‘पहले 4 साल काम करूंगा, 5वें साल राजनीति’, अगर ये याद है तो सब्र करें भक्तों

पंजाब के कांग्रेसी एक सीट जीत के यूँ जश्न मना रहे हैं मानो राहुल गांधी ने 2019 ही जीत लिया हो. उधर भक्त लोग यूँ मातम मना रहे हैं मानो सब कुछ लुट गया हो. सबसे पहले तो ये जान लीजिए कि ये उप चुनाव था. उप चुनाव में ये मान के चला जाता है कि सत्तारूढ़ पार्टी चुनाव जीत ही जाएगी. इसलिए कोई भी पार्टी आमतौर पर उपचुनाव को बहुत ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेती.

अहम् बात ये कि उपचुनाव यदि किसी सांसद या विधायक की मृत्यु के कारण हो रहे हों तो पार्टी आमतौर पर सहानुभूति वोट पाने के लिए मृतक के परिवार के ही किसी सदस्य को ही टिकट दे देती है.

चूंकि गुरदासपुर सीट से भाजपा सांसद स्व. विनोद खन्ना के परिवार का कोई सदस्य सक्रिय राजनीति में था नहीं और यूँ भी विनोद खन्ना का गुरदासपुर से बहुत कम जुड़ाव रहा है और उनका ज़्यादातर समय मुम्बई में ही बीतता था इसलिए उनकी मृत्यु के बाद क्षेत्र में सहानुभूति लहर जैसी कोई बात भी नहीं थी.

तीसरी बात ये कि वर्तमान में यदि देखा जाए तो भाजपा पंजाब प्रदेश में चौथे नम्बर की पार्टी है जिसका बहुत बहुत सीमित जनाधार बचा है.

वाकई देखा जाए तो पंजाब में दो मुख्य राजनीतिक शक्तियां रही हैं. सिख और हिन्दू… सिखों की नुमाइंदगी अकाली दल करता रहा तो कांग्रेस पिछले 125 साल से हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती रही. आपको इस सत्य को अब स्वीकार कर ही लेना चाहिये कि पंजाब का हिन्दू कांग्रेस के राज में खुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करता है.

पिछले 20 सालों में बेशक भाजपा ने प्रदेश में अपना फैलाव किया है पर उसकी बढ़त सिर्फ और सिर्फ हिंदुओं में हैं और हिन्दू बहुमत वाली पूरे पंजाब में सिर्फ 22 सीट हैं. इसलिए मजबूरन भाजपा को किसी न किसी के साथ मिल के ही चुनाव लड़ना है.

ऐसे में उसके सामने सिर्फ दो विकल्प हैं. अकाली या फिर कांग्रेस… अपने DNA में रचे बसे कांग्रेस विरोध के कारण भाजपा, अकाली दल के साथ चुनावी गठबंधन को मजबूर हो जाती है. पिछले 3 साल में यहां आम आदमी पार्टी (AAP) का उदय हुआ है. AAP को खालिस्तानी उग्र सिखों का परोक्ष समर्थन था.

हालिया विधान सभा चुनाव से पहले यहां AAP के रूप में खालिसतानियों की सरकार बनने का खतरा मंडरा रहा था और उस खतरे से हम लोग कैसे निपट पाए, ये हम बखूबी जानते हैं. विधानसभा चुनाव से सिर्फ 4 दिन पहले क्या स्थिति थी और AAP / खालिस्तानियों को रोकने के लिए अकाली-भाजपा ने क्या-क्या पापड़ बेले और मालवा क्षेत्र में कैसे हमने अपना वोट कांग्रेस को ट्रांसफर कर AAP / खालिस्तानियों को पटखनी दी, ये हमसे बेहतर कौन जानता है? अलबत्ता ये सब पर्दे के पीछे की बातें हैं और मंचों से इनकी चर्चा नहीं की जाती.

दूसरी बात ये कि हरियाणा, पंजाब, राजस्थान ये कुछ ऐसे राज्य हैं जो हर पांच साल पर अपनी सरकार बदलने के लिए कुख्यात हैं. यहां 3 से 4 साल में सरकार अलोकप्रिय हो ही जाती है और सत्ता विरोध (anti incumbency) ही एकमात्र चुनावी मुद्दा होता है. ऐसे में यहां पंजाब में बादल परिवार और अकाली दल anti incumbency का शिकार था और अभी 3 साल रहेगा. बाजी 3 साल बाद अपने आप पलट जाएगी.

