करारा… सचमुच बेहद करारा वार, भ्रष्टाचार पर : भाग-1

अक्सर लोग ये सवाल करते हैं कि मोदी जी ने भ्रष्टाचार और कालेधन पर बड़ी-बड़ी घोषणाएँ की थीं. लेकिन स्विस बैकों में कालधान हो व बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी नेता व अधिकारी हों, क्या कार्यवाही हुई? जनलोकपाल भी अटका रह गया. केवल जनता को ईमानदारी का पाठ पढ़ा रहे हैं, GST थोप दिया, नेता व अधिकारी मस्त हैं! कैसे मान लें, ये सरकार जुमलेबाज़ी से इतर भ्रष्टाचार पर कोई सख़्त क़दम उठा रही है?

समझने की बात है कि यदि कोई भ्रष्टाचार के स्तर का आकलन करें तो औसतन 70-80% सरकारी अधिकारी व कर्मचारी इसमें लिप्त रहे हैं! वैसे तो आम लोगों द्वारा बिजली चोरी, टैक्स चोरी करना, ग़लत सर्टिफ़िकेट लगा कर सरकारी लाभ लेना, ये सब भी भ्रष्टाचार हैं. लेकिन सब एक-दूसरे को चोर कहते हैं! अपनी चोरी को इसलिए न्यायोचित ठहराते हैं क्योंकि सब चोर हैं तो हम क्यों न करें!

यानी भ्रष्टाचार का वायरस बहुत दूर-दूर तक फैला हुआ है, कोई भी इससे अछूता नहीं रहा है! ये वायरस सिस्टम की अपारदर्शिता से उत्पन्न गंदगी में लगातार पनपता रहा है और सिस्टम में बिना पारदर्शिता सुनिश्चित किए, केवल लोकपाल द्वारा भ्रष्टाचार से संघर्ष की बात वैसे ही बेइमानी है, जैसे बिना गंदगी साफ़ किए डॉक्टर का विज्ञापन करना!

डॉक्टर ज़रूरी है लेकिन उसकी प्रभावी भूमिका के लिए गंदगी का ख़ात्मा उससे पहले ज़रूरी है, वरना अस्पताल मरीज़ों से पटा रहेगा लेकिन मरीज़ों के बढ़ने का क्रम जारी रहेगा. ऐसे में केवल डॉक्टर कमाएगा, स्वास्थ्य फिर भी सुलभ नहीं होगा! वैसे ही केवल लोकपाल के केस में भी.

दूसरे लोकपाल भी स्वदेशी होना चाहिए और यहाँ तो जनलोकपाल आंदोलन विदेशी फ़ंडिंग वाली सिविल सोसायटी द्वारा भ्रष्टाचार के बहाने विदेशी प्रभुत्व की भारत में स्थापना भर थी. अन्यथा वो क्यों चाहते थे कि लोकपाल पैनल में सिविल सोसायटी के आधे सदस्य रहें और बिना उनके अनुमति लोकपाल की नियुक्ति न हो! इसे कहते हैं आपकी कमी को शत्रु द्वारा अपने फ़ायदे के लिए उपयोग में लाना! बस यही हो रहा था!

भ्रष्टाचार के जड़ में दो बड़ी बातें हैं. पहली तो प्रणाली में वो कमी, जिससे आसानी से बिना भय, भ्रष्टाचार द्वारा अवैध रक़म यानी कालधान की उगाही की जा सकती है! दूसरा प्रणाली में वो प्रावधान जिससे उसे ठिकाने लगाकर आजीवन उसका आनंद उठाया जा सकता है!

पहले बात करते हैं कालाधन उगाही की! सरकारी सवाओं में रिश्वत, टेंडर, नीलामी, इम्पोर्ट ओवर प्राइसिंग, एक्सपोर्ट अंडर प्राइसिंग, यही तरीक़े रहे हैं बड़ी से बड़ी मात्रा में काला धन उगाही के! लगभग सारे घोटाले इसमें कवर हो सकते हैं! जिसे रोकने के लिए सरकार ने निम्न कार्य किए-

1. सभी सरकारी सेवाओं को ऑनलाइन करना

जैसे डिजिटल इंडिया के माध्यम से सभी सरकारी सेवाओं को धीरे-धीरे ऑनलाइन करना, जिससे रिश्वत न देनी पड़े, योजना का लाभ सही लाभार्थी को मिले! डिजिटल इंडिया के विकास कार्यक्रम के साथ RTO हो, अस्पताल हो, राशन, खाद और सब्सिडी में डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र हो, या कोई भी सरकारी योजना हो, सभी में सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने में बड़ी कामयाबी पाती जा रही है! जिससे पिछले वर्ष सरकार के कुल 50-60 करोड़ से ज़्यादा बचे जो देश में करोड़ों दलालों, सरकारी मुलाजिमों, सरपंचों के जेब में जाने थे! डिजिटलीकरण के साथ आगे ये आंकड़ा और बड़ा होगा!

