अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारती कांग्रेस पार्टी

कांग्रेस पार्टी 2014 के आम चुनाव में मिली शिकस्त और उसके बाद तमाम बड़े छोटे राज्यों में अपनी सरकारों के पतन से इतनी आहत नजर आ रही है कि एक मजबूत सरकार के सामने जहाँ उसे एक मजबूत और जवाबदार विपक्ष बनकर खड़ा होना चाहिए था वहां वे एक बेबस और लाचार नजर आ रही है.

कांग्रेस और उनके उपाध्यक्ष अब भी समझ नहीं पा रहे है कि आखिर सरकार की कौन सी ऐसी नीतियाँ हैं, जिस पर उन्हें जमकर हमला करना चाहिए. इस विषय में उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के पास वर्तमान स्तिथि में कोई योजना दूर दूर तक नज़र नहीं आती है. ऐसे में राहुल गाँधी समेत कांग्रेस के अनेक बड़े नेता सरकार की वही नीतियों और योजनाओं पर हमला बोले जा रहे हैं, जिसमें प्रधानमन्त्री मोदी को जनता का पूरा सहयोग प्राप्त हुआ है.

गलत योजनाओं पर निशाना

दरअसल कांग्रेस यह समझ ही नहीं पा रही है, वे उन्हीं योजनाओं पर निशाना साध रही हैं जिस से जनता को सबसे ज़्यादा फायदा पहुँचाया जा रहा है. जिस योजनाओं के सहारे अमित शाह-मोदी की जोड़ी एक के बाद एक चुनाव जीतते हुए अपन विजय रथ आगे बढ़ा रहे है कांग्रेस उसी पर सरकार को कटघरे में खड़ी करती दिखाई दे रही है. जिससे कांग्रेस का दांव कांग्रेस पर उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है और इसकी झलक हमें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव जिसे दिल्ली गद्दी तक पहुँचने का रास्ता कहा जाता है, में देखने को मिली थी. जहाँ इन्हीं नोटबंदी के बाद बीजेपी ने प्रचंड बहुमत हासिल कर योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने में सफलता प्राप्त की.

आज की कांग्रेस सरकार की अनेक योजनाओं और उनमें जनता के समर्थन से इतनी हताश है कि मुद्दों से भटकती नजर आ रही है यही कारण है कि कांग्रेस खुराफती हथकंडे अपनाने के लिए मजबूर है. कभी देशविरोधी नारों को समर्थन कर देती है तो कभी सेना पर सवाल खड़े करने लगती है, कभी रोहिंग्या को बसाने की बात करती नजर आती है.

दरअसल कांग्रेस को सरकार को घेरने के लिए खुद के कोई मुद्दे ही नहीं है जिससे वो सरकार को अपने बलबूते कटघरे में खड़ी कर सके और संसद में सरकार से जवाब तलब कर सके. शायद यही कारण है कि आज मात्र मोदी सरकार के 3 साल में ही कांग्रेस के सारे मुद्दे ख़त्म होने लगे हैं और रोहित वेमुल्ला, ऊना, अख़लाक़ जैसे समाज को बांटने के हथकंडे हवा में उड़ा दिए गए और अब कांग्रेस और राहुल गाँधी को बीजेपी के ही कुछ असंतुष्ट नेताओं से मुद्दों की उम्मीद है. राहुल गाँधी समेत पूरा कांग्रेसी खेमा बीजेपी की अंदरूनी नोक-झोक में उलझने लगता है और हाथोहाथ सरकार को घेरने की कोशिश करने लगता है.

क्या 130 साल पुरानी पार्टी देश को आज़ादी दिलाने में अहम् किरदार निभाने का दावा करनेवाली और देश पर 70 वर्षो तक राज करनेवाली पार्टी आज इतनी लाचार हो सकती है कि उसे सरकार की नीतियों का विरोध करने के लिए भी बीजेपी के ही कुछ असंतुष्ट नेताओं का या यह कहिये कि बीजेपी के आतंरिक कलह का सहारा लेना पड़े कि कब कोई छोटा-बड़ा नेता अपनी इच्छापूर्ति न होने पर सरकार या मोदी पर उंगली उठाने लगे और कांग्रेस उस एक बयानों पर सरकार को घेर सके.

कांग्रेस वर्तमान सरकार के चंद नेताओं के कुछ विरोधी बयानों के भरोसे विपक्ष की जिम्मेदारी निभाने की एवं 2019 साधने की कोशश कर रही है तो शायद ही कांग्रेस आनेवाले आम चुनाव में अपनी वर्तमान स्तिथि को बचा पाए.

यशवंत सिन्हा की टिप्पणी

इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए हाल ही में सरकार की आर्थिक नीति पर भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा की तीखी टिप्पणी ने कांग्रेस को बरसने का मौका दे दिया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बुधवार को नरेंद्र मोदी सरकार पर आम लोगों की दुर्दशा को नजरंदाज करने और कुछ लोगों के हित का खयाल रखने का आरोप लगाया. उन्होंने इसके लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा की टिप्पणी का सहारा लिया, जिन्होंने अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर केंद्र की आलोचना की थी.

पूर्व वित्त मंत्री सिन्हा ने ‘अब मुझे बोलने की जरूरत है’ शीर्षक अपने आलेख में वित्त मंत्री अरुण जेटली की कड़ी आलोचना की है. यही कांग्रेस का कहना है कि जिस बात को कांग्रेस पिछले कुछ महीनों से कह रही है जिसे कोई सुन नही रहा है लेकिन अब उन्हें यशवंत सिन्हा का साथ मिल रहा जिनके बयानों को मीडिया ने भी हाथो हाथ लिया.

