चीन की काली करतूत : Ozone की पर्त में फिर से कर दिया बड़ा छेद!

Ozone Layer

जी हाँ, यह सच है कि चीन की काली करतूत के कारण उत्तरी ध्रुव के ऊपर पृथ्वी से 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर वायुमण्डल में फैली Ozone गैस की पर्त में बहुत बडा छेद हो गया है. यह छेद अब इतना बड़ा हो गया है कि लगभग पूरा कनाडा, आधा यूरोप जापान सहित आधा रूस इसकी चपेट में आ रहा है.

इस छेद में से होकर सूर्य की किरणों में छुपी Ultra-Violet किरणें सीधे जमीन पर आने लगी हैं. यह किरणें पूरे पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव डाल रही हैं. इन जहरीली पराबैगनी किरणों से मानव शरीर में त्वचा का केन्सर रोग और खाद्यान्न उत्पादन में तथा वन सम्पदा में क्लोरोफिल की अप्रत्याशित कमी होने के कारण वायुमण्डल का कार्बन डाय आक्साइड़ तथा आक्सीजन का सन्तुलन डगमगाने लगा है.

इस अचानक पकड़ी गई गडबड़ी में पूरी तरह चीन जिम्मेदार है और अब पृथ्वी के वायुमण्ड़ल का तापमान पूर्व अनुमान से ज्यादा और तेजी से बढ़ने लगेगा. चीन की इस काली करतूत से अब उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव की बर्फ तेजी से पिघलेगी और अगले 30 साल के भीतर समुद्र का जल स्तर बढ़कर पृथ्वी पर जल प्रलय ले आयेगा.

चीन की इस खतरनाक करतूत का रहस्योदघाटन उस समय हुआ जब Journal of atmospheric chemistry and physics के ताजा अंक में 12 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित रिसर्च पेपर में Ozone की पर्त में हो रहे नए छेद की विस्तृत जानकारी प्रकाशित हुई.

Ozone की पर्त हमारी पृथ्वी के लिये ठीक उसी तरह काम करती है जिस प्रकार से हमारे शरीर पर अपनी त्वचा या चमड़ी काम करती है. इस Ozon की पर्त के कारण अन्तरिक्ष से आने वाला पूरा विषैला विकिरण ऊपर ही रूक जाता है और धरती के जीव जन्तुओ, पेड़ पौधे आदि के जीवन को सुरक्षित बनाए रखता है.

Ozone की पर्त की क्षति को रोकने के लिए तीस साल पहले कनाडा के शहर मॉन्ट्रीयल में विश्व के सभी देशों ने एक समझौता किया. इसे मॉन्ट्रीयल समझौता कहा जाता है. इस समझौते के फलस्वरूप “क्लेरोफ्लोरो कार्बन“ कहे जाने वाले रसायनों का उपयोग धीरे धीरे सभी देशों ने सीमित कर दिया. एक बडी उम्मीद जागी और देखते ही देखते क्षतिग्रस्त Ozone के छेद में दुरूस्ती होने लगी.

पिछले कुछ वर्षों में Ozone की पर्त का छेद फिर से धीरे धीरे बढ़ने लगा है. इससे दुनिया के वैज्ञानिकों को चिन्ता सताने लगी. पूर्वी एन्जिलिया विवि के वैज्ञानिक डॉ. डेविड ओनम के नेतृत्व में विश्व के विख्यात विशेषज्ञों की टीम का गठन किया गया. वर्षों के शोध कार्यों और वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद जो नतीजे सामने आए बहुत ही चौंकाने वाले हैं.

यह पूरे रिजल्ट वायुमण्डलीय रसायन और भौतिकी के अतिप्रतिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय जरनल में अभी दो दिन पहले ही (12 अक्टूबर 2017) को प्रकाशित किये गए हैं. इस अध्ययन ने यह सिद्ध कर दिया है कि चीन द्वारा विशाल मात्रा में “डाय-क्लोरो-मीथेन “ नामक रसायन का उपयोग किया जाता है. इस रसायन का औद्यौगिक उपयोग रंग रोगन, खेतीहर कीटनाशक गैसों और बड़े पैमाने पर दवा दारू बनाने में किया जा रहा है. मॉन्ट्रीयल प्रोटोकॉल में इस रसायन के उपयोग पर बन्दिश नहीं लगाई गई थी , क्योंकि अभी तक यह माना जाता था कि यह रसायन ‘स्ट्रेटोस्फीयर’ अर्थात बाहरी वायुमण्डल तक पहुँचते-पहुँचते विघटित हो जाता है. पर चीन द्वारा पूरी दुनिया में जितना डायक्लोरोमीथेन का औद्योगिक उपयोग होता है उसका लगभग 60 प्रतिशत उपयोग अकेले चीन द्वारा वर्तमान में हो रहा है.

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण इस समय चीन में होता है. चीन भविष्य की कोई चिन्ता किये बिना जिस तरह से वायुमण्डल में जहर घोलता जा रहा है उससे वह केवल खुद के पैर में कुल्हाडी ही नहीं मार रहा बल्कि पूरी दुनिया के मानव जीवन को संकट में डाल रहा है.

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