द्वारसैनी माई : हलेलुइया वालों, कभी शूद्र पुजारी से प्रसाद पाना हो तो यहाँ आ जाना

द्वारसैनी माई मंदिर झारखंड

“हे गंगवों (पूरी महतो बिरादरी)! तुम चाहे जितना भी उछल लो रहोगे तो शूद्र के शूद्र ही!! तुम हिन्दू-हिन्दू करने से कोई ब्राह्मण नहीं बन जाओगे… करोगे तो उनकी गुलामी ही… चरण में लोटोगे… किसी मंदिर का पुजारी बन के दिखाओ अगर तुम्हारी इतनी ही हिम्मत है तो… तुम शूद्रों को किसी मंदिर में पोछा लगाने का भी हक़ नहीं. पुजारी बनने की तो सोचो ही मत!!”

तमाम कन्वर्टेड करिया ईसाइयों के मुखारबिंद से ये एक रटे-रटाये ब्रह्म वाक्य की तरह निकलता रहता हम तमाम गंगवों (महतो) के लिए… अब इसमें कुछ गंगवा असहाय से हो जाते और चुप्पी देख करिया क्रॉस वाले हुँआ-हुँआ करना शुरू हो जाते… तो उन तमाम कन्वर्टेड करियों के लिए ये रहा… जरा आँख खुली कर के पढ़ो और आगे बोलने से पहले जरा कुछ आशीष पानी छींट के पी-पा के बोलना…

झारखंड के गिरिडीह जिला के बगोदर थाना अंतर्गत बेको गाँव स्थित सोना पहाड़ी मन्दिर… द्वारसैनी माई और द्वारसैनी बाबा का मंदिर… जी टी रोड से गुजरियेगा तो आपको रोड से ही सोना पहाड़ी के चोटी पर स्थित द्वारसैनी माई / बाबा का मंदिर दिख जायेगा… बहुत ही प्रसिद्ध मन्दिर है… बहुत दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं यहाँ… मन्नत मांगते हैं… और मन्नत पूरी होते ही सब यहाँ आते है पूजा करने को…

गिरिडीह, धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, रामगढ़, बंगाल से भी श्रद्धालु आते हैं यहाँ… खूब भीड़ रहती सालों भर यहाँ इस द्वारसैनी माई मंदिर प्रांगण में.. हम खुद यहाँ दो बार जा चुके हैं अपने घर की मन्नत पूर्ति के कारण… झारखंड के प्रसिद्ध मंदिरों में गिने तो सोना पहाड़ी मन्दिर उनमें से एक आयेगा… बड़े-बड़े नेता विधायक भी यहाँ मत्था टेकने मन्नत मांगने आते हैं.

अब इतना प्रसिद्ध मंदिर है तो किसी भी के मन उठेगा कि यहाँ के पुजारी कौन है? अब पुजारी कौन होता है… कोई ब्राह्मण ही होगा न!… नहीं.

यहाँ के मुख्य पुजारी श्री कुंज बिहारी महतो जी है… जो कुड़मी जाति से आते है जिसमें से कि मैं भी आता हूँ जिसको कि ‘शूद्र गंगवा’ बोल के संबोधित किया जाता कुछ (सभी) हलेलुइया वालों द्वारा… तो शूद्र कुंज बिहारी महतो जी इस द्वारसैनी माई मंदिर के वर्तमान मुख्य पुजारी है. और यहाँ कोई ब्राह्मण पुजारी नहीं है…

इस मंदिर की स्थापना श्री दयाल चौधरी जी ने सन 1663 ईस्वी में कराई था जो कि कुड़मी ही थे… तो ये आज का तो मंदिर नहीं है!.. अंग्रेज तो तब भारत में आये-आये ही थे उस वक़्त… और हमें बताया जाता है कि हमें घुसने न दिया जाता था मंदिर में!!! जबकि हम ही मन्दिर निर्माण करते थे और खुद पुजारी भी होते थे/हैं.

इसके अलावा भी ऐसे कितने ही मंदिर हैं जहाँ पुजारी महतो लोग हैं… तो इधर पेपर में एक न्यूज सर्कुलेट हो रहा कि ‘पहला दलित पुजारी’… अरे काहे का पहला… कभी गाँव देहातों में घूमिये ऐसे कितने ही पुजारी मिल जाया करेंगे!…

झारखंड का सबसे प्रसिद्ध मंदिर है रजरप्पा का छिन्नमस्तिका मंदिर… जब साल में एक बार मुख्य पूजा (चैत्र षष्ठी/सप्तमी) होती है तो वहाँ का संथाल मुर्मू परिवार ही पूजा करता है और तब ब्राह्मण लोग उपस्थित नहीं रहते वहाँ…

राँची का देवरी मंदिर जहां क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी पूजा करने जाते रहते हैं, उसका मुख्य पुजारी पाहान है जो मुंडा जनजाति से आते हैं… इसके अलावे गुमला के टांगीनाथ धाम का पुजारी भी पाहान है… और भी इस तरह के बहुत है.

तो करिया हलेलुइया वालों, अब जब कभी भी शूद्र महतो पुजारी के यहाँ से प्रसाद खाना है तो निःसंकोच कभी भी पधारिये हमारे सोना पहाड़ी द्वारसैनी माई / बाबा के मंदिर में… सदैव स्वागत है आप सब का. जय द्वारसैनी माई, बाबा.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY