Rekha The Untold Story : बाहर की घटनाएं, अंतर के अनुभव

जब भी हम किसी वाद की बात करते हैं तो उसके साथ अपवाद अपने आप जुड़ जाता है. जैसे आप दिन की बात करते हैं तो दिन का दिन होना, रात होने के कारण है. यदि रात का अँधेरा ना होता तो दिन का 24 घंटे का उजाला हमारी आँखों को चुभने लगता.

ठीक वैसे ही जब हम हेमा मालिनी, परवीन बॉबी, राखी, ज़ीनत जैसी सुंदरियों की बात करते हैं, जिनमें कोई अपनी ख़ूबसूरती के कारण ड्रीमगर्ल कहलाता है, कोई अपनी झील सी नीली आँखों के लिए नशीली, कोई अपनी आकर्षक देह के कारण कामुक. तब एक सांवली, मोटी सी लड़की इन सुंदरियों के सामने अपवाद रूप में ही प्रस्तुत होती है.

उस लड़की को देखकर किसी को विश्वास ही नहीं हुआ था कि सुन्दरता और अभिनय में किसी भी पैमाने पर फिट ना बैठने वाली ये लड़की अपने पैमाने खुद गढ़ेंगी और फिर उस पैमाने पर आने वाली नस्ल को तौला जाएगा.

फिर तो उस लड़की रेखा ने ऐसा Make Over किया कि उस मोटी सी लड़की पर जवानी में खूबसूरत नाम से फिल्म बनी, तो बुढ़ापे (इस शब्द के लिए क्षमा सहित) में सुपर नानी नाम से.

रेखा के बारे में मेरे पूर्वलिखित लेखों से कई लोग सहमत नहीं. बिलकुल वैसे ही जैसे आजकल की आधुनिक पीढ़ी एमी (अमृता प्रीतम) के लेखन को उस स्तर तक पहुँच कर नहीं पढ़ पाती जिस स्तर पर जाकर उन्होंने लिखा है. जिसको कभी आप सुफियाना कहते हैं, कभी आध्यात्मिक तो कभी सांध्य भाषा में लिखे विज़न. अब आजकल की पीढ़ी जो दिन प्रतिदिन भौतिक सुख सुविधा के नज़दीक होती जा रही है और आध्यात्मिक प्रयोगों से दूर, ऐसे में आप उनसे अधिक उम्मीद रख भी नहीं सकते.

लेकिन इस मामले में रेखा ज़रा एक क़दम आगे हैं, रेखा ने नारी स्वतंत्रता के पुराने नियमों को ध्वस्त कर अपना जीवन अपनी मर्ज़ी से जिया. और जो चेतना देह और दैहिक नियमों में नहीं समाती उसे बाग़ी करार दिया जाता है. रेखा सामाजिक जीवन में एक बाग़ी परन्तु आत्मिक स्तर पर एक पूर्ण स्वतन्त्र चेतना है.

यह जो बाहर की घटनाएँ होती हैं वो आपको सोने से कुंदन बनने के लिए तपाती है. कई लोग रेखा को सोना नहीं पीतल समझते हैं, लेकिन उस पीतल ने हर बार नई कलई के साथ ऐसी चमक दिखाई जो आपको शुद्ध सोने में भी कभी नहीं दिखी होगी. और सबसे बड़ी बात पीतल अपनी आप में पूरा होता है. सोने को तो फिर भी आभूषण में ढलने के लिए अन्य धातु की मिलावट चाहिए होती है.

मैं रेखा के बारे में जब भी विचार करती हूँ मुझे उसके आत्मिक अनुभवों की रेखा इतनी लम्बी दिखाई पड़ती है कि बाहरी अनुभवों की रेखाएं छोटी और गौण हो जाती है. मानस माँ अमृता प्रीतम ने जैसे रसीदी टिकट के प्राक्कथन में लिखा है… “बाहर की घटनाएं, अंतर के अनुभव”.

हम वो लोग हैं जो किसी व्यक्ति के इर्दगिर्द के बाहरी अनुभवों में ही उलझकर रह जाते हैं, और उसकी छवि भी उसी अनुसार गढ़ लेते हैं. लेकिन व्यक्ति का वास्तविक व्यक्तित्व तो तब बनता है जब वो उन घटनाओं से गुज़रकर आत्मिक अनुभव प्राप्त करते हुए चेतना को ऊंचे पायदान पर ले जाता है.

रेखा अपने समकालीन अभिनेत्रियों के साथ प्रतियोगिता में किसी भी पायदान पर नहीं ठहरती, बल्कि रेखा अपने आप में एक सीढ़ी है जिसका हर पायदान उसकी अपनी उन्नति का परिचायक है. आजकल की अभिनेत्रियां यदि केवल इस एक सीढ़ी पर भी चढ़ने का प्रयास करें, तो उसका हर पायदान उनके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं होगा.

इसे आप तब तक किसी व्यक्ति के लिए उपयोग में लाई अलंकारिक भाषा की पराकाष्ठा कह सकते हैं, जब तक आपने परा व्यक्ति कोण (Transdimenssion) की नज़र से उसे नहीं समझा. रेखा के व्यक्तित्व को छोटा करके देखने के लिए आपको उससे बड़ी रेखा खींचनी होगी जो हर किसी के बस की बात नहीं, क्योंकि उन बाहरी घटनाओं के साथ अंतर के अनुभवों को जानने के लिए भी आपको दो बिन्दुओं की आवश्यकता होगी.

रेखा के लिए तो एक ही बिंदु काफ़ी है जिसको वो होठों पर लगाकर इठलाती हुई समाज की देहरी पारकर जाती है और लोग उसे अनंत में तक जाते हुए देखते रह जाते हैं… लेकिन कोई नहीं जानता वो दूसरा बिंदु कहाँ है जहाँ पर यह रेखा ख़त्म होती है.

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