2. सारे छोटे-बड़े टेंडर ऑनलाइन प्रणाली से

पुनः सरकार ने सरकारी विभागों में सारे छोटे-बड़े टेंडर ऑनलाइन प्रणाली यानी e-tender द्वारा लागू कर दिया ताकि कोई भी पार्टी जो टेंडर में भाग लेना चाहती है, टेंडर देख सके और टेंडर भर सके. अभी तक पहले से ही सेट लोगों का इस पर क़ब्ज़ा था जो अधिकारियों को कमीशन खिलाने के एवज़ में टेंडर लेते थे! टेंडर कब निकला, कब और किसने भरा और किसे मिल गया, किसी को पता नहीं चलता था, लेकिन e-tender में ऐसा नहीं होगा! इससे ठेकेदार व अधिकारियों में मिलीभगत के चलते 10 रुपए का काम 20 रुपए में करा कर बदले में अपना कमीशन लेकर देश को चूना लगाने वाली पद्धति का अंत होता जा रहा है! इम्पोर्ट ओवर प्राइसिंग व एक्सपोर्ट अंडर प्राइसिंग के ज़रिए कालाधन उगाही की प्रणाली को भी e-टेंडर माध्यम से रोक दिया गया!

3. सरकारी सम्पत्तियों व प्राकृतिक संसाधनों की e-auction

पुनः सरकारी सम्पत्तियों व प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी e-auction के पारदर्शी विधि द्वारा की जा रही है, जिससे कभी औने पौने दाम पर बिके कोयला खदान भी लाखों करोड़ रुपए में बेचे गए और पैसा सरकारी ख़ज़ाने में आया! माने व्यवस्था में पारदर्शिता द्वारा भ्रष्टाचार पर नकेल कसी जा रही है और इसका विकास होता जा रहा है, अधिकारियों की अवैध कमाई घटती जा रही है!

ये तो रहा कालाधन उगाही का तरीक़ा जिस पर वार हुआ, अब दूसरा है काला धन छुपाने और उन्हें सफलतापूर्वक उपभोग करने योग्य बनाने का तरीक़ा, उस पर क्या कार्यवाही हुई! देखते हैं-

1. बेनामी क़ानून

अब मान लीजिए किसी ने येन केन प्रकारेण काला धन बना भी लिया तो बेनामी क़ानून आने के बाद अब वो किसी अन्य के नाम से (जैसे बीवी, बच्चे, माता, पिता, रिश्तेदार आदि) सम्पत्ति नहीं ले सकता! क्योंकि अब जिसके नाम से सम्पत्ति ली जा रही है, उसके पास ये धन कैसे आया ये बताना अनिवार्य है!

2. शेल कम्पनी और P-note

अब 2 नम्बर की कमाई से बेनामी सम्पत्ति न ले पा रहे भ्रष्टाचारी के पास एक ही रास्ता बचता है कि वो काले धन को सफ़ेद कर उससे सम्पत्ति ले या उसका कहीं और निवेश करें! वो रास्ते थे शेल कम्पनी और P-Note जिसके माध्यम से ऐसा किया जाता था.

जैसा कि विदित है कि ऐसी 2 लाख से ज़्यादा फ़र्ज़ी शेल कम्पनियों को तो सरकार ने ताला मार दिया और भविष्य में फ़र्ज़ी शेल कम्पनियाँ पैदा न हों उनका भी इंतेजाम कर दिया. Shell माने जैसे बुलेट fire होने के बाद पीछे बची shell (कारतूस का खोल), वैसे ही shell कम्पनी होती है!

फ़र्ज़ी शेल कम्पनियों से तात्पर्य है ऐसी कम्पनियाँ जिनका वास्तव में कोई asset नहीं होता (केवल कागजों पर होता है), माने जो खोखली होती हैं और वास्तव में कहीं अस्तित्व में नहीं होती, जिनका देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं होता, उनके ज़रिए काले धन को कम्पनी के प्रॉफिट में दिखाकर सफ़ेद कर लिया जाता है, उनका सरकार ने बहुत बढ़िया इंतेजाम कर डाला! नोटबंदी उसमें बहुत प्रभावी रही जिसके ज़रिए उनकी पहचान हो पाई!

दूसरा P-Note (participatory note) जिससे तात्पर्य है कि एक ऐसा instrument जिससे कोई भी निवेशक बिना अपनी पहचान व धन का स्त्रोत बताए इंडियन स्टॉक मार्केट में भारत या मॉरिशस में पंजीकृत विदेशी निवेशक (FIIs ) के माध्यम से निवेश कर सकता है. इसके ज़रिए भ्रष्टाचारियों ने 2 नम्बर के माल को अपनी या अपने रिश्तेदारों की कम्पनी में निवेश करवाया और बड़े बड़े बिज़नस लगा दिए! शॉपिंग माल, बिल्डिंग, फ़ैक्टरी बहुत कुछ लगे ऐसे निवेश से! 2 नम्बर का माल एक नम्बर भी हो गया और कमाई का एक ज़रिया भी मिल गया! इसे आप बेनामी निवेश भी कह सकते हैं! कुछ लोग इसे मॉरिशस रूट भी कहते हैं! और सरकार ने इस बेनामी निवेश पर भी ताला मार दिया!

