धन तेरस विशेष : क्योंकि तब हम सोने की चिड़िया थे, उधार के गधे नहीं

धन तेरस है, धन्वंतरि त्रयोदशी का अपभ्रंश या कहे सुकथ्य नामांतरण है, श्रीविष्णुअंशावतार भगवान धन्वंतरि के विषय में सामान्य जानकारी सभी को है अतः मैं मुख्य बिंदु पर सीधे आता हूँ.

बहुत सी जगह आज इस ज्ञान को नकारात्मक भाव से फैलते हुए देख रहा हूँ कि धन शब्द के अर्थ को exclusively धन्वंतरि जी से जोड़कर यह शास्त्रीय आदेश दिया जा रहा है कि इसका धन (द्रव्य) अथवा धन के महात्म्य / पूजन से कोई लेना देना नहीं है. अतः आज केवल धन मतलब धन्वंतरि समझ कर स्वास्थ्य की ही बात करें. धन मतलब द्रव्य समझने वाले गहन अंधकार में हैं.

आइये देखें हमारे वांग्मय क्या कहते हैं, हमारे वरिष्ठ परिजन क्या कहते हैं?

मेरे एक वरिष्ठ परिजन कहते हैं कि वस्तुतः रक्षाबंधन ब्राह्मणों को “विशेष ” प्रिय है (श्रावणी उपाकर्म के कारण ), नवरात्रि एवं विजयादशमी क्षत्रियों को, दीपावली वैश्य वर्ग को एवं होली “शूद्र” वर्ग को.

पहले तो यह समझ लें कि विशेष प्रिय होने का यह अर्थ नहीं है कि बाकी अन्य लोगों के लिए यह निषिद्ध है और शूद्र का अर्थ या स्तर तुलनात्मक रुप से हेय हैं यह समझने वालों की मति हेयतम है.

निसंदेह ऐसा किसी ग्रंथ में नहीं लिखा है, किंतु कुछ व्यवहारिक सत्य भी सनातन के अलिखित ग्राह्य अंग है.

वणिकों द्वारा धन्वंतरि त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वंतरि के स्मरण के साथ ही श्रीलक्ष्मीजी के कृपाद्रव्य मूल्यवान धातुएं /सुंदर नववसन (नए वस्त्र ) / नव वासन ( नए बर्तन ,)/नववाहन के क्रय एवं पूजन की परंपरा उनके उत्साह एवं महोत्सव पालन की अपनी शैली है जो किसी भी दृष्टि से आपत्तिजनक नहीं है.

अर्थ धर्म काम मोक्ष को पुरुषार्थ बताने वाले हमारे ज्ञानी पूर्वज अर्थशास्त्र की भी व्यापक समझ रखते थे तभी हम सोने की चिड़िया थे “उधार के गधे” नहीं.

उत्सवों के सामाजिक एवं मानवीय परिपेक्ष्यों के साथ ही आर्थिक परिपेक्ष्यों को नियमित संबल देने के लिए ही कई सामान्य प्रकल्प भी जोड़े गए ताकि ये महापर्व अर्थ की दृष्टि से भी मानवता का कल्याण करे.

अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेत है मुद्रा का तंत्र में परिक्रमण (रोटेशन) जिससे मांग एवं आपूर्ति के सामंजस्य के साथ अर्थव्यवस्था को दृढ़ता मिलती रहे. कृषि चक्र से उचित समायोजन के साथ आते ये महापर्व सुस्त से सुस्त अर्थव्यवस्था को वह बल प्रदान कर देते हैं कि जिससे उसकी गति पुनः सतत हो जाती थी.

ऐसे में ऐश्वर्य एवं समृद्धि की दात्री माता श्रीलक्ष्मी जी के पूजन के शुभदिवस के दो दिन पूर्व यह परंपरा अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी है जिसमें कोई बाध्यता नहीं है कि आपको इतना स्वर्ण या रजत क्रय करने ही है अथवा इतने बर्तन या परिधान से कम पर देवता रूष्ट हो जाएंगे.