यह दर्शाता है कि कांग्रेस पार्टी और मीडिया ही नहीं पूरा विपक्ष के मुद्दे अब हवा हवाई साबित हो रहे है उन्हें शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे बीजेपी के नेताओं के बयानों के सहारे अपनी राजनीति चला रहा है.

सबसे मजेदार बात यह है की जिस यशवंत सिन्हा के बयानों पर कांग्रेस ने दांव खेला है वहीँ यशवंत सिन्हा ने कांग्रेस को आड़े हाथो लिया है. सिन्हा ने कांग्रेस पर मोदी सरकार के लिए कठिनाइयां पैदा करने का भी आरोप लगाया और कहा, “चाहे वह एफटीआईआई हो, हैदराबाद हो या जेएनयू, लोकसभा में कांग्रेस की हार के बाद, देश में कुछ ऐसे तत्व हैं जो नहीं चाहते कि यह सरकार खुलकर काम करे. जब भी उन्हें मौका मिलता है, वे मोदी सरकार के लिए बाधा पैदा कर देते हैं.”

जहाँ एक ओर कांग्रेस यशवंत सिन्हा के आर्थिक नीतियों के खिलाफ वाले बयान को हाथोहाथ ले रही है वहीँ ये यशवंत सिन्हा JNU और पाकिस्तान वाले बयान पर सरकार के साथ देनेवाले बयान पर शांत है. सिन्हा का कहना है कि पाकिस्तान के साथ बातचीत तभी हो जब वह सीमा पार आतंकवाद पर बातचीत के लिए तैयार हो. लेकिन इस विषय पर कांग्रेस का रुख अस्पष्ट है.

यहाँ यह उल्लेख करना जरुरी है कि उदारीकरण के बाद 2000 से 2003 तक वित्त मंत्री के तौर पर यशवंत सिन्हा का कार्यकाल बुरा ही रहा था और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उन्हें हटाना पड़ा था. ऐसे में यशवंत सिन्हा के अर्थ नीति सम्बन्ध में सरकार और जेटली पर लगाये गए आरोप नीति सम्बंधित कम और व्ययक्तिक ज्यादा लगते हैं. पूरी की पूरी कांग्रेस यह समझने में असमर्थ तो है ही बल्कि इसे गुजरात के चुनाव के लिए चुनावी मुद्दा ही बना लिया है क्योंकि जिस तरह राहुल गाँधी गुजरात के अपने मंदिर दौरों से वक्त निकाल कर सिन्हा के बयानों का समर्थन करना नहीं भूल रहे हैं. इससे साफ़ नजर आता है कि कांग्रेस पास खुद के कोई मुद्दे नहीं बचे सरकार को घेरने के लिए और पूरी कांग्रेस अब सत्ता पक्ष के यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा और अरुण शौरी के सहारे आगामी चुनाव में उतरने की एक नाकाम कोशिश करने के मूड में नजर आ रही है.

इससे पहले बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने नोटबंदी से जनता को होनेवाली परेशानी को लेकर ट्वीट किये थे. अरुण शौरी भी समय समय पर सरकार के नीतियों के खिलाफ हमला बोलते रहे हैं. कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने भी अर्थव्यवस्था के संक्रमण और कुप्रबंधन के दौर से गुजरने की पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा की टिप्पणी को सही ठहराया. ऐसे में जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भी बीजेपी के कुछ असंतुष्ट नेताओं के बयानों का फायदा उठाने की नाकाम कोशिश करते दिखाई देते है तो लगता है कि कांग्रेस खुद को सबसे बड़ी विपक्ष पार्टी के रूप में स्थापित करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है और ना ही कांग्रेस पूरी तरह जवाबदेह है देश की जनता के प्रति.

2014 कांग्रेस पार्टी के शिकस्त का एक कारण यह भी था कांग्रेस यह मानने लग गयी थी कि एक समाज का तृष्टिकरण ही उनकी एकमात्र विचारधारा है. जबसे राहुल गाँधी सक्रीय राजनीति का हिस्सा बने है कांग्रेस की नीतियों को जैसे जंग लग गया हो कांग्रेस अपनी पारंपरिक राजनीति और एक समाज-विशेष की तृष्टिकरण में इतनी व्यस्त होती चली गयी कि इसी बीच कांग्रेस ने एक बार फिर 2014 के आम चुनाव में अपने पारंपरिक वोट बैंक पर दांव लगाना उचित समझा और उसे हिन्दुओं की उपेक्षा के चलते मुंह की खानी पड़ी और 2009 में 205 सीटें जीतनेवाली कांग्रेस युवराज राहुल गाँधी के नेतृत्व में 44 सीटों पर आकर अटक गयी.

यह तो सिर्फ शुरुआत थी आगे उसे पंचायत से लेकर संसद तक कांग्रेस को अपने पतन का सामान करना पड़ रहा है इसका कांग्रेस के घोटालों के अलावा एकमात्र कारण यही रहा है कि कांग्रेस की पारंपरिक राजीनीति और वर्तमान सरकार कार्यप्रणाली एक के बाद एक निर्णय लेने की क्षमता और निचले तबके के लिए सरकार की ली जाने वाली योजनाओं से कांग्रेस पस्त है.

एक ओर मोदी सरकार देश किसानों, युवाओं और गरीबों के लिए तमाम योजनाओं लेकर आ रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी अब भी अपनी राजनीति बीजेपी के नेताओं सहारे मर्यादित कर बैठी है जिसका फिलहाल कांग्रेस को ज्यादा फायदा होता दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन यह मोदी सरकार की एक बड़ी जीत ही मानी जाएगी.

Read About Jawaharlal Nehru booth capturing art

Dr Ram Monohar Lohia

India Pakistan Unity

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY