क्या इस्लाम और मुग़लों के थोपे गए स्मारकों के बारे में किया जाए विचार!

पोलैंड की राजधानी वॉर्सा में यह बिल्डिंग है जिसका नाम है Palace of Culture and Science. उस शहर की सब से ऊंची बिल्डिंग है पर पोलैंड की सरकार इसे तोड़ने वाली है.

क्यों? क्योंकि इस बिल्डिंग को दूसरे विश्वयुद्ध बाद कम्युनिस्ट रशिया ने बांधा था.

दूसरे विश्वयुद्ध की शुरुआत में जर्मनी ने बहुत ही तेज़ गति से पोलैंड खा लिया था. पोलैंड की प्रजा विरोध करती रही लेकिन जबतक युद्ध में जर्मनों का पराभव नहीं हुआ तब तक देश नाजी शिकंजे में रहा. कम्युनिस्ट रशिया की सेना जर्मन सेना का पराभव कर के उसे पोलैंड से बाहर खदेड़ती ले गयी, जर्मनी तक ले धकेलते ले जाकर वहीं जर्मन सेना को खत्म किया गया.

इस्लाम की ही तरह, कम्युनिस्ट एक बार जिसको निगलते हैं, उगलते नहीं. पोलैंड, छेकोस्लोवाकिया, हंगेरी आदि देशों को कम्युनिस्टों ने जर्मनी से ‘आज़ाद’ किया का मतलब यही था कि खुद सत्ता थाम ली. प्रजा ने जहां भी विरोध किया वहाँ निर्दयता से कुचल दिया. हंगेरी में तो निदर्शकों पर टैंक चढ़ा दिये थे.

आगे जा कर सोवियत यूनियन टूटा और धीरे-धीरे यह सब कम्युनिस्टों के ज़बर्दस्ती के पकड़े हुए देश आज़ाद हुए. पोलैंड उससे पहले ही स्वायत्त हो गया था.

हर काबिज़ देश में रशियनों ने इमारतें, स्मारक आदि बांधे ही हैं. पोलैंड में लगभग 500 चिह्नित किए गए हैं जिन्हें गुलामी की निशानी बताकर तोड़ा जा रहा है.

पोलैंड के लोगों का कहना है कि रशिया अगर हमें वास्तव में आजाद करता तो हम उनके कृतज्ञ रहते. इन सब इमारतों और स्मारकों को पोलिश जनता की कृतज्ञता का नाम रशियनों ने ही दिया है, हमारे लिए तो बस दासता में कोई अंतर नहीं आया था. गर्दन पर जर्मन जुआ था, वो रशियन जुआ हो गया. काहे की कृतज्ञता?

हमारे लिए भी मुग़ल तथा इस्लाम के थोपे हुए स्मारकों के बारे में यही विचार करने की ज़रूरत है. पोलैंड के समाचार की लिंक यह रही – http://www.newsweek.com/poland-plans-removal-500-soviet-monuments-442661

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