हिंदू चाहें लड़ें या पलायन करें, करना ही पड़ेगा वामपंथी अफीम के नतीजों का सामना

प्रतीकात्मक चित्र

1950 व 60 के दशक में रूस के सुदूर पूर्वी हिस्से के सुदूरतम इलाके में, रूस व चीन को अलग करने वाली उसूरी नदी के तट पर रूसी दिन रात लाउडस्पीकर से चीनी भाषा में पहले से रिकार्ड किए हुए टेप चलाते थे. रूसी बताते थे कि सोवियत धरती तो स्वर्ग से भी बेहतर है. दूध, मांस और वोदका की नदियां बहती हैं.

सीमा के उस पार भूखे नंगे चीनी किसान सोचते थे कि स्वर्ग और उनके बीच बस इतना सा फासला है कि वे किसी तरह नदी पार कर रूसी इलाके में पहुंच जाएं. वे महीनों तक इसके लिए गर्म कपड़े जुटाते, तैयारियां करते और एक दिन रात में पत्नी बच्चों के साथ बर्फानी उसूरी नदी को पार कर रूस में दाखिल हो जाते.

रूसियों ने निगरानी के पुख्ता इंतजाम कर रखे थे. उन्हें रोका नहीं जाता था पर नदी पार करके वे जैसे ही पांच सौ-सात सौ मीटर चलते रूसी फौज उन्हें घेर लेती. खड़े-खड़े उस टुकड़ी का अफसर उन्हें अवैध तरीके से रूस में घुसने के जुर्म में साइबेरिया में 10-15 साल की बामशक्कत कैद की सजा सुना देता. उधर, इन चीनी किसानों के रिश्तेदार यही समझते कि कोई लौट के नहीं आता तो इसका मतलब यही है कि रूस में साम्यवादी स्वर्ग की स्थापना हो चुकी है. वो भी बोरिया बिस्तर बांध कर उसूरी नदी पार करने के इंतजाम में जुट जाते.

रूस में उन दिनों काम करने वाले हाथों का घोर अकाल था. इसलिए स्वर्ग का सपना दिखा कर इन भोले चीनी किसानों को लुभाया गया और फिर मरने-खटने के लिए साइबेरिया भेज दिया गया. सजा पूरी करने के बाद इन मेहनती किसानों को साइबेरिया में ही खेती करने के लिए जमीन आवंटित कर दी गई. इनमें से जिनके बच्चे बड़े हो गए उन्होंने रूसी महिलाओं से विवाह किया और धीरे-धीरे व्लाडीवोस्टक के आस पास इनकी तादाद अब खासी हो गई है.

पर एक बार जम जाने और संचार के साधनों के विकास के साथ ही इन्होंने फिर से चीन में अपने परिजनों व रिश्तेदारों से संपर्क साधे और उनके साथ व्यापारिक रिश्ते बनाने शुरू किए. इस प्रक्रिया में चीन से माल और पैसे की आवाजाही बढ़ी तो साथ में चीनी ट्रियाड (अपने यहां जिन्हें माफिया कहते हैं) ने भी दस्तक दी. धीरे-धीरे इस ट्रियाड ने हिंसा और अपराध के लिए कुख्यात व्लाडीवोस्टक से रूसी, चेचेन और उजबेक माफिया का खात्मा कर दिया.

चीनी ट्रियाड इन हिंसक चेचेनों और रूसियों से इस मामले में अलग था कि ये चुपचाप काम करते थे और ऐसा कुछ नहीं करते थे जिससे वे बेवजह चर्चा में आएं. इनसे तो पुलिस भी खुश थी. अच्छे माफिया!

अब व्लाडीवोस्टक के जुआ घरों, चकला घरों और ड्रग, लकड़ी व कारों की तस्करी पर ट्रियाड का एकाधिकार है. जुआ घरों व चकलाघरों के कारण चीनी पर्यटकों की आवाजाही खूब बढ़ी है. ट्रियाड पहले कारों के कल पुर्जों की तस्करी करता था जो व्लाडीवोस्टक में असेंबल किए जाते थे. अब सीधे-सीधे चीनी कारें व्लाडीवोस्टक पहुंच जाती हैं.

मछली पकड़ने के व्यवसाय में ट्रियाड हावी है और मछलियां जापान व दक्षिण कोरिया को तस्करी से भेजी जाती हैं. सड़क पर स्टाल लगाने वाले सभी चीनियों को ट्रियाड को प्रोटेक्शन मनी देना पड़ता है. व्लाडीवोस्टक के आस पास के कस्बों में जहां चीनी बहुसंख्या में हो चुके हैं, वहां रूसी दुकानदारों को भी प्रोटेक्शन मनी देनी पड़ रही है.

व्लाडीवोस्टक, जहां 1930 तक एक भी चीनी नहीं था, के इस हाल पर कई खोजी रपटें छप चुकी हैं दुनिया के तमाम बड़े अखबारों में. ट्रियाड की सरकार भले न हो, पर सरकार वे ही चला रहे हैं. दबदबा इतना है कि वे स्थानीय पुलिस ट्रियाड के अस्तित्व को ही सिरे से नकार देते हैं और सीना ठोंक के कहती है कि व्लाडीवोस्टक में सर्वत्र शांति है. बस ये नहीं बताते कि शांति चीनी ट्रियाड की वजह से है. स्थानीय निवासी आशंकित हैं कि कहीं एक दिन उनके सामने घर बार छोड़ने की नौबत न आ जाए.

पर इतना बताने का मतलब क्या सिर्फ ज्ञान बघारना था? व्लाडीवोस्टक में जो दिख रहा है वह मामूली है, अगर इसकी तुलना बंगाल के मालदा और मुर्शिदाबाद से करें. ड्रग, हथियार, मवेशियों और जाली नोटों की तस्करी का धंधा खुलेआम चालू है पर मजाल क्या कि कोई चूं कर ले.

भविष्य के संकेत स्पष्ट हैं. बंगाल के तीन जिले मुस्लिम बहुत हो चुके हैं और मुसलमानों की आबादी बढ़ने की रफ्तार यही रही तो 2031 तक बंगाल के छह सीमाई जिले मुस्लिम बहुल हो जाएंगे. फिर प्रशासन भारत का और सरकार घुसपैठियों की.

और हां एक खास समुदाय के लोगों को घर-बार छोड़ कर भागना भी पड़ेगा. बंगाल में जो हो चुका है अब उसे पलटा नहीं जा सकता. आम हिंदू बंगाली को अब सेकुलर-वामपंथी अफीम के नतीजों का सामना करना ही पड़ेगा. वो चाहें लड़ें या पलायन करें. कम्युनिस्ट दोनों ही जगहों पर अपना खेल करने के बाद निकल चुके हैं.

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