सोहराय : फसल उगाने के पारस्परिक सहयोग और गाय-गोरु को समर्पित परब

सोहराय

भारत (बोर-ओत) कृषि प्रधान देश है .. खेती-किसानी कण-कण रग-रग में रचा बसा है.. गायन, नृत्य, दर्शन, परब-त्योहार आदि में कृषि रचा बसा है… फसल बुआई की उमंग और खुशी, फसल लहलहाने की खुशी और अतिरेकता, फसल कटाई की प्रसन्नता और उल्लास सब में परब-त्योहार और गायन-नृत्य और सब बड़े धूमधाम से.. करम मनाये धान रोपने की खुशी में और अच्छी फसल की कामना के लिए.. दांसाय (दसहरा) मनाये फसल को क्षति न पहुँचे और एक समुचित देख-रेख के लिए.. और अब सोहराय फसल काटने के पहले.

सोहराय का शाब्दिक अर्थ… ‘सोहर+राय’ … सोहर मने धान की बालियों का फूटना/निकलना और ‘राय’ मने झुकना .. धान के बाली जब फूट के नेवाने(झुकने) लगते हैं तब सोहराय का महीना चढ़ता है.. और इन झुकी बालियों को काटने से पहले सोहराय करते हैं… वैसे सोहरना का मतलब सजना-संवरना या बनना-ठनना भी होता है… और सोहराय में तो घर-दुआर, आँगन-बाहर, गाँव-गली एकदम से ही सोहर उठते हैं.. सब चिकन-चानो चकाचौंध.

करम में चारों ओर बस हरियाली ही हरियाली.. जिधर नजर दौड़ाये उधर बस धान के लहलहाते खेत और उन लहलहाती और सरसराती आद्र हवाओं के मध्य गाय-गोरु के गले में बंधा ठेरका की आवाजें. अहा!!.. फिर हवाएं जैसे-जैसे शुष्क होती गई वैसे-वैसे धान में बालियां फूटती गई और रँग हरियाली से सुनहरे रंग में बदलता गया .. दांसाय से सोहराय महीना चढ़ा.. और सोहराय चढ़ते ही पशु-पक्षियों में एक अलग सा ही जोश, खरोश और उमंग .. इनकी उमंगता देखते ही बनती है.. सावन में भारी चास-बास के चलते और हरियाली छाने के बाद हरे घास खाकर ये मवेशी अब जरा ज्यादा हृष्ट-पुष्ट हो गए हैं. बैल-बाछा तो पूँछी उठा के दौड़ लगाने लगे हैं.. इनकी उमंगता देखते ही सबके मुँह से अनायास ही निकलता है “लागो हो सारहेन के सोहराय चइढ़ गेलव रे!!”

तो सोहराय केवल कृषक किसान के लिए एक अच्छी फसल की उपज का ही परब नहीं है अपितु यह गाय-गोरु का भी परब है… बल्कि गाय-गोरु को ही समर्पित परब है… उपज(धन-धान्य) को समर्पित परब है. .. गाय-गोरु को तो लगता कि इस परब का बेसब्री से इंतजार रहता है.. और सोहराय महीना चढ़ते ही इजहार करना शुरू कर देते है.

हमारी फसल को उगाने में जिनका भी सहयोग रहा उन सब की सोहराय में पूजा करते हैं… हल-जुआठ, मेर-रक्सा,गाय-गोरु-काड़ा-भैंस सबका… फसल उगाने के पारस्परिक सहयोग को समर्पित करता परब है सोहराय.

सोहराय के पाँच, सात या नौ दिन पहले से ही सभी मवेशियों के सींगों में तेल लगाया जाता है.. सोहराय के दिन सभी गाय-गोरु, हल-जुआठ को धो-धा के आँगन-गोहाल को लीप-लाप के, अरवा चावल की गुंडी से चौक पुर कर गाय-गोरु, हल-जुआठ की पूजा की जाती है… इससे पहले धान के खेत से पकी धान को काट के लाते हैं उसका मांडर(हार/माला) बनाते हैं और गाय-गोरु के पूजा के बाद उनके सींग में सिंदूर से गोल-गोल छल्ले बनाते हैं, सजाते हैं और मांडर को उसके माथे में बाँधते हैं… गोहाल पूजा, गौरेया पूजा करते हैं गोहाल में.

आज(लक्ष्मी/लछमी पूजा) का दिन कांची-दियरी(दीया) का होता है. .. चावल के गुंडी का दिया बनाया जाता. और उनको पहले हम वहीं जलाते/रखते है जो हमारी कृषि को सुदृढ़ करते हैं. गोबर डिंग (गोबर का गड्डा) जो हमारा प्राकृतिक खाद का अड्डा है वहाँ एक, कुंआ पानी का स्रोत वहाँ एक, गोहाल घर गाय-गोरु का घर वहाँ फिर अपने घर-दुआर और छत ऊपर.

इसी दिन से गाय-गोरु और फसल को समर्पित गान जिसको ‘अहिरा’ बोला जाता है पूरे मांदर-ढांसा-ढोल के साथ घर-घर में जा-जा के गाते-बजाते-नाचते हैं. .. पूरा वातावरण मांदर के थापों और अहिरा गान से गुंजयमान हो जाता है.
सोहराय के अंतिम दिन ‘बरद-खूंटा’ होता है.

अब देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों से ये परब मनाया जाता है. कहीं सोहराय, कहीं दीवाली, कहीं लक्ष्मी पूजा तो कहीं काली पूजा. लेकिन मूल-भाव एक ही है.

