सिनेमा, मीडिया, साहित्य, 70 सालों से दिमाग में ठूंस रहे कचरा

मैं टीवी पर एक फिल्म देख रहा था, ‘गुड बॉय बैड बॉय’, फिल्म कोई ख़ास नहीं थी, ऐसे ही बेकार सी है, ना हिट गई और ना ही उसकी कभी चर्चा हुई. ऐसी हज़ारों फ़िल्में आई हैं जिनके आने और पिटने का भी पता नहीं चलता. उस फिल्म में एक दृश्य है, ज़रा आप भी देखिये!

बैड बॉय्ज़ गुड बॉय्ज़ के साथ बैठे हैं. लड़के-लड़कियां दोनों हैं. यह दृश्य लाइब्रेरी में फिल्माया गया है. लड़का (इमरान-हाशमी) जो पढ़ाकू लड़का है वह हीरोइन को इंप्रेस करने के लिए अपने हाथ में एक मोटी सी किताब लिए है.

सीन अच्छा चल रहा था और मैं भी दिलचस्पी से फिल्म को देख रहा था. अचानक लाल किताब पर छपे बड़े से नाम पर मेरा ध्यान गया. यह सीन, नाम सहित दस मिनट तक दिखाया गया था. किताब टाइटल सहित बार-बार पर्दे पर शो कर रही थी. मैंने देखा उस किताब का नाम लिखा हुआ था ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’.

गुड बॉय्ज़ लड़कियों को और लोगों को संदेश दे रहे थे. लाइब्रेरी में इस तरह की अच्छी किताबें होती हैं. बैड बॉय्ज़ के लिए वह बता रहे थे कि ‘वे पूजा-पाठ करते हैं, गायत्री मंत्र पढ़ते हैं, धर्म के अनुसार चलते हैं, बड़े गन्दे होते हैं’. बड़ा अजीब सा लगा. वह कैसे नैरेटिव गढ़ते हैं? कैसे अपना नरेशन करते हैं?

हजारों की संख्या में ऐसी फिल्में बनाई गई है. उनके निर्देशक या तो मुस्लिम हैं, या ईसाई क्रिप्टो क्रिश्चियन, अगर यह न हुए तो वामपंथी ही होंगे. पता करेंगे तो इप्टा, एसएफआई, या सीधे एमसीपीआई, आदि से जुड़े होंगे, नहीं तो कांग्रेस के पेड होंगे.

मैंने उन सभी फिल्मों का अध्ययन किया तो जो निकल कर आया वह हतप्रभ करने वाला है. वह बड़ी गहराई से छोटे-छोटे टुकड़ों में मैसेज देते हैं, और हिंदुत्व विरोध स्टैब्लिश करते हैं. विचारधारा के रूप में, छद्म-धर्मनिरपेक्षता के लिए, या मजहब के पक्ष में, ईसाइयों के पक्ष में, छोटे-छोटे दृश्यों में डाले जाते हैं. आप ध्यान से देखिएगा.

यह दिमाग पर साइलेंट रूप में बहुत गहरा असर छोड़ते हैं. वहां वह सीधे सन्देश दे रहे हैं कि जो पढ़ने वाले लड़के हैं, अच्छे लड़के हैं, हीरो-हीरोइन हैं, वह कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ते हैं… या फिर इस्लामिक या ईसाई जीवन शैली बड़ी अच्छी चीज है. उन्हें हिंदू-जीवन शैली में खलनायकत्व दिखता है. वे कुरआन रखते हैं, दास कैपिटल पढ़ते हैं, और बाइबिल उनका आदर्श ग्रन्थ है, कम्युनिस्ट एक्टिविटीज़ करते हैं, इसीलिये बुद्धिजीवी है. कम्युनिज्म, देशद्रोह और राष्ट्र के विरोध में नारे लगाना बुद्धिजीविता की पहचान है. देशप्रेम की बातें करना, हिंदू धर्म की बातें करना, हिंदू पूजा वगैरह करना यह सब पिछड़ापन है, दकियानूसी बातें हैं.

यह नैरेशन पिछले 70 सालों से दिमाग में ठूंसा जा रहा है, और स्थापित किया जा रहा है सिनेमा से, मीडिया से, साहित्य से, किताबों से, प्रचार पुस्तकों से और तमाम कथाओं से, कहानियों से बहुसंख्यक किशोरों, युवकों को टारगेट में लिए है.

अपने संचारी रचनाओं के सहारे जिसे वह मॉडर्न, आधुनिक या प्रगतिशील कहना/ जताना चाहते हैं, वहां वह बेसिकली कम्युनिज्म, ईसाईयत या इस्लाम को कहना चाहते हैं. भारत में वह हिंदुओं को पिछड़ा, दकियानूस, पोंगापंथी, अंधविश्वासी, प्राचीन कालीन, मूर्ख टाइप का सिद्ध करने में लगे होते हैं.

इन चीजों पर, इन कथानकों पर, प्रस्तुति के तरीकों पर, टारगेट्स पर आपत्ति करनी पड़ेगी. हमें हर बार माइन्यूट व्यू से देखना पड़ेगा और खुलकर इसका विरोध करना पड़ेगा. विशेषकर मुंबईया पिक्चरों को ध्यान से आप देखेंगे तो वह अघोषित रूप में आप पर आक्रामक है. दिखते नहीं है, परन्तु उनके तरीके बड़े चालाकी पूर्ण ढंग से हिंदुत्व पर एग्रेसिव होते हैं.

वह अपने कथानक गढ़ते ही इस तरह हैं, अपने सीन बनाते ही इस तरह हैं कि तार्किक लगें. अपनी बातें कहते ही इस तरह हैं कि वह जस्टिफाई कर सकें, बुद्धिजीविता-पूर्ण लगे, वे अपनी बात दिमाग पर इम्पोज़ करने में सफल भी रहते है. युवाओं की आदत में यह दिखता है.

छोटे बच्चे जो ज्यादा समझ नहीं सकते, वे इनका निशाना है. यह माइंड हंट करने जैसा है. नये संस्कार में जकड़ देना, विशेषकर इंजीनियरिंग कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों, तमाम विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले प्रथम वर्ष-द्वितीय वर्ष के लड़के-लड़कियां, इंटरमीडिएट हाईस्कूल और उस से छोटी कक्षाओं के बच्चे इन फिल्मों को देखते हैं और प्रभावित होते हैं.

जो ज्यादा गहराई में उतरकर नहीं सोचते-समझते, वे इनके टारगेट हैं. धीरे-धीरे वह प्रॉक्सी हिंदू होते चले जाते हैं. हमें खुला प्रतिरोध जताना होगा. हमें साउथ की फिल्मों को बढ़ाना होगा. वे इस मामले में सजग हैं. लेकिन मुंबइया ज़हर वहां भी फैल सकता है. इस पर सचेत रहना होगा,

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