MUMPS : हर व्यक्ति को होना ज़रूरी है संक्रामक बीमारियों की जानकारी

माताजी के श्राद्ध के दिन मेरे सभी करीबी घर के लोग निवास पर पधारे. बहुत अच्छा लगा. परिवार की एक पढ़ी लिखी बहू को ‘Mumps’ यानि “गलसुए” की संक्रामक बीमारी डाक्टर ने बताई थी. आधा सिर भीषण दुख रहा था. गाल में सूजन थी, और जबड़ा तड़क रहा था. इसके पहले हल्का बुखार भी आया और गटकने में मामूली तकलीफ भी थी.

हालत देख कर साफ लग रहा था कि MUMPS अर्थात “गलसुए ” की संक्रामक बीमारी हो सकती है. रोग की असली तस्दीक डाक्टर गले के भीतर तक जिह्वा को ‘वुडन स्ट्रिप ‘से दबाकर ही निरीक्षण करके पुख्ता तौर पर कर सकता है, कि गलसुए की बीमारी है या नहीं. अगर बीमारी होगी तो गर्दन के द्वार पर मौजूद दोनों ‘कऊऐ ‘ यानि “Tonsils” भीतर की तरफ पिचके होंगे और गला बुरी तरह से लाल सुर्ख नजर आ रहा होगा. असली में जबडे के पास मुंह में “लार” पैदा करने वाली ग्रन्थियां होती हैं. इन्हें ‘Salivary Glands’ कहा जाता है. लार बनाने वाली ग्रन्थियों में जब वायरस का अतिक्रमण होता है तो “गलसुए” की खतरनाक बीमारी हो जाती है.

गलसुए की बीमारी छोटे बच्चों को एक दम जल्दी लग जाती है. बड़े लोगों को अगर उनके बचपन या युवावस्था में Mumps की बीमारी अगर एक बार कभी हो गई हो, तो फिर जिन्दगी में दुबारा कभी नहीं होती. लेकिन अगर किसी को गलसुए की बीमारी है, और उसकी नाक का पानी या लार कहीं मरीज के हाथ में लग गया हो, तथा गलसुए के मरीज ने लार लगे हाथ को टेबल कुर्सी या किसी दूसरी जगह छू लिया हो, फिर किसी बच्चे या बड़े ने उस जगह को अपने हाथ से छू लिया हो, तो दूसरे आदमी को यह बीमारी लग जाएगी. तभी इस बीमारी को संक्रामक या “छूत” की बीमारी भी कहा जाता है.

यह बीमारी इतनी तेजी से फैलती है कि “Mumps” से पीड़ित व्यक्ति ने जिस गिलास से पानी पिया है, या जिस प्लेट में खाना खाया है. अगर उसके झूठे बर्तनों में कोई दूसरा आदमी भोजन कर ले या पीड़ित व्यक्ति किसी बच्चे या बड़े को KISS यानि किसी के गाल चूम ले, तो पप्पी लिये जाने वाले बालक बालिका या व्यक्ति को इस “गलसुए” की बीमारी हो जाती है.

आजकल छोटे बच्चों को “MMR” नामक टीका बचपन में ही लगा दिया जाता है. इससे मीज़ल, मम्पस् और रूबेला की बीमारियां कभी नहीं होती. अगर हो भी जाए तो खतरनाक रूप नहीं लेती. ‘गलसुए ‘ की बीमारी की शुरूआत शरीर में दर्द, भयंकर सिर दर्द, अपच, भोजन की अरूचि, थकान और बुखार से होती है. कोई भी एण्टीबायोटिक इसमें असर नहीं करती. लगभग 6 दिनों के भीतर ही लार ग्रन्थियों में सूजन आकर गाल लटकने लगता है. थूक तक गटकने में पीड़ा होती है तथा असहनीय दर्द, गले में और जबड़े में होने लगता है.

डाक्टर दर्द कम करने की दवाईयां देता है और अन्य कोई जटिलता न हो इसका उपचार करता है. पर यह बीमारी जैसे आई थी वैसे ही अपने आप मरीज को हिला डुला कर, कमजोर करके, दो तीन हफ्तों में चली जाती है. डाक्टरों के अनुसार ज्यादा से ज्यादा पानी (पर फल का रस कदापि नहीं ), और खिचड़ी, दलिया, दाल अर्थात द्रव आहार लेने की सलाह देते हैं. गरम कुनकुने नमक मिले पानी से गरारे करने की सलाह भी देते हैं.

असली मे गलसुए की बीमारी PARAMYXOVIRUS फेमिली का एक वायरस के कारण से होती है. खास कर मधुमेह की बीमारी के लोगों को यह बहुत त्रासदायी बीमारी होती है. कहा जाता है कि अगर इस बीमारी को ठीक से नहीं सम्हाला गया, तो 6000 मरीजों में एक को मस्तिष्क ज्वर तक हो जाता है तथा 15 हजार मरीजों में एक मरीज के कान खराब हो जाते हैं, उसकी श्रवण क्षमता कम हो जाती है.

कई बार कुछ पुरूषों के अंडकोष में सूजन आ जाती है, तथा उनकी प्रजजन क्षमता घट जाती है. इसी तरह महिलाओं मे ‘ओवरी’ में सूजन भी आ जाती है.

यह सामान्य सी जानकारी हर किसी को होना लाजमी है. मुझे याद है ‘गलसुए‘ के बारे में और इसी तरह की अन्य दूसरी छूत की बीमारियों की जानकारी, जब मैं गुना में छटवी कक्षा में पढ़ता था, तब हमारी कक्षा में डाक्टर सेठी, और शाम को उदासी की बगिया में राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की शाखा में शाखा इन्चार्ज श्री पवन जैन के साथ मुस्लिम डाक्टर सौलत बताया करते थे. उन दिनों संघ को इतना अछूत नहीं मानते थे. डाक्टर सौलत मुसलमान होकर भी पवन जी के साथ आकर हमें टीबी, टाईफाईड, मलेरिया जैसी बीमारियों के बारे में समझाया करते थे.

कितने आश्चर्य की चीज़ है कि आज से 60-65 साल पहले, गुना जैसी छोटी जगह पर हमारे स्कूल की क्लास में और एक मुसलमान डाक्टर “सौलत” ने उदासी आश्रम स्थित संघ की शाखा में आकर हमें जो ज्ञान दिया था, आज यह सब हमारे स्कूलों की पढ़ाई में जीवन उपयोगी बीमारियों और उनसे बचने के उपाय किसी भी कक्षा में कहीं पर भी कोई नहीं बताता है और किसी पाठ्यक्रम में भी मौजूद नहीं है.

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