लीडरशिप-1 : पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण, विफल नेतृत्व हो तो यही होता है

आज लीडरशिप पर ये सीरीज़ शुरू करने जा रहा हूँ. तो बरबस एक शेर याद आ गया. उर्दू के मशहूर शायर जनाब मुज़फ्फर रज़मी साहब का बहुत मशहूर शेर है –
ये जब्र भी देखा तारीख़ की नज़रों ने
लमहों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई.

नेतृत्व जब फेल होता है तो उसकी सज़ा सदियों तक उसके अनुयायियों को भुगतनी पड़ती है. एक पिता अगर फेल होता है तो सज़ा सारा परिवार भुगतता है. कोई राष्ट्रीय नेतृत्व अगर फेल होता है तो उसकी सज़ा पूरा राष्ट्र भुगतता है.

कल 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का इतिहास पढ़ रहा था. पाकिस्तानी जनरल आमिर अब्दुल्लाह खान नियाज़ी के पास लगभग 26,000 सशस्त्र सैनिक अकेले ढाका में मौजूद थे. 16 दिसंबर 1971 को जनरल जैकब जब नियाज़ी से मिलने पहुंचे तो निहत्थे थे. उनके हाथ मे रिवाल्वर तो छोड़ो डंडा तक न था. अकेले थे. साथ मे सिर्फ एक स्टाफ ऑफिसर था, वो भी निहत्था.

3000 भारतीय सैनिक ढाका से 45 किलोमीटर दूर बैठे थे, अगले आदेश की प्रतीक्षा में. नियाज़ी ने संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा था. जनरल जैकब अकेले और निहत्थे ही पूर्ण आत्मसमर्पण (Total Complete Surrender) का प्रस्ताव ले के पहुंच गए. दुश्मन की मांद में. मीटिंग ढाका में पाकिस्तान सेना के मुख्यालय में नियाज़ी के दफ्तर में थी.

जनरल जैकब ने अपना प्रस्ताव नियाज़ी की मेज़ पर रख दिया… पेपर पढ़ के नियाज़ी भड़क गया… ”ये क्या है? मैंने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा है, वो भी संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में… आत्मसमर्पण मैं हरगिज़ नही करूँगा.”

जनरल जैकब ने कहा, “देखो नियाज़ी, अगर युद्ध विराम हुआ तो मुक्ति वाहिनी उसे मानेगी या नहीं, ये मैं नही जानता. संयुक्त राष्ट्र के पास कौन सी सेना है जो तुम्हें बचा लेगी? पर अगर तुम मेरे सामने आत्मसमर्पण करते हो, तो मैं तुम्हारी, तुम्हारे 93,000 सेना की, उनके परिवारों की, सुरक्षा की गारंटी लेता हूँ. आगे तुम्हारी मर्ज़ी. सोच लो, मैं तुम्हें आधे घंटे का समय देता हूँ.”

इतना कह के जनरल जैकब आफिस से बाहर आ गए और लॉन में टहलने लगे. आधे घंटे बाद जब वो लौटे तो नियाज़ी मुंह लटकाए अपने टेबल पर बैठा था. आत्मसमर्पण का मसौदा उसके सामने पड़ा था. जनरल जैकब ने उस से पूछा… “मंज़ूर है?”

उसने कोई जवाब नहीं दिया. जनरल जैकब ने तीन बार पूछा पर उसने कोई जवाब नहीं दिया. जनरल जैकब ने कहा कि मैं ये मान लेता हूँ कि ये तुम्हें मंज़ूर है. अब जनरल ने नियाज़ी के सामने शर्तें रखीं.

1. पाकिस्तानी सेना का आत्मसमर्पण ढाका के रेस कोर्स में होगा जहां सारी दुनिया के लोग, स्थानीय बांग्लादेशी जनता, और दुनिया जहान की प्रेस, अंतरराष्ट्रीय मीडिया मौजूद होगा.

2. ‎पाकिस्तानी सेना भारत के मिलिट्री कमांडर को बाकायदे Guard Of Honour (सलामी) देगी.

