खजुराहो : एक कवि ही समझ सकता है “न्यूड” और “नेकेड” होने के अंतर को

Khajuraho

खजुराहो में मंदिरों में हजारों सुंदर मूर्तियां खुदी है— सब नग्न और संभोग रत. वही सैकड़ों मंदिर है. उनमें से अधिक तो खंडहर हो चुके है, लेकिन कुछ बच गए हैं, शायद क्‍योंकि लोग उन्‍हें भूले थे.

महात्‍मा गांधी इन बचे हुए मंदिरों को भी मिटटी में दबा देना चाहते थे, क्‍योंकि ये मूर्तियां बहुत ही लुभावनी है. और फिर भी मेरी नानी मुझे खजुराहो जाने के लिए उत्‍साहित कर रही थी. वे स्‍वयं भी मूर्ति की भांति बहुत सुंदर थीं— हर प्रकार से यूनानी दिखाई देती थी.

जब मेरी नानी की मृत्‍यु हुई तो मैं बंबई से उन्‍हें देखने गया. मरने के बाद भी वे सुंदर थीं. मैं विश्‍वास ही नहीं कर सका कि वे मर गई है. और अचानक खजुराहों की सारी मूर्तियां मेरे लिए जीवत हो गई. उनके मृत शरीर में मैने खजुराहो के समस्‍त दर्शन को देख लिया. उनको श्रद्धांजलि अर्पित करने का यही एक मात्र तरीका था कि मैं खजुराहो जाऊँ, अब खजुराहो पहले से भी अधिक सुंदर लगा, क्‍योंकि हर मूर्ति में, हर जगह मैं उनको देख सकता था.

खजुराहो अनुपम है, अतुलनीय है, दुनिया में हजारों मंदिर हैं, लेकिन खजुराहो जैसा कोई भी नहीं है. मैं इस आश्रम में एक जिंदा खजुराहो बनाने की कोशिश कर रहा हूं. पत्‍थर की मूर्तियां नहीं वरन जीवित लोग, जिनमें प्रेम करने की क्षमता हो, जो सच में जीवित हो, इतने जीवित कि वे संक्रामक हों, कि सिर्फ उनको छूना काफी हो एक करंट, एक बिजली का शॉक अनुभव करने के लिए.

मेरी नानी ने मुझे बहुत कुछ दिया— सबसे महत्‍वपूर्ण था उनका जोर देना कि मैं खजुराहो जरूर जाऊँ. उन दिनों खजुराहो को कोई जानता भी न था. लेकिन उन्‍होंने इतना जोर दिया कि मुझे जाना ही पड़ा. वे बहुत ज़िद्दी थी. शायद मैने भी यह गुण या तुम इसे अवगुण कह सकते हो— उन्‍हीं से पाया है.

पहली बार जब खजुराहो गया था तो नानी के बार-बार कहने पर ही गया था, लेकिन उसके बाद मैं सैकड़ों बार वहां गया हूं. दुनिया में और किसी जगह मैं इतनी बार नहीं गया था. कारण सीधा साफ है. वह अनुभव तुम कभी भी पूरा नहीं कर सकते, वह असीम है, वह पूरा हो ही नहीं सकता. जितना ज्‍यादा जानो और अधिक जानने की इच्‍छा होती है. पूरा हो ही नहीं सकता.

एक-एक मंदिर के कण-कण में रहस्य है. एक-एक मंदिर को बनाने में हजारों कलाकार और सैकड़ों वर्ष लगे होंगे. और खजुराहो के अलावा मैंने कुछ भी नहीं देखा जिसे कि परिपूर्ण कहा जा सके— ताजमहल भी नहीं. ताजमहल में भी कुछ कमियाँ है, लेकिन खजुराहो में कोई कमी नहीं है. और फिर ताजमहल सिर्फ एक सुंदर कलाकृति है, लेकिन खजुराहो नये मनुष्‍य का पूरा दर्शन और मनोविज्ञान है.

मैं ‘न्‍यूड’ नहीं कह सकता, माफ करना. ‘न्‍यूड़’ अश्‍लील है. नेकेड बिलकुल ही अलग बात है. शब्‍दकोश में शायद उनका एक ही अर्थ हो, लेकिन शब्‍दकोश सब कुछ नहीं है. अस्तित्‍व में और बहुत कुछ है. वे मूर्तियां नेकेड हैं पर न्‍यूड नहीं. ….शायद कभी मनुष्‍य उसको उपलब्‍ध कर सकेगा.

यह एक स्‍वप्‍न है, खजुराहो एक स्‍वप्‍न है. और महात्‍मा गांधी उसे मिट्टी से दबा देना चाहते थे. ताकि कोई भी उन सुंदर मूर्तियों से मोहित न हो सके. हम रवींद्रनाथ टैगोर के आभारी है जिन्‍होंने गांधी को ऐसा करने से रोका. उन्‍होने कहा: ‘मंदिर जैसे हैं उन्‍हें वैसा ही रहने दो.’ वे कवि थे और वे उनके रहस्‍य को समझ सकते थे.

– ओशो

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