ज़रा थम कर सोचिए, कहीं जीना तो नहीं भूल गए आप

ज़िंदगी की जरूरतें पूरी करने की दौड़ कब आवश्यकता से विलासिता पूर्ति में बदल जाती है पता ही नहीं चलता. या यूँ कहें कि विलासिता न जाने कब आवश्यकताओं में परिवर्तित हो जाती हैं और आपके जीवन पर ‘नशे’ सी चढ़ जाती हैं. जब ये नशा उतरता है तो, या डिप्रेशन की ओर ले जाता है, या मौत की ओर.

एक बिल्डर लम्बी गाड़ियों में चलता है, शानदार कोठियों में रहता है, महंगी शराब पीता है और विदेश यात्रा करता है. उसकी अट्टालिका के नीचे बनी झुग्गियों में रहने वाले बच्चे, जवान, बूढ़े 46 डिग्री तापमान में भी और 2 डिग्री की कड़ाके की ठण्ड में भी एक छह गुणित दस की झोपड़ी में मस्त रहते हैं. मानव वो भी और मानव ये भी.

मज़दूर को बिहार, उड़ीसा, बंगाल से हजारों मील दूर आकर भी काम न मिले तो भी आत्महत्या नहीं करता और पैसे वाले का एसी एक रात न चले तो दुनिया बेमानी लगने लगती है.

दुनिया का सबसे बड़ा कष्ट ऊपर से नीचे जाने में होता है. हमें लगने लगता है कि इन सुविधाओं पर और इस जीवन शैली पर हमारा अधिकार है. ये नहीं तो जीवन नहीं.

निराशा और अवसाद का एक बहुत बड़ा कारण ये है कि ‘लोग क्या कहेंगे’ जब कि ये सब से बड़ी ग़लतफ़हमी है कि लोग क्या कहेंगे. लोग तो आज भी कुछ न कुछ कहते ही हैं क्योंकि लोगों का काम है कहना.

सच बात ये है कि हमने अपने चारों तरफ एक काल्पनिक दायरा बना लिया है और हम उस दायरे में कैद हो गए हैं. अपने ही बनाये हुए दायरे में कैद. हर समय ये चिंता कि कोई हमें कमतर तो नहीं समझ रहा. हमारी ईगो हमें पिंजरे में बंद कर लेती है और उसी में घुटते रहने को हम मजबूर हो जाते हैं. जीवन भर के लिए.

दुनिया में सात सौ करोड़ लोग रहते हैं. आप को कितने जानते हैं? आपका मोहल्ला, आपका ऑफिस या कार्यक्षेत्र या दोस्त-रिश्तेदार बस. सात सौ करोड़ में से कितने!!!

जब ज़िंदगी ढलान पर हो और नीचे उतरने की गति में ब्रेक न लग रहे हों तो तोड़ दो उस पिंजरे को, जिसमें खुद को कैद कर रखा है. उस अदृश्य ईगो, इमेज और सामाजिक सम्मान की दीवार को तोड़ दो और आज़ाद हो जाओ. माना मुश्किल है, मगर मरने जितना कठिन भी नहीं है, उस से बेहतर है.

एक किसान आत्महत्या किसलिए करता है? कि वह जमींदार है, किसी की मज़दूरी नहीं कर सकता, सड़क पर ठेला नहीं लगा सकता. एक पैसे वाला क्यों खोपड़ी में गोली मार लेता है? कि बैंक वाले उसका मकान खाली करा लेंगे और कार तक छीन लेंगे तो कितना अपनाम होगा. यही है वो अदृश्य पिंजरा जिसे तोड़कर कम से कम ज़िंदा रहा जा सकता है.

एमपी वाले उपाध्याय जी

जब मैं छोटा था तो जोधपुर में पड़ोस में एक मध्यप्रदेश के उपाध्याय जी एक कमरे के मकान में अपने तीन बच्चों और पत्नी के साथ रहते थे. सामन्यतः सुबह जॉब पर निकल जाते और देर शाम लौटते.

किन्तु जिस दिन छुट्टी होती उस दिन उपाध्याय जी और उनका परिवार भरपूर ज़िंदगी जीता था. सुबह घर में कुछ जायकेदार पकौड़ी, चीला वगैहरा बनता. दैनिक कार्य निपटाकर पूरा परिवार इकट्ठा बैठ जाता.

उपाध्याय जी एक पान मुँह में दबाते और अपना हार्मोनियम निकाल लेते. मस्त भजन और गज़ल गाते. कभी परिवार अंताक्षरी खेलता तो कभी चुटकले सुनाये जाते. परिवार भी और पड़ोसी भी हँसते-खिलखिलाते छुट्टी बिताते थे.

संतों और दार्शनिकों ने कहा है कि ज़िंदगी में किस चीज की तलाश है… खुशी की ना! हेप्पीनैस की! तो चलिए एक सर्वे कीजिये कि हैप्पीनेस किस के पास है. कितने बड़े अधिकारी, धनाढ्य और प्रभावशाली लोग कब से ठहाका लगाकर हंसे तक नहीं और वो जो ठलुए, पीपल के पेड़ के नीचे घंटों से खिलखिलाये जाते हैं फटे बनियान में बिना एसी के.

धुंध से बाहर निकालिये. पुनर्विचार कीजिये कि कहीं आप जीना भूल तो नहीं गए. इसी ज़िंदगी कि दौड़ में से कुछ पल चुराकर खो जाइये अपने बचपन में, अपने दोस्तों में, अपनी उल्लास की दुनिया में.

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