भारतीय पटाखों में नहीं, पोटशियम क्लोरेटवाले चीनी पटाखों में है अधिक प्रदूषण

boycott-chinese-crackers-purchase-indian

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली से कहा है कि प्रदूषण को कम करने के लिए दीपावली पर आतिशबाज़ी और पटाखे न जलाए जाएँ. बहुत ही अच्छा विचार दिया गया है कि प्रदूषण कम करना चाहिए. परंतु बिना कारणों की जांच पड़ताल किए शायद राजनीतिक स्वार्थ के लिए या जनता की आँख में धूल झोंकने के लिए ऐसे फरमान जारी किए जाते हैं.

जब दिसंबर 2015 में दिल्ली सरकार ने सम विषम का फार्मूला बनाया था तब भी आंकड़े बताते थे कि प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण Road Dust या धूल मिट्टी के कण थे जो 45% प्रदूषण के कारण थे. 17% solid waste और 14 % निजी गाड़ियों के कारण था. तो भी सरकार ने बिना सोचे समझे सम विषम का फैसला किया और तभी से ola और uber जैसी टॅक्सी का धन्धा चल निकला. कुछ लोगों ने तो दो अलग अलग गाड़ी भी खरीद ली.

अब दिल्ली के प्रदूषण की बात करें. सरकार और सर्वोच्च न्यायालय आपसे कहती है कि प्रदूषण को न फैलाने के लिए पटाखे बंद करें. जब दिवाली नहीं है क्या तब हमारी हवा प्रदूषित नहीं है? आइये इसे समझें.

विश्व में प्रदूषण मानकों के अनुसार मुख्यत: PM 2.5 और PM 10 की मात्रात्र से प्रदूषण को नापा जा रहा है. PM 2.5 2.5 माइक्रोन के आकार का कण को कहते हैं और इसी प्रकार PM 10 का अर्थ 10 micron का आकार है. आपकी समझ के लिए आपके बाल की मोटाई 2000 माइक्रोन होती है. अब इसमें साफ हवा का अर्थ है PM 2.5 60 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर है (60 microgram/cubic meter) और PM 10 की मात्रा 100 है.

आजकल रोज़ PM 2.5 की मात्रा 100 से 350 के बीच रहती है और PM 10 की मात्रा भी 80 से 400 के बीच रहती है. यानि आज के माहौल में भी आप 5 से 6 गुणा प्रदूषित मात्रा की हवा में सांस ले रहे हैं. सिर्फ दिवाली में इसकी मात्रा एक या दो रातों के लिए अधिकतम के लिए 700 से 900 हो जाती है. यानि मानक से 15 गुणा अधिकतम. वहीं आप अगर फ़रीदाबाद और गाजियाबाद में देखें तो औसतन वहाँ का औसत दिल्ली से दोगुना रहता है. फ़रीदाबाद में तो 300 से कम कभी रहा ही नहीं. इसी प्रकार दिल्ली के 8% से कम बिजली बनाने वाले बदरपुर पावर प्लांट particulate matter का 80% प्रदूषण देता है. पिछले साल इसे प्रदूषण के चक्कर में लगभग चार महीने तक बंद भी किया गया था.

यह तो उसी प्रकार का तथ्य है कि दो मित्र शराब के नशे में, सिगरेट का धुआँ उड़ाते हुए जब मैगी खाने बैठे तो एक ने दूसरे को सलाह दी “मैगी मत खाया कर सेहत के लिए ठीक नहीं है”

लगभग 10% का प्रदूषण आज डीजल जेनेरटर के कारण है जिसका कारण है कि बिजली का न होना. उसमें सरकार चुप है क्योंकि सरकार की अपनी त्रुटि है.

अब ज़रा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोचें कि अचानक से कहाँ से आया है?

पिछले कुछ वर्षों से दीपावली पर पटाखे न जलाने की ताकीद की जा रही है. इसका कारण प्रदूषण इत्यादि दिया जा रहा है और मीडिया इस पर बढ़ चढ़ कर का बखान हो रहा है. आइये इसके साथ जुड़े और पहलू पर हम विचार करें. क्या दुनिया मे मात्र दीपावली पर आतिशबाज़ी होती है? यदि और जगह होती है तो कितनी?

अमेरिका देश जिसकी जनसंख्या भारत की 30% है वहाँ पर 6000 करोड़ की आतिशबाज़ी का व्यवसाय है. जहां पर मात्र नए साल और क्रिसमस पर कुछ हद तक आतिशबाज़ी होती है. वहीं हमारे देश मे जहां शादी विवाह पर, किसी भी शुभ अवसर पर, किसी मैच के जीतने पर, चुनाव जीतने पर और दीपावली पर पटाखे जलाए जाते है वहाँ का व्यवसाय है 4000 करोड़ का. अकेले लंदन में नए साल से पहले 108 करोड़ की आतिशबाज़ी जो केवल 11 मिनट चलती है जिसका कि देखने का टिकट है. वहीं आस्ट्रलिया में नए साल पर 200 करोड़ की आतिशबाज़ी होती है जहां की जनसंख्या है 3 करोड़. परन्तु सारी परेशानी सिर्फ और सिर्फ दीवाली पर है. प्रदूषण फैलता है तो दिवाली पर.

चलिये इसका एक और पहलू देखिये कि सिवकासी में 3 लाख लोग काम करते हैं जिनकी रोज़ी रोटी का भी प्रश्न है उनके वहाँ से बनाए गए आतिशबाज़ी में प्रदूषण भी कम होता है. तो प्रदूषण कहाँ से आया यह भी जान लीजिये. यह शुरू हुआ है चीनी आतिशबाज़ी से. यह नहीं है कि भारतीय सामान में प्रदूषण नहीं है परन्तु चीन का सामान पोटशियम क्लोरेट से बनता है जो कि घर्षण से चलता है और भारतीय आतिशबाज़ी से 50% सस्ता है और अधिक प्रदूषण फैलाने वाला.

हमें प्रदूषण कम करना है हरियाली बढ़ा कर और पटाखों का प्रयोग कम करके. सब कार्य मर्यादा में रहें तभी ठीक है. फिर पूरा बंद कर देंगे तो बच्चों को जो खुशी मिलती है उसका क्या?

पटाखे बंद करके 3 लाख लोगों को बेरोजगार करके हम क्या चाहते हैं. आप चीनी पटाखे बंद करवाइए जिससे रोजगार मिले भारतीयों को और मर्यादा में रह कर खुशियों का मनाइए.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY