साहेब कुछ करिए! ब्यूरोक्रेसी तो कर रही है आपके जाने का इंतज़ार और इंतज़ाम

एक उपचुनाव के परिणाम पर देश के भविष्य और मोदी जी और भाजपा के पतन की भविष्यवाणी करने वालों में नहीं हूँ. ना ही काँग्रेस को भाजपा से बेहतर घोषित करने की स्थिति ही आई है.

चुनावों को परे कर के भी सोचूँ तो अलग-अलग कारणों से अधिकाँश जनता का भाजपा से थोड़ा या ज्यादा मोहभंग तो हुआ है. कुछ के व्यक्तिगत या व्यावसायिक कारण हैं, कुछ शॉर्ट टर्म फायदे-नुकसान से प्रभावित होंगे. पर मेरी शिकायत की वजह बिल्कुल वही है जो 2014 में समर्थन की वजह थी.

2014 का चुनाव देश के लिए सिर्फ यह चुनने का सवाल नहीं था कि इस देश को अगले 5 साल कौन चलाएगा. बल्कि यह प्रश्न था कि देश रहेगा या नष्ट हो जाएगा. यह सरकार चुनने के लिए किया हुआ श्रम नहीं था, अस्तित्व रक्षा का संघर्ष था.

सरकार बनाने के बाद से आज तक मोदीजी का जो स्टैंड रहा है, यह स्पष्ट है कि वे अपने रोल को उस रूप में नहीं लेते जिस रूप में हमने लिया. वे अपने आप को वर्तमान व्यवस्था के अंदर सक्षम रूप से सरकार चलाने वाला एक एग्जेक्युटिव ही मानते हैं.

उनके ‘प्रधान सेवक’ होने के दावे के पीछे जो विनम्रता है, उस विनम्रता के नीचे छिपी हुई एक दीनता भी है…. भाई, हम तो एक प्रधानमंत्री मात्र हैं… कोई देश के मालिक थोड़े हैं… पूरी व्यवस्था हम ही नहीं हैं.

अगर कार्यपालिका अपनी गति से काम करती है तो हम क्या करें… अगर न्यायपालिका ऊलजलूल निर्णय देकर शासन कार्य में बाधा डालती है, देश की सुरक्षा को खतरे में डालती है तो हम क्या करें…. हम तो ईमानदारी से दिन में 18 घंटे काम करते हैं… हममें कोई कसर रह गई हो तो बोलिये…

पर जनता को उत्तरदायी यह ब्यूरोक्रेसी नहीं है. वह पहले रुपये का 80 पैसा खा जाती थी, आज भी 40 पैसा खाकर खुश है… आपके जाने का इंतज़ार और इंतज़ाम कर रही है जब फिर से 80 पैसा खाने मिलेगा.

न्यायपालिका की तो कोई जिम्मेदारी है ही नहीं… होती तो अदालतों में मुकदमे एक व्यक्ति की औसत आयु से अधिक समय से नहीं लटके होते. वे कुछ भी फैसला दे सकते हैं… किसी जज को तो कभी गलत निर्णयों के लिए कोई सजा नहीं होती. उनका जमा जमाया खानदानी खेल है.

मीडिया की एकाउंटेबिलिटी का तो कहना ही क्या! वे झूठी न्यूज़ चलाएँ, देश में जातिवाद फैलाएँ, आतंकियों की पैरवी करें… जो मर्जी करें… कोई उनपर उंगली नहीं उठा सकता…

पर सबके किये का देश के स्वास्थ्य पर असर होता ही है. और सबके किये की जवाबदेही आपकी है. जनता 5 साल बाद जवाब मांगेगी तो प्रधानमंत्री से ही मांगेगी. फिर यह नहीं पूछेगी कि आप कितनी विनम्रता से प्रधानसेवक बन कर काम करते रहे.

मुझे मोदी को व्यक्तिगत रूप से पसंद-नापसंद करने का शौक नहीं है. मोदी का समर्थन इसलिए कि उनसे अपेक्षाएँ हैं… निराशा इसलिए कि वे अपेक्षाएँ पूरी नहीं होती दीख रही और आज हम उस विनाश के ज्यादा करीब हैं, जितने 2014 में थे. टैक्स, काला धन, बैंकिंग, टॉयलेट वगैरह-वगैरह में उलझे प्रधानमंत्री को यह मुझसे ज्यादा साफ साफ दिखाई देता होगा.

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