शुक्र मनाइए कि अंग्रेज़ आए, वरना हम भी होते इस्लामिक मुल्क

आपने सेकुलरिज्म के नाते गलत इतिहास पढ़ा है. आपको मैं पक्की सूचना देता हूँ. अधिकांश हिंदू फौज अंग्रेजों को देखते ही अंग्रेजों से जा मिली. मुसलमानों के अत्याचारों से लोग ऊब चुके थे. अंग्रेजों में उनको नया मददगार दिख रहा था. लोगों ने गौरांग देव जैसे शब्द से उन्हें नवाज़ा. जनता उन्हे अंग्रेज बहादुर कहती, जिन्होंने मुस्लिम आतताइयो से छुटकारा दिलाया था.

अंग्रेज उनको तारणहार लगे थे, इसलिए हिन्दू सेना बहुतायत मात्रा में उनकी ओर हो जाती. यह रॉबर्ट क्लाइव ने अपनी व्यक्तिगत डायरी में लिखा है. सेकुलरिया इतिहासकारों ने इसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया है. इसीलिए मुसलमानों से आमने-सामने हुए युद्ध में अंग्रेज जीतते चले गए. बाद के इतिहासकारों ने उस में कंफ्यूज़न पैदा किया है लेकिन सच्चाई यही थी कि हिंदू अंग्रेजों को अंग्रेज प्रभु का दरजा देते थे.

रॉबर्ट क्लाइव की बात का ईस्ट इंडिया कम्पनी के अन्य कई अंग्रेज़ गवर्नरों ने भी इस बात की पुष्टि में लिखा है. प्लासी और बक्सर दोनों ही युद्ध में यही हुआ था। बाद में भारतीय इतिहासकारों ने इसे घुमा दिया। दरअसल मुसलमानों के अत्याचारों से तत्कालीन देश त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रहा था. इस कारण उस समय अंग्रेज तारणहार जैसे लग रहे थे. जितनी हिंदू सेना थी वह सीधे अंग्रेजों से मिल जाती थी. यह बेवकूफी की बातें पढ़ाई गईं कि हिंदू मुस्लिम एकता थी. वह सैनिक के तौर पर नौकर की तरह इस्लामिक सेना में क्षुब्ध था. अंग्रेजों को भारत में ज़बरदस्त स्वागत मिला और लगातार वह स्थापित होते चले गए.

और सबसे आखिरी बात, आप यह दिल, दिमाग, आत्मा में बसा लीजिए. अंग्रेज़ ना आते तो भारतवर्ष कभी आज़ाद नहीं होता. आज अब तक आप ईरान, इराक और अफगानिस्तान, मिस्र, मंगोलिया, मलेशिया जैसे 56 इस्लामिक देशों में बदल चुक़े होते.

शुक्र मनाइए अंग्रेज आ गया और आज आप आज़ाद हैं. अपने बचे-खुचे आधे अस्तित्व-व्यक्तित्व के साथ. अगर धोखे से भी अंग्रेज़ को आने में 50-100 साल और लग जाते तो आप मिट चुके होते.

और जब अंग्रेज़ गया तो ब्रिटिश पार्लियामेंट के इन्डिया इंडिपेंडेस एक्ट 1947 बना गया, जिस के तहत पाकिस्तान मुस्लिम राष्ट्र है और भारत हिन्दू-राष्ट्र है. भले इन में चाहे जो रहें.

सन 1947 में अंग्रेजों ने जब यह एक्ट पास किया तो कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सभी बड़े नेताओं ने इस पर दस्तखत किए. इन सब ने मिलकर के आपसी सहमति से यह तय किया था कि हिंदुस्तान में मुसलमान हिंदुओं के साथ नहीं रह सकता.

मुस्लिम खुद में एक अलग राष्ट्र है. एक भूखण्ड पर दो राष्ट्र नही रह सकते. उनको एक अलग राष्ट्र चाहिए था. बड़े खून-खराबे की आशंका को रोकने के लिये अंग्रेजों ने यह किया. बेसिकली अंग्रेज़ों के मन इस विषय पर साफ थे.

हिंदुओं के लिए भारत के इधर के सारे प्रदेश शामिल किए गए. 23 प्रतिशत मुसलमानों के लिए 30 प्रतिशत ज़मीन दे कर के उस तरफ का हिस्सा दिया गया. जिसमें केवल 12 प्रतिशत उधर गये. यह आपसी समझौते से तय हुआ था (कांग्रेस कम्पनी की धूर्तता समझिये). उन्होंने आरोप भी नहीं लगाया कि अंग्रेजों ने गलत ढंग से विभाजित किया है.

मुसलमानों ने अपना राष्ट्र लेने के बाद बड़ी चतुराई से यहां रुक कर के समस्या जस की तस बरकरार रखी. तत्कालीन नेताओं की बड़ी गलती थी. उन्होंने दूरदर्शी, सुनियोजित और क्रमबद्ध रूप से नहीं सोचा. इतिहास की भी उन्होंने गलत व्याख्या की. समस्या जस की तस वैसे ही पड़ी है.

पाकिस्तान ने इसी एक्ट का पालन करते हुए अपने यहां से सारे हिंदुओं को मार कर निकाल दिया. लेकिन जो यहां नेहरु-गांधी, और कांग्रेस कम्पनी जोड़ी ने मुस्लिमों को भारत में रोक लिया, कानूनी रूप से यह अवैध कदम था. उन्होंने कानूनपालिका बनाई और अपनी किताब की व्याख्या का काम उसे दिया. बाकी तमाम प्रतिरोधी संस्थान बनाकर कब्जा करवाया गया.

आज उनकी संख्या रणनीति के तहत लगातार बढ़ती जा रही है. कुछ घुसपैठ कर के, कुछ इधर उधर से लाकर, बाकी जनसंख्या बढ़ा कर. शेष जहां भी दांव लगा हिन्दुओं को मारकर ज़मीनों पर अपनी संख्या में आनुपातिक वृद्धि करके वह हिंदू राष्ट्र की भूमि को कम कर रहे हैं.

मूलतः हिन्दुओं का असंगठित स्वरूप और स्वतंत्रतावादी सामाजिक संरचना इसके लिए अधिक ज़िम्मेदार है.

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