3. स्विस बैंक अकाउंट इंफर्मेशन शेयर अग्रीमेंट

और हाँ, इस भ्रम में मत रहिए कि स्विस बैंकों में जमा पैसा वहाँ पड़ा हुआ है. वो भी इसी P-Note के ज़रिए इसी देश में निवेश हो चुका है! किस कम्पनी में हुआ, किसने किया, किसी को नहीं पता! क्योंकि P-Note जैसी चीज़ को पिछली चोर सरकार ने जानबूझ कर लीगल कर रखा था! इसीलिए ये दलील देना छोड़िए कि सरकार स्विस बैंकों से पैसे नहीं ला रही है!

वो रकम पहले ही आ चुकी है, 1 नम्बर में कन्वर्ट हो चुकी है, जिसका पकड़ा जाना नामुमकिन है! हम ही ने कांग्रेस को सत्ता देने का पाप किया था और सारे पाप reversible नहीं होते! इसे मोदी की नहीं, अपने कुकर्म मानकर ख़ुद को माफ़ कीजिए और पिछले पर नहीं बल्कि अगले पर नज़र गड़ाइए कि अब क्या स्विस बैंक में कालाधन जमा हो पाएगा!

सरकार ने स्विस बैंकों व ऐसी ही अन्य कई बैंकों से खातेदारों की सूचना साझा करने का अग्रीमेंट कर लिया है, मतलब अब स्विस बैंकों में भी 2 नम्बर की कमाई अब आगे से जमा नहीं कराई जा सकेगी!

कहने का मतलब सरकार ने कालेधन को पैदा होने के साधन और उन्हें छुपाने तथा कालेधन को सफ़ेद करने के सारे साधनों पर करारा वार किया है! करारा मतलब बहुत करारा!

फिर भी कुछ लोग तर्क देंगे कि जेल में क्यों नहीं डाला? क्या आपके कहने का ये मतलब है कि ऐसे करोड़ों लोगों को चाहे वो आम नागरिक हो या सरकारी मुलाजिम, उन्हें जेल में डालकर उन्हें सरकारी ख़र्चे खिलाना पिलाना चाहिए! कहाँ से लाएँगे इतनी बड़ी जेल और कहाँ से लाएँगे उनके स्वागत के लिए इतना राजस्व! ये तो सरकार द्वारा प्रायोजित जेल भरो आंदोलन हो गया! अर्थात ये बात ही पूर्ण अव्यवहारिक है! हाँ आगे के अपराधों के लिए ऐसा प्रावधान होना चाहिए और वो हुआ है!

बल्कि सरकार ने व्यापारियों से भी कहा कि कोई पिछला रिकॉर्ड चेक नहीं होगा, अब से ईमानदार हो जाओ! दूसरे सत्ता में आते ही मनमोहन सरकार के दबाव में आकर हस्ताक्षर करने वाले कोयला सचिव के बचाव में उतरी IAS एसोसिएशन ने भी सरकार से यही कहा कि अब तक का सब माफ़ करो, आगे से होगा तो फाँसी चढ़ा देना. सरकार ने उन्हें भी यही आश्वासन दिया कि अब सब ईमानदार हो जाओ, आगे से नहीं छोड़ेंगे!

उसके बाद भी आगे की तारीख से आदत से बाज़ न आए ऐसे 50 अफ़सरों की तो इस सरकार ने नौकरी ले ली! इस पैमाने पर नौकरशाहों की नौकरी इतिहास में पहले कभी नहीं ली गई है! नोटबंदी के दौरान पहली बार देश में चीफ़ सेक्रेटरी के समकक्ष व्यक्ति जेल के सलाखों के पीछे गया! यहाँ तक कि एक रिटायर IAS तो CBI जांच से भयभीत होकर आत्महत्या कर बैठे! अभी नौकरशाही में भय का ये आलम है! अगले चरण में सरकार CBI को एक लोकपाल का गठन कर उसके अधीन देने हेतु प्लानिंग में है ताकि बाद में CBI का राजनैतिक दुरुपयोग न हो! अभी तो मोदी जैसे लोकपाल के अधीन ही ये CBI कार्यरत है, देश में धुआंधार छापे पड़ रहे हैं!

ये कोई व्यक्तिगत नहीं बल्कि पूरे सिस्टम लेवल रिफार्म है. सरकारी, ग़ैरसरकारी सभी लोग इसकी जद में हैं. सब दो नम्बर वालों को इसका अनुभव हो रहा है… मीडिया वाले भी इसके लपेटे में हैं, इसीलिए हल्ला नहीं मच रहा है. इसका मतलब ये नहीं कि इतनी महत्वपूर्ण बात आप नज़र अन्दाज़ कर जाएँ! मीडिया नहीं बताती तो हमारा भी कुछ विवेक होना चाहिए.

ख़ैर… अब आप कहेंगे कि यहाँ नेताओं के भ्रष्टाचार व राजनैतिक पार्टी के चंदे की बात कहीं नहीं की… तो वो अगले भाग में….

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