हमारे लिए लछमी कौन? तो हमारे लिए लछमी हमारे धान्य, फसल और गाय-गोरु… हमारी ऐश्वर्य का प्रतीक हमारे गाय-गोरु होते हैं… अब तो नौकरी-चाकरी के चक्कर में जरा अंतर आया है.. सम्पन्नता, ऐश्वर्यता तो घर में कितने जोड़े बैल और गाय हैं, को देख कर ही आती थी.. तो ये हुए हमारे लछमी और लछमी माता. और इनको ही हम पूजा करते. .. अब जिनके पास ये नहीं उनके लिए लछमी कौन? तो उनके लिए लछमी वही जिनसे उनका घर-परिवार चल रहा है.. बनिया के लिए उनका दुकान, बंटखारा, सोनार के लिए उनके जेवर-आभूषण, इसी तरह अन्य लोगों के लिए भी..

सोहराय

अब इन्होंने इसे गणेश और लक्ष्मी जी को समर्पित करते हुए पूजा किया और कर रहे हैं… एक उदाहरण देखिये.. हमारे के जैसा ही महाराष्ट्र में एक परब होता है ‘पोळा’ .. बैल सब को खूब सजाते धजाते हैं.. अब जिनके पास बैल हैं वे सीधा पोळा मनाते हैं बैल के साथ.. लेकिन जिनके पास बैल नहीं है वे क्या करते हैं? तो वे काठ की नन्दी बनाते हैं और उनको सजा-धजा के पूजा करते हैं.

अब अपना ही उदाहरण देते हैं.. मेरे गाँव में आज से 15 साल पहले सबके घर के आगे बरद खूंटाता था .. हमारी पूरी मंडली 12 बजे दिन से ही बरद हिलहिलाने निकल पड़ते थे.. लेकिन विकास नाम की चीज आई और हमारी कच्ची गलियां अब पीसीसी रोड से पट गई.. तो अब पीसीसी रोड में कैसे बरद खूंटे? .. तो धीरे-धीरे बरद खूंटना बंद सा हो गया.. पिछले साल सामूहिक प्रयास से गाँव का टाँड़ में बरद-खूंटा करवाये… लेकिन वही कि जब तक गाय-गोरु हैं तब तक खुटेंगे, जिस तरह से पशु-धन से निर्भरता कम हो रही है उस हिसाब से अगले 20-25 सालों में बैल उपलब्ध ही न हो तो फिर सोहराय का स्वरूप कैसा होगा? फिर वही कि प्रतीकात्मक रूप ले लेगा.

आकृति और प्राकृति एक दूसरे से सम्बंधित है.. प्रकृति जहाँ कमजोर पड़ने लगती है वहाँ आकृति जन्म लेने लगती है. लेकिन मूल भाव वही रहता है.

अब लक्ष्मी पूजा है तो केवल लक्ष्मी की ही पूजा होनी चाहिए, साथ में गणेश जी की क्यों ??? .. गणेश जी का क्या सम्बन्ध भला इससे ??

हमारे लिए हमारा धन और लक्षमी हमारे जमीन और गाय-गोरु.. अब जिनके पास इनका अभाव (जो कालांतर में खो दिए) उनके लिए कौन? .. आकृति किन्हें दे?? तो लक्ष्मी धरती स्वरूपा और गणेश जी बूढ़ा बाबा और बूढ़ी माई के संतान जो कृषक हुए नंदी को लिए हुए. (गोबर-गणेश को पता नहीं किस सेंस में लिया जाता है)

ये बोर-ओत है, भारतवर्ष है.. इस वरदानी भूमि के हम वासी हैं.. जहाँ हम सब एक दूसरे से जुड़े हुए है.. हमारी जैसी सामाजिक व्यवस्था और ताना बाना दुनिया में अन्य कहीं नहीं मिल सकता है.. लेकिन बाहरी ब्रेकिंग फोर्सेस हमेशा से ही और लगातार इस ताने बाने को तोड़ने और कमजोर करने में लगे हुए हैं .. आज इन छोटी-छोटी से परब अंतर के बीच में बड़ी-बड़ी खाइयां खोदने में सब लगे हुए हैं भाषा हासा का तड़का लगा के. सोशियो-यूनीफॉर्मिटी को छिन्न भिन्न करने में लगे हुए हैं. … लेकिन कहाँ तक करोगे.. भारतवर्ष जाग रहा है.. ये पवित्र भूमि है.. भारत भूमि है.. हम भारतीय हैं.. देखते हैं.

जरा कुछ और तरफ चलते हैं… चंदा मामा !! .. चन्द्र मामा हुए तो चन्द्र की बहन याने हमारी माँ कौन हुई और पिता कौन ?? .. तो धरती हमारी माता और सूर्य पिता हुए.. और इन दोनों के मध्य ही सारा जीवन चक्र चलता… अमावस की रात दीवाली मनाते दीप जलाते जब चंदा मामा दूर होते.. अंधेरे(अज्ञानता) को चीरती एक छोटी सी दीया का प्रकाश पुंज जो ज्ञान के ज्योत को जलाती है, इसका प्रतीक है दीवाली व सोहराय.
तभी तो , ‘अंधेरा घना है मगर दीया जलाना कहाँ मना है!’

इस सोहराय दीवाली में यही शुभ कामना कि सब धन धान्य, गाय-गौरेया सुरक्षित रहे, बढ़े और ज्ञान पुंज और भी प्रकाशमय हो और भारतवर्ष पुनः जगमगाये.

आप सभी को सोहराय, दीवाली की अनन्त शुभकामनाएं!!

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