ये समय है एक हाथ में गीता और दूसरे में गांडीव धारण करने का

त्यौहार का आकर्षण होता है उसकी भव्यता में, पकवानों में, कपड़े, गहने और पूरे परिवेश की रमणीयता में. त्यौहार का सामाजिक एवं आध्यत्मिक पक्ष समझना और व्यवहार में उतारना सबके बस की बात नहीं होती. बच्चों और नवयुवकों से इस तरह की अपेक्षा करना भी ठीक नहीं है, इसकी समझ मानसिक परिपक्वता के साथ ही आती है.

जिन हिन्दू त्यौहारों में उत्सव पक्ष कमजोर था वो आज खो से गए हैं. उदाहारण स्वरुप, रक्षा बंधन पर राखी तो सभी बाँध लेते हैं पर यज्ञोपवीत (जनेऊ) का निर्माण और नये जनेऊ को प्रयोग में लाने का कर्म विरले ही करते हैं. यही हाल नागपंचमी, हरितालिका तीज और ऐसे तमाम हिन्दू त्यौहारों का हो गया है. न तो लोग याद रखते हैं, न ही शासन अवकाश देता है; जिन घरों की महिलायें व्रत न रखती हों उन परिवारों में इनके नाम भी विस्मृत हो चुके हैं.

मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि, जब आप के त्यौहार का आकर्षण खो जाएगा तो आपके बच्चे दूसरों के त्यौहारों की तरफ स्वभावतः आकर्षित होंगे ही. दीपावली पर आतिशबाजी पर रोक है तो क्रिसमस की आतिशबाजी का मजा लेंगे. फिर बात यहीं नहीं रुकेगी, पूरा क्रिसमस ही मना डालेंगे. आखिर केक और दारू की ही तो अतिरिक्त व्यवस्था करनी है.

वैसे भी बड़े नगरों के धनाढ्य परिवार सेकुलरता के नाम पर किसी न किसी रूप में क्रिसमस मना ही रहे हैं. इस प्रकार धीरे-धीरे करके दीपावली का त्यौहार लक्ष्मी-पूजन के रूप में सीमित रह जाएगा. सारी भव्यता और उत्सवधर्मिता क्रिसमस और नव वर्ष की ओर चली जाएगी. सभी बड़ी विदेशी कम्पनियाँ इन दिनों वैसे भी एक सप्ताह का अवकाश/ बंद रखती हैं, जिसके कारण महानगरों में यह उत्सवधर्मिता और तेज़ी से स्वतः पल्लवित होगी.

छोटे नगरों, कस्बों और गाँव का आदमी जाने-अनजाने में महानगरों की नकल करता ही है. जो दिल्ली में होगा… कुछ साल बाद वही हापुड़ में होने लगेगा; बैंगलोर के वैचारिक प्रदूषण को मंड्या तक पहुंचने में बस कुछ एक वर्ष ही लगते हैं. मुम्बई से चली बीमारी कुछ वर्षों में पूरे देश में फ़ैल जाती है.

अंग्रेजी नव वर्ष और तमाम तरह के हग और किस डे को इसी तरह स्थापित किया गया है. आज कल स्कूलों में भी बच्चों को पर्यावरण बचाने के लिए पटाखे न छोड़ने का सन्देश दिया जा रहा है.

यह अन्तराष्ट्रीय वेटिकन गिरोह का असली षड्यंत्र है. पहले चरण में आपके उन त्यौहारों को समाप्त किया गया जिनका उत्सव पक्ष कमजोर था… ले दे कर दीपावली और होली बची. अब हमला दीपावली और होली के ऊपर किया जा रहा है.

एक बार यह सफल हो गया तो सब क्रिसमस, ईस्टर और हैलोवीन मनाएंगे. जो धिम्मी भगवान राम के समय पटाखे न होने की बात कर रहे हैं उनसे इतना ही कहूँगा कि उस समय तो अली-बाबा वाला संविधान भी नहीं था. शास्त्र एवं स्मृतियों से शासन चलता था. चलो अब स्मृतियों से शासन चलाते हैं और पटाखों को तिलांजलि दे देंगे. स्वीकार है क्या?

एक तरफ गाज़ी मियाँ जनसँख्या जिहाद की तलवार भांज रहे हैं और दूसरी तरफ लाली-मियाँ वेटिकन एजेंडे का इंजेक्शन लगा रहे हैं. ऐसे में मृत प्राय हिन्दू समाज और उसकी भूमि के कितने टुकड़े होंगे, कह पाना असंभव है.

महाकाल भी उनकी सुनते हैं जिनके मस्तिष्क में विचार और भुजाओं में पुरुषार्थ दौड़ता है. समय का काल व्याल हमें पचा डालने को आतुर है. ज्ञात रहे समय बड़ा निर्मोही होता है और इसके शब्द कोष में क्षमा जैसा शब्द है ही नहीं.

इन षड्यंत्रों का विच्छेद करने के लिए, अब एक हाथ में गीता और दूसरे में गांडीव धारण करने का समय आ गया है! जय श्री राम… जय महाकाल!!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY