस वस्तु न छुएं.

दीपावली के दिन भी राग बेसुरा है. वजह है. इसी 19-20 अक्तूबर की दरम्यानी रात श्री अबू मुसाब अल जरकावी जी का भी धरावतरण हुआ था (20 अक्तूबर दर्ज है). राम जी की तरह उन्हें वनवास नहीं मिला था पर उन्होंने स्वेच्छा से ले लिया.

अल्लाह ताला ने उन्हें फितरत ही जेहादी बख्शी थी इसलिए बंदूक संभालने लायक होते ही हिजरा करने अफगानिस्तान चले गए. वहां लड़ाई में घायल होने के बाद ईरान पहुंच गए. वहां अपना इलाज कराया पर ईरानी शियाओं को अपने नेक इरादों और बुलंद हौसले की भनक तक नहीं लगने दी.

वहां से इराक पहुंचे और शेख उसामा और शेख जवाहिरी जैसों को जेहाद के मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया. जरकावी भाई अब तबियत से शियाओं को जिबह करने में जुट गए. नज़फ और कर्बला तक को नहीं बख्शा. महज 40 की उम्र में फना हो गए पर उम्मा और सुन्ना की आपने जो खिदमत की, उसके लिए अल्लाह ताला आपको 72 नहीं बल्कि 72 हजार हूरें बख्शें.

जरकावी की मशाल उनके यशस्वी शिष्य अबू बकर अल बगदादी आगे बढ़ा रहे हैं. रक्का में बैठे-बैठे उन्होंने बंबई, दिल्ली, हैदराबाद और चेन्नई तक में अपने लड़ाके तैयार कर लिए हैं. वो इंतज़ार में हैं पर पटाखे फोड़ने की मंजूरी लेने वे सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएंगे.

जानता हूं कि मोदी-डोभाल निकम्मे हैं. अगली बार सत्ता किसी सेकुलर सरकार को सौंप दें और चैन की बंशी बजाएं. राजनीति मर्मज्ञों और विघ्नसंतोषियों की अविरल परंपरा रही है हमारे देश में. राम जी को भी चैन से नहीं बैठने दिया हमने. सीता जी की अग्निपरीक्षा ली.

राम जी अगर आज लंका जीत कर लौटे होते तो फेसबुक पर दीपावली की रात बीतने से पहले गुटीय संघर्ष शुरू हो जाता. प्रगतिशील कहते कि राजकाज तो भरत अच्छा चला रहे थे, राम तो जंगल में रहे, मार-कटाई किए, कौनो प्रशासनिक अनुभव है?

दूसरे कहते कि विभीषण को राजा क्यों बना दिया, खुद ही राज क्यों नहीं करते. इस बहस में किसी को याद नहीं रहेगा कि राक्षसों के आतंक से कितने परेशान थे? याद दिलाने पर दुत्कार दिए जाते- संघियों तुम 1947 वाले प्रागैतिहासिक अतीत में ही अटके रहोगे, सांप्रदायिक कहीं के.

यह ‘सांप्रदायिक’ ऐसा शब्दवेधी बाण था जिसका वार कभी नहीं चूकता था. राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता में कल तक लोग थर-थर कांपते थे कि कहीं इसका निशाना न बन जाएं. यह बाण अब भोथरा हो गया है. इसे उपलब्धि मानें?

इसलिए कहता हूं मितरों कि पिछले तीन साल में जो मिला वह ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है. ‘धर्मनिरपेक्षता’ 55 साल से कुर्सी पर विराजमान रही और हमें-आप को मिले हैं सिर्फ नौ साल. हम अभी शैशव काल में ही हैं. इसलिए अधीर न हों. दशहरा न आता तो दीपावली भी न आती. इसलिए विजय के उपलक्ष्य में इस दीपावली पर धैर्य का दीया जलाएं और आशाओं की लौ बुझने न दें. राम राम जी.

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