पटाखा बैन की याचिका लगाने वाले मासूमों ने अनजाने ही कमा लीं लाखों बददुआएं

NCR में आतिशबाजी की बिक्री पर सोशल मीडिया पर कितना भी शोर शराबा करें कि यों खरीदेंगे… ऐसे चलाएंगे , लेकिन बावजूद पटाखे चलाने पर रोक ना होते हुये भी इतना निश्चित है कि दिल्ली के बहुत बड़े वर्ग के बच्चों की दीवाली का पूरा मज़ा किरकिरा हो गया… वे निश्चित रूप से पटाखे नहीं चला पाएंगे…

अंततः पटाखे बेचना कोई आसान काम नहीं है… बेचने पर कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट ही नहीं बल्कि एक्सप्लोसिव एक्ट का पहाड़ सा अवरोध आतिशबाजी विक्रेता को पार करना होगा, जिसमें कि सीधे माल की जब्ती और नॉन बेलेबल धारा में गिरफ्तारी होती है…

यद्यपि बड़े पैमाने पर उल्लंघन के चलते इस प्रकार की कार्यवाही की संभावना कम ही होती है… सो कुछ दुकानदार चोरी छिपे होम डिलीवरी जैसे फंडे से दुकानदारी कर भी लें लेकिन नहीं लगता कोई सामान्य दुकानदार लाखों के माल की जब्ती और त्योहार पर जेल जाने की जोखिम लेगा… वो तो बस पेट पर हाथ रख मी लॉर्ड को लाखों लाख बददुआएं देकर दिवाली मनाएंगे.

अंततः दिवाली पर आतिशबाजी की बिक्री से कुछ दुकानदारों की साल भर की रोटी, तो अधिकांश के तमाम खर्चों की पूर्ति का सहारा बनती है… पर कोर्ट का आदेश दिल्ली के दसियों हजार छोटे बड़े फड़ से लेकर स्थायी दुकानदारों की दीवाली काली करने वाला ही साबित हो रहा है…

कोर्ट की मनमानी का सबसे ज्यादा असर बच्चों की खुशियों पर पड़ा है… घर में होने वाली सफाई… बनने वाली मिठाई… आने वाले कपड़ों जैसी बातों से बच्चों को कोई मतलब नहीं रहता… वे तो दिवाली का इंतजार महीनों से केवल आतिशबाजी के लिए ही करते हैं…

किसी आतिशबाजी की दुकान पर जो ग्राहक आते हैं उनमें एक वर्ग तो वो होता है जो फड़ पर आता है और… “इसे उठाओ… उसे लाओ… वो हंड्रेड साउंड कहाँ है… वो रंगीन अनार… वो सीता गीता… वो रॉकेट… हाँ इसे भी डाल दो…“ आदि आदि कहता हुआ कार्टून या थैले पैक करा दुकानदार से पैसे पूछ थोड़ा सा डिस्काउंटेड भुगतान करके चल देता है.

ये वर्ग दो हजार से बीस पच्चीस हजार तक का होता है… मुझे लगता है इस वर्ग पर कोर्ट के आदेश का कोई फर्क नहीं पड़ना. इनकी दीवाली पहले जैसी ही धूँ-धड़ाक वाली होगी.

एक वर्ग वो होता है जिसके साथ बच्चे आते हैं… बच्चे जिद कर कर के सामान निकलवाते चले जाते हैं… साथ आये पापाजी बच्चे की ओर आँख भी निकालते हैं… हल्के से डांटते भी हैं लेकिन कुल मिला कर बच्चों का मन रखने के लिए जेब के संकरेपन को इगनोर करते हुये हजार से 5 हजार तक की ख्ररीददारी कराके ले जाते हैं… इनके लिए बच्चों की खुशी सबसे बड़ी खुशी होती है.

कुछ बच्चे आते हैं डरते झेंपते हुये दुकान पर… आठ दस सामान को उठा कर पलट कर उसमें से दो तीन तरह के सामान ले जाते हैं… इनका बिल बैठता है सौ से लेकर पाँच सौ रूपये तक… लेकिन इतने कम रूपयों का सामान खरीद कर भी इनके चेहरों की खुशी उस पहले वाले पच्चीस हजार वाले से कहीं ज्यादा होती है.

इन दोनों वर्ग के बच्चों पर वे 6 और 14 महीने वाले बच्चे वाकई बहुत भारी पड़े हैं… इनकी दीवाली का मज़ा तो खत्म ही मानो… पता नहीं मासूम से भी ज्यादा मासूम इन बच्चों के खाते में कितनी लाख बददुआएँ इनके माँ बाप ने जमा करा दी हैं.

एक वर्ग और भी होता है… मेरे आंकलन से ये वर्ग बहुत बड़ा होता है… ये वर्ग दीवाली पर हर तरह के खर्चे करता है… सफाई, मिठाई, रोशनी यहाँ तक कि दारू सारू और जुए पर भी अच्छा खासा खर्चा करने के बावजूद इनके लिए आतिशबाज़ी पर खर्चा सबसे बड़ी फिजूल खर्ची है… दूसरों को पटाखे छुड़ाते देख खुश होंगे…, लेकिन बच्चों को दिलवाने के नाम पर इन पर मौत पड़ती है…

कोर्ट के इस आदेश से इनकी नेकी आ गयी है… इनकी कुंठा के लिए कोर्ट का आदेश बहुत बड़ा टॉनिक लेकर आया है… भले ही गली में कोई लड़का घर घर पटाखे लाके दे रहा होगा लेकिन ये उस दिन राष्ट्र के जिम्मेदार नागरिक बनते हुये बच्चों को सर्वाधिक गैर कानूनी और नुकसान देह चीज आतिशबाजी को हाथ भी ना लगाने देंगे…

इस वर्ग के लिए तो प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ का अंतिम दृश्य याद आता है… जब हल्कू सोता रहा, जबरा भागता दौड़ता रहा, उधर नीलगाय पूरा खेत उजाड़ गईं… तब –

“दोनों फिर खेत की डाँड़ पर आए. देखा, सारा खेत रौंदा पड़ा हुआ है और जबरा मड़ैया के नीचे चित्त लेटा है, मानो प्राण ही न हों. दोनों खेत की दशा देख रहे थे.
मुन्नी के मुख पर उदासी छाई थी. पर हल्कू प्रसन्न था.
मुन्नी ने चिंतित होकर कहा – अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी.
हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा – रात की ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा.“

हां जी… NCR के हलकू प्रसन्न हैं – “साली आतिशबाजी खरीदनी तो ना पड़ेगी.”

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