विदेशी हमलावरों के भूरे गुलाम : आश्चर्य मत कीजिये, हमला जारी है!

भारत पर हुए सैन्य आक्रमणों को देखेंगे तो आपको बहुत साफ़ साफ़ एक चीज़ दिख जायेगी. जितने भी हिन्दू राजा विदेशी हमलावरों से हारे हैं, वो बिलकुल एक ही जैसी मूर्खता पर अड़े हुए थे. वो एक हाथी पर चढ़कर जा बैठते थे, जहाँ उनपर निशाना लगाना बड़ा आसान होता था. अपनी सेना को ही नहीं, वो शत्रु को भी साफ़ साफ़, आसानी से दिखाई दे रहे होते थे. चुनकर एक राजा को मार देने भर से काम हो जाता था, सेना ज्यादातर, नेतृत्व के अभावों में, लड़े बिना ही हार गई होती थी. इसके ठीक उलट विदेशी हमलावरों में नेतृत्व कभी शुरूआती पंक्ति में होता ही नहीं था. उसे चुनकर उसपर हमला करना संभव नहीं होता था.

ये महामूर्खता बार बार दोहराते हुए आपको सब के सब राजा दिखेंगे. सैन्य आक्रमणों में जीतने पर सेमेंटिक मजहब (इसाई और इस्लाम दोनों) स्थानीय धर्म को पूरा का पूरा निगल जाते थे. सवाल ये है कि सैन्य विजय के वाबजूद यहाँ भारत में सेमेंटिक मजहब वही करने में कामयाब क्यों नहीं हुए?

इसकी सबसे बड़ी वजह थी कि जो मूर्खता सेना में की जा रही होती थी उसका ठीक उल्टा, यानि चतुराई, यहाँ धर्म के मामले में अपनाई हुई है. जैसे उनकी सेना में नेता को ढूंढना मुश्किल था, यहाँ धार्मिक नेतृत्व ढूंढ पाना नामुमकिन था. सिर्फ ब्राह्मणों को पकड़कर मार देने, और सवा मन जनेऊ गला काट कर उतार लेने से काम नहीं होता.

एक इलाके की परंपरा पांच कोस दूर नहीं चलती थी. दक्षिण भारत का कोई बनारस और कश्मीर में पुजारी होता, एक को वहां क़त्ल किया तो दूसरा कहीं और दूर से बुलवा लिया जाएगा. जगन्नाथ पुरी का दैत्यपति ब्राह्मण है ही नहीं, विग्रह का स्वरुप दूसरा है. शिवलिंग की स्थापना के लिए स्थानीय परम्पराएं इस्तेमाल होंगी. कोई पूजा पद्धति एक की है कोई दूसरे की, सब की सब हिन्दुओं की. यहाँ हमलावरों की स्थिति उलटी हो गई. उनपर कहाँ प्रहार करना है ये आसानी से दिख जाता था, यहाँ एक दो स्तम्भ टूटे भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता था.

उदाहरण के तौर पर पूमाला भगवती मंदिर (कन्नूर, केरल) थिय्या (ओबीसी) समुदाय का है. इसका पुजारी भी थिय्या ही होता है. जैसे किसी किसी मंदिर के प्रधान पुजारी को एम्ब्रान्थिरी कहते हैं उसे एम्ब्रोन कहा जाता है. कुछ पूजाओं में ब्राह्मण भी आमंत्रित होते हैं, लेकिन सालाना उत्सव जैसे थेय्यम स्थानीय (एस.सी.) समुदाय और थिय्या लोगों का ही होता है. सभी पूजाओं के एक के बाद एक संपन्न होने पर देवी को प्रसन्न माना जायेगा, कोई एक भी समुदाय का हटा नहीं सकते.

कोट्टीयुर का शिव मंदिर उत्तरी केरल का सबसे प्रमुख शिव मंदिर है. इसमें भी ब्राह्मण से लेकर वनवासी तक सभी समुदाय मिलकर पूजा करेंगे. कोट्टीयुर शिव की पूजा, एक दो नहीं ये कम से कम 64 अलग अलग समुदायों के अलग अलग रीतियों का पालन करने पर संपन्न होने वाली पूजा है.

जब वनवासी पूजा कर रहे होते हैं तो बाकी के समुदाय घरों से बाहर नहीं आते. ऐसे अलग-अलग गुप्त पूजा विधान 64 हैं, और 64 विधियों के पूरे होने पर पूजा संपन्न मानी जाती है. कोई भी एक ही तयशुदा तरीका हो हिन्दू होने का, या उनकी पूजा विधि का, ऐसा कभी था ही नहीं. ऐसा आज भी नहीं है, इसलिये इसे तोड़ना या ख़त्म करना लगभग नामुमकिन था. इस विविधता को ख़त्म कर के एक कर देना भी आक्रमणकारियों के लिए एक बड़ी जीत होगी.

ऐसा कैसे किया जा सकता है? अगर ये दबाव बनाया जाए कि ब्राह्मण अपनी विधि से तुम्हें पूजा नहीं करने देते, तो ये किया जा सकता है. आरक्षण के बल पर हम तुम्हें मंदिर का पुजारी बनायेंगे, जब ये कहा जा रहा होता है तो असल में कोलोनियलिस्ट कुछ और कह रहे होते हैं. विदेशी हमलावरों के भूरे गुलाम दरअसल कह रहे हैं कि तुम्हारी पद्धति ब्राह्मणों से हीन है. जबकि सच्चाई ये है कि सबकी अपनी अपनी अलग विधियाँ उतनी ही सम्मानित हैं. समस्या ये है कि भूरे साहब जब तक अपने आकाओं के लिए विविधता को मरेंगे नहीं, उनके आका हम पर धार्मिक जीत दर्ज नहीं करवा सकते.

फेंकी गई हड्डियों के लालच में टुकड़ाखोरों की जमात पहले से ही आर्थिक विपन्नता झेल रहे समुदायों से उनके तौर तरीके छीनने निकली निकली है. इस को आप अगर आक्रमण नहीं मान पा रहे तो याद करने की कोशिश कीजिए (बिना गूगल सर्च के) कि किस किराये की कलम ने ‘द वायर’ में फ़र्ज़ी खबर डालकर तथाकथित “हिन्दुत्ववादी” प्रधानमंत्री/ राजनैतिक दल पर हमला करने की कोशिश की थी? उसे ढूंढना या याद रखना, भीड़ में पहचानना मुश्किल है, लेकिन वो जिस पर हमला करेंगे उसे आपने नैतिकता का ध्वज लगे, सदाचार-अहिंसा के ऊँचे हाथी पर बिठा रखा है. उनके लिए निशाना साधना आसान है, आप निशाना ढूंढ भी नहीं पा रहे.

बाकी जब उस किराये की कलम का नाम ढूंढ लें, तो जरा उसके पुराने ट्वीट भी देख आइयेगा. दलितों के हित का दावा करती अगर उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार बनवाती दिखें, तो आश्चर्य मत कीजियेगा. हमला जारी है!

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