मेकिंग इंडिया गीतमाला : साँसों से उलझी रहे मेरी सांसें

ख़ुदा ने तलब की स्याही को बहुत गाढ़ा रंग दे दिया था. लेकिन अक्षरों को गाढ़ा और बड़ा लिखने से उनके अर्थों के वजूद को छोटा या बड़ा नहीं किया जा सकता.

यहीं पर आकर अक्षरों की सीमा शुरू हो जाती है. सागर को बूँद बूँद से नापा जा सकता होता तो उन दोनों की जन्मों की प्यास को एक एक अक्षर में पिरोकर ख़ुदा ने कोई महाग्रंथ रच दिया होता.

आज भी एक एक हर्फ़ उनके लबों की तलब में डूबकर किनारे पर आ रहे थे और किनारों पर आती लहरों में कितनी ही नज़्में अपने पैर डाले खड़ी थी.

और सागर के वजूद से दुआ उठाती रही कि इस वक़्त दुनियावी या क़ायानाती किसी भी अर्थ में कोई प्यास फ़ना होने को तड़प रही हो तो उसे किनारों के वो अक्षर नसीब हों, जहाँ से सुकून के अर्थोवाली किसी लहर का दीदार होता है और वजूद अनंत की यात्रा को चल देता है, जहाँ खुदा भी इंतज़ार में बैठा है कि कोई नया अर्थ जुड़ जाए तो उन दोनों की जन्मों की प्यास को बयान कर सकूं.

धागे तोड़ लाओ चाँदनी से नूर के
घूंघट ही बना लो रोशनी से नूर के
शर्मा गयी तो आगोश में लो
साँसों से उलझी रहे मेरी सांसें
बोल ना हलके-हलके, बोल ना हलके-हलके,
होंठ से हलके-हलके, बोल ना हलके

आ नींद का सौदा करें, इक ख्वाब दें, इक ख्वाब लें
इक ख्वाब तो आँखों में है, इक चाँद के तकिये तलें
कितने दिनों से ये आसमान भी सोया नहीं है, इसको सुला दें
बोल ना हलके हलके…

उम्र लगी कहते हुए, दो लफ्ज़ थे इक बात थी
वो इक दिन सौ साल का, सौ साल की वो रात थी
कैसा लगे जो चुप-चाप दोनों, पल-पल में पूरी सदियाँ बिता दें
बोल ना हलके हलके…

 

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY