‘थल’ में जाने वाले ‘मल’ को ‘जल’ में डाल, समझ रहे उसे स्वच्छता!

गांव में एक पुतई चा रहते थे, बड़े हसौड़. सुबह-सुबह लोटा लेकर अपने ही खेत में खड़े होकर आने-जाने वाले को खैनी (सुर्ती) ऑफर करते और 3-4 लोग बतियाते-बतियाते उधर ही बैठ कर निपट लेते. बाबा कहते, देखा सरवा के, अपने खेत में निपटान करे बदे खैनी क रिश्वत देवेला. कई बार तो पुतई चा के मुंह पर ही कह देते. चाचा भी बुरा नहीं मानते, उल्टा कहते कि बाऊ साहब, हमें कुम्भकरण भेटाता ना तो उससे कहते कि भैया 6-6 महिन्ना पर सुत के उठते हो तो कहीं निपटते भी होंगे, त हमरे खेतवे में फारिग हो लिया करो. सच्ची बताई बाऊ साब, हमार खैनी का खर्चा बच जाता.

नाइट्रोजन पेड़-पौधों के लिए सबसे आवश्यक तत्व है, पर साथ ही फॉस्फोरस और पोटैशियम भी चाहिए. सिर्फ पेड़ों को ही नहीं, इन तीनों के बिना धरती पर किसी भी प्रकार का जीवन संभव नहीं है. एक आदमी को साल भर की फॉस्फोरस की जरूरत पूरी करने के लिए 22.5 किलो फॉस्फेट चट्टानों का खनन करना होता है.

नाइट्रोजन तो अमोनिया बना कर मिल जाता है पर फॉस्फोरस और पोटैशियम के लिए खुदाई करनी होती है इनकी चट्टानों की, और ये मिलते भी हैं केवल कुछ खास जगहों पर. पोटाश तो बहुत गहराई में मिलता है. दुनिया में इतना पोटाश है कि कई सौ साल तक चल जाएगा काम, पर इनका 81 फीसदी सिर्फ कनाडा और रूस के पास है.

फॉस्फेट का 83 फीसदी सिर्फ 4 देशों के पास है जिसमें से चीन और अमेरिका इसका निर्यात नहीं करते, सिर्फ मोरक्को करता है. और ये सारा भंडार सिर्फ 130 साल में खत्म हो जाएगा. फिर?

बनावटी नाइट्रोजन से पर्यावरण को नुकसान

अंधविश्वास विज्ञान में भी है जनाब. विज्ञान का ये अजीब तर्क है कि हम कुछ तो खोज ही लेंगे. पिछली महान खोज 1908 में फ्रिट्ज हेबर ने की थी. आज 100 साल से ऊपर हो गए और कोई नई खोज नहीं हुई इस क्षेत्र में, जबकि अब विज्ञान व्यापक है. हजारों वैज्ञानिक, प्रयोगशालाएं और शोध, 100 साल में कुछ नया नहीं खोज पाए.

दुनिया भर में 10 करोड़ टन बनावटी नाइट्रोजन का इस्तेमाल होता है जिसमें से सिर्फ 1.7 करोड़ टन ही पौधे ले पाते हैं. बचा हुआ हमारी जमीन, जल और हवा को दूषित करता है. मिट्टी रेतीली होती है, भूजल प्रदूषित और ओजोन परत में छेद.

सोना देकर खरीदा जाता था मल-मूत्र

आज सीवर आधुनिकता का पैमाना है. जब 19वीं शताब्दी में पहली बार यूरोप में सीवर बिछने लगी तो आधुनिक कृषि के जनक श्री युस्टुस फॉन लिबिह जीवित थे. उन्होंने इसे उर्वरकों की बरबादी बताया था. फ्रेंकलिन किंग की किताब ‘फॉर्मर ऑफ फोर्टी सेंचुरीज़’ में लिखा है कि 1908 में शंघाई के एक ठेकेदार ने 78000 टन मल-मूत्र 31000 डॉलर मूल्य का सोना देकर खरीदा था. सोचिये, जिसे हम और आप यूं ही बहा देते हैं और जिसे किसी नदी में डाल देने के लिए सरकार इतना खर्च करती है उसे सोना देकर खरीदा जाता था.

कचरा नहीं, उर्वरक है ये

नाइट्रोजन, फॉस्फोरस के अलावा पौधों को बहुत कम मात्रा में ही 18 जरूरी तत्व और चाहिए, इनके बिना बाकी चीजें काम नहीं करती, पर इनका मार्केट नहीं हैं. इन तत्वों का प्राकृतिक स्रोत है मिट्टी की जैविक खाद. इस खाद का विशाल स्रोत है हमारा मल-मूत्र. हमारे मल में कार्बन की भरमार होती है, और जीवाणुओं की भी जो इस कार्बन को पचा कर मिट्टी के लायक बनाये. मिट्टी के जीवाणुओं को ऊर्जा के लिए कार्बन चाहिए और प्रोटीन के लिए नाइट्रोजन.

अगर मिट्टी में नाइट्रोजन के मुकाबले तीस गुना कार्बन ना हो तो कितना भी नाइट्रोजन फॉस्फोरस डाल दीजिए, फसलों को बहुत लाभ नहीं होगा. उर्वरकों को वापस मिट्टी में डालने का बेहतरीन जरिया है हमारा मूत्र. अगर इसे ठीक तरीके से खेतों में पहुंचा दें तो इससे बढ़िया कुछ नहीं. इसमें नाइट्रोजन भी होता है. ये कचरा नहीं है, उर्वरक है. एक जगह पर यदि मल-मूत्र इकठ्ठा हो सके तो इन्हें कारखानों जैसा माहौल देकर हमारे खेतों तक पहुंचाया जा सकता है.

लद्दाख का ‘छागरा’

लद्दाख में ‘छागरा’ होता है. घरों के बाहर एक कमरे का दो-तला ढांचा. नीचे वाला तला बन्द कोठरी और ऊपर वाले तले में एक छेद जहाँ लोग मलत्याग करते हैं. मल नीचे गिर जाता है जिसके ऊपर राख डाल दी जाती है. आने जाने वाले लोगों से इस छागरा को इस्तेमाल कर लेने के लिए कहा जाता है. छागरा के आदी जब हमारे कमोड देखते हैं तो उन्हें समझ नहीं आता कि क्यों पीने लायक पानी और खेती लायक खाद को आपस में मिला कर बरबाद किया जा रहा है.

तिरुचिरापल्ली के मूसिरी के विशिष्ट शौचालय

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली के मूसिरी ब्लॉक के कुछ गांव में पिछले 10 साल में कई ऐसे शौचालय बने हैं जो बिलकुल लदाख के छागरा सिद्धांत पर काम करते हैं. मूसिरी आज भारत में शुचिता का आदर्श है.

मूसिरी में सार्वजनिक शौचालय नगर पंचायत की शान है. ये पर्यटक स्थल की तरह है. यहां शुरू-शुरू में शौच करने के लिए लोगों को एक रुपया ‘दिया’ जाता था. अब ये व्यवस्था नहीं है पर सफाई और प्रसिद्धि उतनी ही है. यहां 14 (7 पुरुषों और 7 महिलाओं के लिए) शौचालय हैं. विशिष्टता इसकी सीट है, जिसमें मल, मूत्र और धोने के बाद के पानी, तीनों के लिए अलग अलग गड्ढे हैं.

मल गड्ढे में गिरता है, उस पर राख डालकर ढक्कन लगा देते हैं. पानी एक खास नाली में जाता है जिसमें कुछ खास पत्थर और पौधे लगे होते हैं जिसने होकर ये केले के पौधों में जाता है, बिलकुल निर्दोष बनकर. 14 तसलों का मूत्र कोयले के फ़िल्टर से होता हुआ एक टँकी में इकठ्ठा होता है जिसे खेतों में डाला जाता है.

मूत्र छिड़काव पर प्रति हेक्टेयर अतिरिक्त लाभ और उर्वरक की बचत

तिरुचिरापल्ली के राष्ट्रीय केला शोध केंद्र ने मूत्र का फसल पर असर समझा है. मूत्र छिड़काव पर प्रति हेक्टेयर 45 हजार का अतिरिक्त लाभ और हजार रुपये के उर्वरक की बचत होती है. जरा पूरे देश के मूत्र के उपयोग पर होने वाले लाभ और उर्वरक पर बचत का अनुमान लगाइये.

बेंगलुरु की सामाजिक संस्था अर्घ्यम ने राज्य कृषि विश्वविद्यालय के साथ शोध कर ये बताया है कि देश की कुल आबादी के मूत्र से हर साल 67 लाख टन नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम मिल सकता है. मक्का, केला, टमाटर, शिमला मिर्च और खरबूजे पर इसके प्रयोग से अधिक और उन्नत फसल प्राप्त हुई, फल बड़े थे, और बनावटी उर्वरकों की बचत तो खैर थी ही.

बदलनी होगी प्राथमिकताएं

जब आबादी कम थी तो मल-मूत्र चिंता का विषय नहीं था, पर आज हम 7 अरब है. अमोनिया कारखानों का यूरिया, मोरक्को का फॉस्फेट, नदियों-भूजल का पानी, बनावटी उर्वरक, ढुलाई के लिए जहाज, ट्रेन, ट्रक, इनके लिए पेट्रोल डीजल और बिजली, फिर बिजली के कारखाने, कोयले की खदानें, इतना जतन किसके लिए, खाने की लिए. और वही खाना कुछ ही घण्टों में मल-मूत्र बन जाता है.

फ्लश चला कर मल को पानी के साथ मिलाकर बहा देने से हम अपने ही जल स्रोतों को खराब कर रहे है. ये स्वच्छता नहीं अनैतिकता है. हम पानी-बिजली के लिए आंदोलन कर देते हैं पर दूर बहती नदियों का पानी छीन लेना, उसे दूषित करना अपना अधिकार मानते है.

हम भोजन को सम्मान से देखते हैं, पर वही भोजन जो हमारे ही पेट से होकर मल बन गया और जो फिर से हमारा भोजन पैदा कर सकता है उसे घृणा से देखते हैं. ताज्जुब है कि जिस ‘मल’ को ‘थल’ में जाना चाहिए था उसे हम ‘जल’ में डाल रहे हैं और इसे स्वच्छता/शुचिता समझ रहे हैं.

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