दिवाली की सफाई : रिश्तों पर जमी धूल भी पोंछते रहो, तो चमक बनी रहती है

अंततः दीवाली भी आ गई. मैंने पूरे जोशो-खरोश से सफाई मुहिम संभाली. माया को ललकारा-” निकालो सब सामान अलमारियों से. पता नहीं कितना कबाड़ भरा पड़ा है. फेंको सब.”

माया ने मेरी बिटिया के कमरे की अलमारियों का सामान निकालना शुरू किया- कुछ बड़े-बड़े पॉलीथिन बैग एहतियात से सहेजे हुए.कार्ड बोर्ड के बड़े-बड़े डिब्बे जो सुतली से बंधे हुए थे , जिन्हें निश्चित रूप से कई सालों से मैं ही बांधती आरही हूँ.

माया ने पूछा-” दीदी, आप देखेंगी या सब फ़ेंक देना है?” मन नहीं माना. देखना शुरू किया. लगा यहाँ तो यादें बंधी पड़ीं हैं.

पहला बण्डल खोला, तो उसमें से तमाम वे ड्राइंग निकलीं जो उसने स्कूल के शुरूआती दिनों में बनाईं थीं, आड़ी-तिरछी लकीरें जो पहली बार खींचीं थीं. फिर बाँध दिया उसे, ज्यों का त्यों……

दूसरा बण्डल…. देशबंधु के दिनों में लिए गए तमाम हस्तियों के साक्षात्कारों वाली डायरियां जिनकी अब कोई उपयोगिता नहीं क्योंकि वे प्रकाशित हो चुके हैं, तमाम इनविटेशन कार्ड्स…. तानसेन समारोह, खजुराहो नृत्योत्सव, अलाउद्दीनखां संगीत समारोह, नाट्य समारोह, आकाशवाणी कॉन्सर्ट, और भी पता नहीं क्या-क्या….

तीसरा बण्डल…. विधु के किचेन सेट, टी-सेट, बार्बी के कपड़े, ढ़ेरों खिलौने बांटे, लेकिन कुछ खिलौने सहेज लिये हैं मैने विधु के, उसके बचपन की यादों के तौर पर.

चॉकलेट के डिब्बे, जिन्हें उनकी सुंदरता के कारण रखा गया था, सोच के की किसी काम आयेंगे, जो आज तक किसी काम न आ सके, फिर सहेज दिए मिठाई का एक डिब्बा जो इतना खूबसूरत था , कि न मुझसे तीन साल पहले जब आया थे तब फेंका गया, न आज फेंक सकी.

कुछ देने लायक़ सामान आज भी दिया, लेकिन जो सहेजा था वो वहीं रह गया. विधु की अलमारी फिर ज्यों की त्यों सामान से भर गई थी. बस फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि हर सामान पर से धूल हटा दी गई थी. सब कुछ फिर चमकने लगा था.

मन में कोई शर्मिंदगी भी नहीं थी, कबाड़ न फेंक पाने की. पता नहीं क्यों सामान सहेजते-सहेजते मुझे रिश्ते याद आने लगे.

हम रिश्तों को भी तो ऐसे ही सहेजते हैं….. जितना पुराना रिश्ता, उतना मजबूत. हमेशा रिश्तों पर जमी धूल भी पोंछते रहो तो चमक बनी रहती है… फिर ये रिश्ते चाहे सगे हों या पड़ोसी से!

  • वंदना अवस्थी दुबे

कहीं जीना तो नहीं भूल गए आप

 

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