3. ‎नियाज़ी अपनी तलवार और अपने कंधे पर लगे सितारे और रैंक समर्पित करेंगे.

नियाज़ी ने विरोध किया. वो चाहता था कि आत्मसमर्पण उसके ऑफिस में हो. पर जनरल जैकब आत्मसमर्पण समारोह मैदान में चाहते थे ताकि सारी दुनिया देखे.

नियाज़ी ने कहा कि तलवार तो मेरे पास है नहीं…. तो जनरल जैकब ने कहा, रिवाल्वर सरेंडर कर देना.

नियाज़ी ने जनरल जैकब को लंच के लिए आमंत्रित किया. नियाज़ी के साथ लंच लेने की अनुमति जनरल जैकब के साथ पहले से थी. जब वो ऑफिस से बाहर निकले तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया मौजूद था.

The Observer के पत्रकार Gavin Young ने पूछा, “भूख तो हमें भी लगी है. हम भी चलें क्या?” जनरल ने इशारा किया और सभी पत्रकार कूद के एक ट्रक में चढ़ गए. Gavin Young जनरल जैकब के साथ उनकी कार में थे. जब काफिला पाकिस्तानी सेना मुख्यालय के ऑफिसर्स मेस में पहुंचा तो वहां की साज सज्जा और शानो शौक़त देख मीडिया की आंखें फट गई.

राजसी ठाठ बाट, महंगे कालीनों के ऊपर चलते जब वो हॉल में पहुंचे तो टेबल पर चांदी के बर्तनों में खाना सजा हुआ था… Gavin Young ने उस शाही लंच पर एक लेख लिखा जो उन दिनों सारी दुनिया में चटखारे ले ले के पढ़ा गया. उसका नाम था “The Surrender Lunch”.

शाम 4 बजे जब लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ढाका एयरबेस पर उतरे तो उनकी पत्नी उनके साथ थीं. ढाका रेस कोर्स का मैदान स्थानीय लोगों से खचाखच भरा हुआ था और लोग पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे और नियाज़ी को उन्हें सौंपने की मांग कर रहे थे.

पाक सेना अपने पूरे हथियारों के साथ मैदान में जमा थी. भारतीय सेना ने जानबूझ के उनके शस्त्र जप्त नही किये थे. लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा ने जब पाक सेना की सलामी Guard Of Honour लिया तो पाकिस्तानी सैनिकों की राइफल्स भरी हुई थीं पर हमारे सेनापति की सलामी में झुकी हुई थी. मज़े की बात की उस समय उस मैदान में मौजूद हमारे सारे अफसर निहत्थे थे.

फिर सारी दुनिया के सामने नियाज़ी ने समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर किये, समर्पण की मुद्रा में अपना रिवाल्वर लेफ्टिनेंट जनरल अरोड़ा को सौंप दिया, कंधे पर लगे स्टार और कमर में बंधी बेल्ट खोल के समर्पण कर दिया. मैदान में मौजूद हज़ारों पाकिस्तानी सैनिकों ने अपने हथियार जमीन पर रख दिये.

उस दिन ढाका में कुल 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने समर्पण किया. जनरल जैकब ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उस दिन लॉन में टहलते हुए आधा घंटा मैं यही सोचता रहा कि अगर नियाज़ी नहीं माना तो क्या होगा?

उस दिन नियाज़ी के पास अकेले ढाका में 26,000 से ज़्यादा सैनिक थे जबकि जनरल जैकब के पास थे सिर्फ 3000, वो भी ढाका से 45 किलोमीटर दूर…

एक बार, जब कि जनरल जैकब पंजाब के गवर्नर थे, उनसे पूछा गया कि नियाज़ी की जगह आप होते तो क्या करते?

जनरल जैकब ने जवाब दिया, मैं उन 30,000 सैनिकों के साथ तब तक लड़ता जब तक कि मेरे शरीर मे एक क़तरा भी खून बाकी रहता…

93,000 सशस्त्र सैनिकों का इस तरह ज़मीन पर लेट के आत्मसमर्पण विश्व सैनिक इतिहास की एक अनूठी मिसाल है… लीडरशिप जब फेल हो जाती है तो यही होता है.

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