बस ये आशीष मांगिए, आपको ही मिले तिरपाल से निकल भव्य मंदिर की यात्रा कराने का सुअवसर

मैं 7 वर्ष का रहा हूंगा जब मैने श्रीकृष्ण जन्म भूमि का मस्जिद के नीचे वाला वो गर्भ गृह देखा था जो महमूद गजनवी, सिकन्दर लोदी, और औरंगजेब की घृणा और हमारे पराभव और गुलामी के अमिट स्मृति चिन्हों में एक है.

मथुरा ननिहाल थी, सो इस की कहानियाँ घर में पिताजी और भईया के मुंह से अकसर सुनता रहता था. मात्र सात वर्ष की अवस्था थी लेकिन मुझे खूब ध्यान है उस गर्भ गृह को देख कर मन में ना जाने कितने खिसियाहट का भाव आया था… मेरे लिए तब गर्भ गृह का मतलब मानो देवकी मैया के गर्भ से कृष्ण जी के जन्म लेने से था… वो तो बाद में ज्ञात हुआ कि ये मंदिर का मुख्य और प्रतिमा स्थल होता है.

दूसरी बार यह गर्भ गृह 13 वर्ष की अवस्था में देखा… तब वहाँ महामना जी और डालमिया जी द्वारा प्रस्तावित मंदिर का मॉडल और निर्माण आदि देखे. इसके पश्चात जब भी मथुरा जाता वहाँ वो ईदगाह वाली मस्जिद देख कर ना जाने कितने मलाल और आक्रोश से पेट और मस्तिष्क में मथनी सी चलने लग जाती…

जन्मभूमि पर जाता जरूर था, लेकिन ना तो गर्भ गृह की ओर देखने की हिम्मत हो पाती और ना वहाँ भव्य रूप लेते विशाल भागवत मंदिर की प्रगति की ओर देखने को ही मन कर पाता… बस पीछे बने पोथरा कुंड की ओर जा कर जशोदा मैया कृष्ण जी को याद मात्र कर लेता…

मथुरा में रहकर मैं पढ़ा… शाखा जाना शुरू किया… चार बहिनों, मौसी, ननिहाल के कारण ना जाने कितनी ही बार मथुरा जाता रहा हूँ… घर आँगन सा है मथुरा मेरे लिए… लेकिन मैंने बचपन में दो बार देखने के बाद ना तो फिर कभी वो गर्भ गृह देखा, ना ही वहाँ बने विशालकाय मंदिर…

हाँ, ना चाहते हुये वो ईदगाह मस्जिद हर बार जरूर दिख जाती है जो इतना ज्यादा चिढ़ा जाती है कि हर जन्माष्टमी पर मथुरा और द्वारिका के जन्मोत्सव को श्रद्धा पूर्वक भक्ति में लीन हो कर देखने के बावजूद जैसे ही केशव देव मंदिर के नवनिर्मित मंदिर के गर्भगृह का लाइव जन्मोत्सव आता है, मेरी निगाहें टीवी स्क्रीन से तुरंत हट जातीं हैं… उस मंदिर के बाल कृष्ण मानो हर बार तिरिस्कार सा करते मालूम पड़ते हैं…

तो योगी जी! जरा जान सकें, समझ सकें मेरे जैसे मानसिक रोगी की मानसिकता तो समझ लीजिये… हमारे श्री राम अपने अस्तित्व और पहचान के लिए किसी विशालकाय मूर्ति के भरोसे नहीं है… उनकी प्रतिमा तो जन जन के मन में बसी है…

आपके गुरु महंत अवैद्यनाथ जी का राम जन्म भूमि आंदोलन, कोई मंदिर निर्माण आंदोलन नहीं था… ये आंदोलन था ‘श्री राम जन्म भूमि मुक्ति आंदोलन’… ये आंदोलन श्री राम की पूजा हेतु मंदिर निर्माण के लिए नहीं था… श्री राम की पूजा तो हर हिन्दू अपने मन में दिन में ना जाने कितनी ही बार करता है…

उसका तो अभिवादन ही ‘राम राम’ है… हजारों नहीं, लाखों मूर्तियाँ हैं श्री राम की… और राम के नाम से बड़ी कोई मूर्ति आप तो क्या, दुनिया में कोई बनवा ही नहीं सकता…

हमने मंदिर निर्माण की लड़ाई नहीं अपने गुलामी के प्रतीक को हटा अपनी अस्मिता के पुनर्स्थापन के लिए लड़ी है… इसका पहला चरण पूरा हो गया और आशा है शेष कार्य पूरा हो ही जाएगा…

उस लड़ाई में भागीदार हम गिलहरी से सेवक ये भी जानते हैं कि आज अयोध्या में जन्मभूमि पर मंदिर ही है… कोई मस्जिद नहीं… और दुनिया की कोई भी शक्ति अब उस स्थिति को बदल भी नहीं सकती…

सो हमको मंदिर निर्माण की भी कोई जल्दी नहीं… हमारे मंदिर निर्माण का कार्य तो 10 नवंबर 1989 को ही शुरू हो गया था जो कि अभी तक अनवरत चल रहा है… सीमेंट रहित निर्माण हेतु पत्थर तराशने का काम अभी तक बंद हुया ही कहाँ है…

हमारी बेचैनी, व्याकुलता, आशंका और आतुरता तो राजनेताओं की प्रतिबद्धता में आए बदलाव के कारण है… आखिर क्या कारण है कि मोदी जी और उनका कोई भी सेनापति श्री राम लला के द्वार टीके नहीं पहुंचा… रामलला से कौन सी दुश्मनी मान कर बैठ गए हैं… क्यों नजरें चुरा रहे हैं… पूरे विश्व के मंदिरों की पूजा करने वाले मोदी जी को रामलला से क्या भय लगता है?

योगी जी आप अयोध्या गए… रामलला की शरण में भी गए, बस ये ही पर्याप्त है… आपकी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए… आप सौ-दो सौ फीट की मूर्ति को राजनीति के शो-बाजों के लिए ही छोड़ दीजिये… आप बस रामलला से आशीर्वाद मांगिए कि वे तिरपाल से निकल भव्य मंदिर की यात्रा कराने का सुअवसर आपको ही दें.

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