आपके सामर्थ्य के पूर्ण सम्मान के अनुरूप यह पर्व आपको यह अवसर देता है कि आप सोउत्साह समृद्धि के प्रतीक इन द्रव्यों का यथाशक्ति क्रय करके अपने परिवार एवं स्वयं के हृदय को प्रसन्न करें एवं समाज सहित सम्पूर्ण राष्ट्र की उन्नति में सहज सहयोग भी करें.

प्रमाण के लिए GST से त्रस्त बाजार के आज के अनुभव को देखिये और विचार कीजिये कि क्या मैंने कुछ अनुचित कहा है? सभी नीतिशास्त्र अर्थ की सम्यक कामना एवं संयमित लक्ष्यों के लिए उचित प्रयासों को पुरुषार्थ मानते है यथा पंचतंत्र कहता है कि,

” कृपणो अपि कुलहीनो अपि, सज्जने वर्जितः सदा,
सेव्यते सः नरो लोके ,यस्य स्यात वित्त संचय ।।’

अर्थात – जो कंजूस हो, कुलहीन हो, सज्जनों ने भी जिसे त्याग दिया हो ऐसा व्यक्ति भी लोगों द्वारा पूजा जाता है यदि उसके पास धन का संचय है.

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनं,
अधनस्य कुतो मित्रम, अमित्रस्य कुतः सुखं ।।

सुख के लिए मित्र, मित्र के लिए धन की आवश्यकता तो होती ही है सज्जनों!

यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञ:।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणा: काञ्चनमाश्रयन्ति।। (नीतिशतक 41)

अर्थात् इस संसार में जिसके पास धन है, वही मनुष्य कुलीन है, वही विद्वान है, वही शास्त्रों का वेत्ता है, वही गुणों का ज्ञाता है, वही वक्ता तथा वही दर्शनीय है. इससे प्रत्यक्ष है कि सभी गुण धन में ही निवास करते हैं. अर्थात् धन के प्रभाव से मनुष्य वह बन जाता है जो वह नहीं है.

जिसका भी हो समय पर भामाशाह ने लाकर धन दिया तो प्रताप पुनः सेना को सशक्त कर पाये.

तो बंधुओ धन्वंतरि जी के आशीर्वाद से स्वस्थ होकर धन के महात्म्य को भी साथ ही समान सम्मान प्रदान करे, शास्त्रों में कही भी नहीं लिखा है कि धन्वंतरि त्रयोदशी के दिन धन का अर्थ धन (द्रव्य) के रूप में लेना पाखंड अथवा अज्ञान है.

स्मरण रहे कि दोनों धन एक दूसरे के सहायक है पूरक नहीं, जैसे स्वास्थ्य धन को उत्पन्न करता है तो कभी कभी धन भी स्वास्थ्य की रक्षा करता है.

भगवद्गीता मे श्रीकृष्ण कहते हैं कि किसी को भी उसके धर्मपालन के पथ से विपथ मत करो, उसकी श्रद्धा को उचित दिशा देकर धर्मोपयोगी क्षेत्र में ले आओ.

चलिये अंत मे ब्राह्मण से धनप्राप्ति का गूढ़ मंत्र भी लेते जाइये,

“उत्साहसम्पन्न, अदीर्घसूत्रं, क्रियाविधिज्ञम, विषयै अवसक्तं ।
शूरम, कृतज्ञम, दृढ़सोहृदयँ च, लक्ष्य स्वयं याति निवासयंतो ।।

अर्थात
जो उत्साह से परिपूर्ण है, काम को लटकाने की आदत नहीं रखता, कार्य को करने की उचित विधि का ज्ञाता है (skilled), दुर्व्यसनों (नशों) से दूर है, साहसी (रिस्क ) है, उपकार मानने वाला एवं मित्र बनाने वाला (हँसमुख) है उसके यहाँ श्रीलक्ष्मी स्वयं निवास को जाती है.

आप सभी को धन्वंतरि त्रयोदशी की हार्दिक शुभकामनाएं !

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