भाजपा के खिलाफ़ कांग्रेस और कांग्रेस पोषित मीडिया के कुतर्क

1. जब भाजपा ने पहली बार गुजरात, एमपी, यूपी जैसे बड़े राज्यों में और अन्य राज्यों में सरकार बनायी. तब भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी… साम्प्रदायिक दंगों पर लगाम कसना. काँग्रेस के ज़माने में जो दंगों का औसत था भाजपा उसे 15-20% पर ले आयी थी और कहीं-कहीं तो शून्य से 5% तक. केशुभाई पटेल, सुन्दरलाल पटवा और कल्याण सिंह की सरकारों का अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से रेकॉर्ड बहुत बेहतरीन था.

जब भाजपा ने इसे अपनी उपलब्धि बताया, कानून व्यवस्था पर नियंत्रण में खुद को काँग्रेस से अधिक सक्षम बताया तब… तब कांग्रेसियों ने इस सच्चाई से मुँह छुपाने के लिये एक कुर्तक गढ़ा… ‘जब दंगे करने वाले ही सत्ता में आ गये तो दंगे कौन करेगा ?’…

यानि इनके कहने का मतलब था कि जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन’ से लेकर भागलपुर, अहमदाबाद, कलकत्ता, अलीगढ़ तक 90 के दशक के पहले जितने भी दंगे हुए थे, वो सब हिन्दूओं ने किये थे, मतलब RSS या भाजपा ने किये थे! इनके मुताबिक मुसलमान तो कभी दंगा करता ही नहीं था. ये था सॉलिड कुतर्क. तो फिर गोधरा में ट्रेन को जलाकर दंगों की शुरुआत करने वाले कौन थे? क्योंकि कथित दंगा करने वाले तो सत्ता में थे!

2. भाजपा को हर वक्त, हर हाल में सत्ता से दूर रखने के लिये ‘साम्प्रदायिक शक्तियों’ को रोकने का कुतर्क!!

जिस भाजपा की गुजरात में सरकार थी, एमपी, यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल में सरकार थी, उस भाजपा को 150 से ज्यादा लोकसभा सीट जीतने के बाद भी ‘साम्प्रदायिक पार्टी’ होने का आरोप लगाकर उसे सत्ता से दूर रखने के लिये सभी चोर-लुटेरी पार्टियों का एकजुट होने का नाटक सभी ने देखा है.

यहाँ भी ये कुतर्क भाजपा पर आरोप नहीं होता है, ये आरोप उन लाखों-करोड़ों मतदाताओं पर होता है जो तब भाजपा को वोट देते थे या आज भी भाजपा को वोट देते है. ये आम लोगों द्वारा चुने गये विधायकों और सांसदों को ‘साम्प्रदायिक शक्ति’ कहकर खारिज करने का काँग्रेस, उन्ही के पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का ‘ठोस कुतर्क’ था जिसे इन्होंने हमेशा जमकर भुनाया भी. ये देश के हिन्दुओं के मुँह पर सरासर जूता मारने का काम था.

3. सोशल मीडिया पर पिछले दो साल से भाजपा समर्थकों को ‘गालीबाज’ कहकर खारिज करने का कुतर्क! माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जैसे भारत में गालियों का अविष्कार ही 2014 के बाद हुआ और वो भी भाजपा समर्थकों ने किया. सत्ता की दलाली करने वाले पत्रकार और कथित बुद्धिजीवियों ने जब ‘मेन स्ट्रीम मीडिया’ के बाद सोशल मीडिया पर भी कब्जा कर अपना एजेंडा थोपने की कोशिश की तो यहाँ आम लोगों ने इनकी वॉल और इनके पेज तक पहुँच होने के कारण इन्हें आईना दिखाना शुरू कर दिया.

इन्हें सिर्फ सवाल करने की आदत थी और मुद्दे थोपने की. जवाब सुनने की इन्हें आदत नहीं थी. जब सीधे इनके मुँह पर सवाल किये जाने लगे, जवाब माँगे जाने लगे तो इन्होने हजारों कमेंट में से 100-150 कमेंट के आधार पर सभी को गालीबाज घोषित कर अपना मुँह छुपाने का रास्ता ढूँढ लिया.. जबकि ‘गालीबाजों का गैंग’ इनके पास ही होता है.

4. इसी क्रम में चौथा कुतर्क ‘द वायर’ नाम का पोर्टल चलाने वाले विनोद दुआ ने दिया है. अमित शाह के बेटे पर झूठा आरोप लगाकर ‘100 करोड़’ के मानहानि का केस झेल रहे और लोगों की खिंचाई (जमीर दिखाई) से छटपटाये विनोद दुआ का नया कुतर्क है … ‘ट्रोल्स यानि खिंचाई करने वालों को गम्भीरता से लेने की कोई ज़रूरत नहीं है. ये ऑनलाइन गुंडे है. ट्रोल करने वाले वो बंदर है जिनके हाथ सोशल मीडिया का उस्तरा लग गया है.’

अब कोई इन ‘काँग्रेस चरण पूजक’ पत्रकार को समझाये कि सोशल मीडिया में जो लोग लिखते है, वो लोग लिखने के लिये आपकी तरह ‘फंड’ ले लेकर ‘सुपारी पोर्टल’ नहीं चला रहे है. यहाँ लिखने वाली भारत की आम जनता है, वो आम जनता जिससे तुम्हारी पत्रकारिता का कभी वास्ता ही नहीं रहा है. यहाँ लिखने वाले सभी स्वतंत्र सोच रखने वाले, खुद की खुशी के लिये लिखने वाले लोग है… तुम्हारी तरह कठपुतली और अपने मालिकों और उनके भी मालिकों को खुश करने के लिये लिखने वाले नही.

यहाँ भी विनोद दुआ अपने इस कुतर्क से यही कहना चाहते हैं कि आम जनता की इनके आगे कोई औकात नहीं है. अगर इन्हें ट्रोल किया जा रहा है तो ये लोग तो बंदर है जिन्हें उस्तरा मिल गया है. मिस्टर दुआ… उस्तरा तो आपने धार लगाकर तैयार किया था अपने मालिकों से फंड लेकर, लेकिन अब जब आप अपना ही कान काट बैठे हो तो पहले बहता खून रोकिए, जख्म का इलाज करवाइये, नहीं तो सेप्टिक हो जायेगा. हमारी फिक्र करना छोडिए. हम कोई सर्टिफाइड दलाल नहीं है.

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