क्या ये न्यायाधीश हैं? नहीं, ये सिर्फ कानून समीक्षक हैं

हिंदुओं को परेशानी क्यों होती है जब सुप्रीम कोर्ट में बैठे जज लोग आपको बारंबार अपमानित करते हुए कभी जल्ली कट्टू, कभी शबरीमाला, कभी दही हांड़ी और कभी दीपावली पर आपकी भावनाओं के विपरीत निर्णय सुनाते हैं. लेकिन ईसाई और मुसलमानों के पर्सनल कानूनों और उनके त्योहारों पर वह विपरीत टिप्पणी भी नहीं करते?

तो प्रश्न उठता है कि क्या ये न्यायाधीश हैं? या ये गैरसंवैधानिक गैरकानूनी कृत्य कर रहे हैं? सनद रहे गैर कानूनी और अनैतिकता का कोई संबंध नहीं है. लेकिन क्या वे वस्तुतः न्यायाधीश हैं भी!!! जी नहीं… ये न्यायाधीश नहीं है, ये कानून समीक्षक हैं.

और भारत में इन कानूनों की उत्पत्ति को लेकर विल डूरंट (Will Durant) ने 1930 में लिखा था – कि 1857 के युद्ध में भारतीय हिंदुओं के द्वारा इसाई लुटेरों को उखाड़ फेंकने के प्रयास के बाद, उनको रेगुलेट करने के लिए लुटेरों शासकों ने शासितों के लिए जो नियम बनाये, और जिनको कानून का नाम दिया गया, ये उनका सबसे बड़ा पाखंड (Hypocrisy) थी, जबकि लूट जारी रही.

उन पाखंडी लुटेरों के रेगुलेटरी नियम आज भी कानून की शक्ल में जिंदा हैं कि नहीं, यदि जिंदा हैं तो उनका भारतीयकरण किया गया कि नहीं, इस विषय पर लॉ विज्ञान के विशेषज्ञ ही बता सकते हैं .

भारतीय शास्त्रों के अनुसार ये न्यायाधीश कहलाने के अधिकारी नहीं हैं. लेकिन चूंकि भारत “इंडिया That is भारत” है, और भारत के बहुसंख्यक शिक्षित लोगों को अंग्रेज़ी नहीं आती, लेकिन वे बहुत से संवैधानिक पदों पर चढ़ बैठे हैं, तो ये बात उनको समझना ही चाहिए कि अंग्रेज़ों ने जो तंत्र भारत को सौंपा था उसमें जस्टिस का अर्थ न्यायाधीश होता है.

वस्तुतः ये अंग्रेज़ी लॉ विज्ञान के गम्भीर विद्वान हैं, जो बकौल आयशा या बकौल फलाने, कानून को अपनी समझ के अनुसार नाप तौल कर निर्णय देते हैं. इन समस्त कानूनों को संविधान के आर्टिकल्स की नियत सीमा के तहत ही ये निर्णय देने को बाध्य हैं. पर्सनल लिबर्टी की सीमा संभवतः बहुत कम होती है. लेकिन मेरे मित्र मंडली में सैकड़ों काबिल लॉ विज्ञान की समझ वाले मित्र हैं, वे मेरे इस कथन को संशोधित कर सकते हैं.

ये जस्टिस लोग, बाबा साहेब के बनाये उस संविधान के लिखे गए नियमों के गुलाम हैं जो 1935 के India Independence Act की फ़ोटो कॉपी है, जिसमें 1950 में हमारे पूर्वजों ने कॉमा पाई लगाकर उसका भारतीयकरण कर दिया.

इस संविधान में बहुसंख्यक हिन्दू के पक्ष में एक भी आर्टिकल लिखा हो तो बताओ. जबकि अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए इसमें 5 आर्टिकल हैं – आर्टिकल 25 से 30 तक.

पटाखे के चक्कर में जज साहब को न गरियायें, क्योंकि भारत चीनी झालरों और पटाखों से भरा पड़ा है. बाकी भारत में पटाखे के प्रोडक्शन का काम शांतिप्रिय लोग करते हैं.

इसलिए यदि वो (शांतिप्रिय लोग) ऑब्जेक्शन करें तो ठीक है. आपको क्या दिक्कत है?

दीवाली, दियाली और दीपों का त्योहार है – दिया जलाएं, अपने कुम्हार भाइयों के घरों को रोशन कीजिये.

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