रही बात भाजपा की, तो वो चौथे नंबर की जूनियर पार्टी है और पंजाब एक सीमावर्ती सिख बहुल हिन्दू अल्पसंख्यक राज्य है. अकाली समर्थन के बिना लोकसभा जीतना अभी भाजपा के बूते की बात नहीं, न निकट भविष्य में होगी.

दूसरी बात ये जान लीजिए कि पंजाब कांग्रेस अमरेंद्र सिंह की कांग्रेस है, न कि सोनिया राहुल गांधी की कांग्रेस. राहुल गांधी की यहां कोई औकात नहीं. यहां जो है अमरेंद्र सिंह है. अमरेंद्र सिंह ने 2017 चुनाव से 4 महीने पहले ही बगावत कर दी थी. अब ये जान लीजिए कि पंजाब में INC नहीं बल्कि कांग्रेस (अमरेंद्र) का शासन है.

जहां तक बात राहुल गांधी की है, सो आपको याद दिला दूं कि जब 2009 के यूपी लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोट के सपा से नाराजगी के कारण जब कांग्रेस 21 सीट जीत गयी तो तब भी कांग्रेस यूँ ही बम बम थी. 2012 में विधानसभा चुनाव में इनका उत्साह चरम पर था.

तब मीडिया भी राहुल बाबा को झाड़ पर चढ़ाए चला जा रहा था… इतना कि यूपी कांग्रेस में इस बात की खींचतान चल पड़ी थी कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा… और इस चक्कर मे राज बब्बर, प्रमोद तिवारी, जैसे कांग्रेसी कुत्ते की तरह लड़े थे… और जब नतीजा आया तो टाँय टाँय फिस्स… 21 लोकसभा सीट जीतने वाली पार्टी 28 विधानसभा सीट पर सिमट गई.

और फिर याद कीजिये 2014 का लोक सभा और 2017 का विधानसभा चुनाव जहां कांग्रेस क्रमश: 2 और 9 सीट पर सिमट गई. वस्तुतः कांग्रेस के लिये ज़मीन पर कुछ भी नहीं बदला है. भारत में चुनाव की दिशा जातीय समीकरण या फिर सामाजिक समीकरण तय करते हैं.

जातीय समीकरण बिल्कुल भी कांग्रेस के पक्ष में नहीं हैं. सामाजिक समीकरण में सिर्फ एक व्यापारी वर्ग कुछ परेशान, दिग्भ्रमित सा लग रहा है, पर ये नहीं भूलना चाहिए कि व्यापारी / वणिक वर्ग भाजपा का सबसे पुराना और सबसे विश्वसनीय कट्टर समर्थक रहा है, जो कुछ समय के लिये नाराज तो हो सकता है पर इतना भी नहीं कि वोट न दे. इसके अलावा नौकरियों की कमी और बेरोज़गारी के नाम पर कांग्रेस युवाओं को भरमाने की कोशिश कर तो रही है पर कितनी सफल होगी ये भविष्य बताएगा.

पर मोदी / भाजपा अगले दो सालों में दलित / पिछड़े / गरीब नामक एक बहुत बड़ी constituency पर कब्जा करने जा रही है… 2019 से पहले मोदी, गरीब की रसोई में 5 करोड़ LPG और एक लाख 35 हज़ार रूपए के एक करोड़ घर बनाने जा रहे हैं. ये वो वर्ग है जो आज तक कांग्रेस, सपा, बसपा को वोट देता आया है, भाजपा बहुत तेजी से गरीब की झोपड़ी में घुस रही है.

अभी आप लोगों को दिख नहीं रहा है… पर फिक्र नहीं… जल्दी ही दिखने लगेगा… अभी पूरे 6 महीने बाकी हैं. याद कीजिये, मोदी ने कहा था 4 साल काम करूंगा, 5वें साल राजनीति… May 2018 के बाद मोदी धुआंधार बैटिंग करेंगे…

बाकी रही बात गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल की… तो वो तो जीता हुआ है…
गुजरात – 135 – 140 सीट
हिमाचल – 2/3 बहुमत
कर्नाटक – क्लीन स्वीप
लोकसभा 2019 – 350+ सीट
स्क्रीन शॉट ले लो… काम आएगा.

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