नरक चौदस या छोटी दिवाली : सामाजिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व

कार्तिक मास के चौदहवें दिन को नरक चौदस का त्यौहार मनाया जाता है. आइये इसके वैज्ञानिक और सामाजिक पहलू पर विचार करें. इस वर्ष यह दिन 18 अक्तूबर को मनाया जा रहा है. दीपावली के एक दिन पहले का यह त्यौहार छोटी दिवाली के नाम से भी जाना जाता हैं.

पुराणों की कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ मिल कर कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी तिथि को नरकासुर नाम के असुर का वध किया. यह नरकासुर सत्यभामा का ही पुत्र कहा जाता है. नरकासुर ने 16 हजार कन्याओं को बंदी बना रखा था.

नरकासुर का वध करके श्री कृष्ण ने कन्याओं को बंधन मुक्त करवाया. इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करेगा अतः आप ही कोई उपाय करें. समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाने के लिए सत्यभामा के सहयोग से श्री कृष्ण ने इन सभी कन्याओं से विवाह कर लिया. कालांतर मे यही कथा अपभंश हो कर श्री कृषण की 16000 पत्नियाँ के नाम से बना दी गयी. यदि यह कथा आप सत्य भी मानें तो श्री कृष्ण ने उन कन्याओं को मात्र अपना नाम दिया. उनके साथ रास लीला नहीं रचाई.

नरकासुर का वध और 16 हजार कन्याओं के बंधन मुक्त होने के उपलक्ष्य में नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान की परंपरा शुरू हुई. एक अन्य मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन सुबह स्नान करके यमराज की पूजा और संध्या के समय दीप दान करने से नर्क की यातनाओं और अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है. इस कारण भी नरक चतु्र्दशी के दिन दीपदान और पूजा का विधान है.

इसी से जुड़ी एक कथा राजा बाली से है जब राजा बाली ने सम्पूर्ण धरती पर राज्य स्थापित कर लिया और सभी देवताओं से भी श्रेष्ठ मान लिया तो एक यज्ञ के दौरान विष्णु के अवतार ब्राह्मण वामन बन कर आए और राजा से तीन पग भूमि मांग ली. राजा बाली के तथास्तु कहने के बाद विष्णु ने अपना आकार बढ़ा कर एक पग में आकाश दूसरे में पूरी धरती नाप ली और तीसरे पग के लिए कुछ भी नहीं बचा तब राजा बाली ने अपना सिर उनके चरणों मे रख दिया. इस प्रकार से राजा बाली का घमंड समाप्त हुआ.

आइये पहले तो इन घटनाओं से शिक्षा की बात करें. मेरी हमेशा से मान्यता है कि इन सब घटनाओं की सत्यता है या नहीं परंतु यह सब हमें धर्म के नाम पर जीवन मूल्यों की शिक्षा देने के लिए है. सत्यभामा या भूमि माता से अपने पुत्र का ही वध दर्शाता है कि समस्त माता पिता या अभिभावकों को अपने संतानों को मोह के क्षेत्र से बाहर निकाल कर लालन पालन करना चाहिए. आपकी संतान आपकी एक प्रियतम संतान हो सकती है वही संतान समाज का एक हिस्सा भी है तो सामाजिक ज़िम्मेवारी के तहत उसको श्रेष्ठ बनाना आपका कर्तव्य भी है और धर्म भी है. जहां ऐसा नहीं हुआ समाज ने इसकी बड़ी कीमत चुकाई हैं. महाभारत इसका प्रमाण है.

राजा बाली की कथा यह बताती है कि कोई कितना बड़ा भी राजा हो वह ईश्वर से या यूं कहिए प्रकृति से बड़ा नहीं है. आज का विज्ञान अपने पर घमंड कर सकता है पर फिर उसे प्रकोप से नहीं बच सकता है. आज के समय मे बिना प्रकृति की रक्षा किए होने वाले विकास की वीभत्स तस्वीर आए दिन नज़र आती रहती है. ताज़ा उदाहरण केदारनाथ का है इसलिय आज के वैज्ञानिक विकास को प्रकृति को साथ ले कर चलना पड़ेगा नहीं तो इसके परिणाम ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण इत्यादि के साथ हमाने सामने हैं.

अब आइये इसके सामाजिक पहलू पर भी विचार करें और आध्यात्मिक पर भी. एक दिन पहले धनतेरस का त्यौहार हमें भगवान धन्वन्तरी के रूप मे शरीर के स्वास्थ्य की बात करते हैं क्यूंकी ध्यान रहें यह वर्षा के बाद शिशिर ऋतु के आगमन का पहला त्यौहार है. अब शरीर की बात तो धनतेरस हो गयी अब आपको अपने स्वास्थ्य केलिए वातावरण की स्वछता की आवश्यकता है इसलिए इस दिन पूरे घर की सफाई की जाती है. वर्षा ऋतु के समय की हुई सीलन इत्यादि मे कई विषाणु पनप जाते है इसके लिए घर की सफाई और लिपाई पुताई से विषाणु से मुक्ति का प्रावधान है. हमारे परंपरा मे इस दिन गाय के गोबर से घर को लीपने की प्रथा थी क्योंकि गाय का गोबर हमारे कृषि परंपरा का द्दयोंतक है और disinfectant भी है.

अब इस रामायण से भी जान लीजिये. मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र जब 14 वर्षों के वनवास के लिए गए तो राजा भरत नें भी सभी सुख सुविधाएं त्याग दी और महल से बाहर कुटी बना कर राम की खड़ाऊँ से पूरा राज्य चलाया यह हम सब जानते हैं. परन्तु जब रामचन्द्र के आने का समय पड़ा तो वह कार्तिक मास की अमावस्या ही थी. अब क्योंकि राम युद्द के बाद आ रहे थे और विभीषण के राज्यभिषेक की भी उन पर ज़िम्मेदारी थी तो राम को लगा कि अगर समय पर नहीं पहुंचे तो अनर्थ हो जाएगा. भरत ने उनके जाने से पहले ही कहा था कि मैं 14 वर्षों तक आपका राज्य चलाऊँगा फिर आप न आए तो अपना देह त्याग दूंगा. राम जानते थे कि भरत अपने वचन को पूरा करेगा तो उन्होने हनुमान को अपने संदेश ले कर भेजा कि मैं आ रहा हूँ. यहाँ तक कहा जात है कि जब हनुमान पहुंचे भरत ने चिता का प्रबंध कर लिया था. दैवयोग से हनुमान समय पर पहुंचे और आगे आप सब जानते हैं. राम ने अपना राज्य संभाल लिया.

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