NEWTON : अनबन यहीं सुलझाओ, घर की बात बाहर जाती है

Newton Movie

न्यूटन देखने के बाद यही सोचा था कि फ़िल्म के कथ्य के साथ मेरी लेखनी न्याय नहीं कर सकेगी. इसलिए ही इस अद्भुत फ़िल्म पर कलम चलाने से खुद को रोके रहा. फ़िल्म को भारत की ओर से ऑस्कर के लिए अधिकृत किया गया है. उसी सरकार की ओर से, जिसके यहां सत्तर प्रतिशत समर्थक मौजूद हैं. फिर मैं एक आवाज़ उठती देखता हूं. एक बेहतरीन फ़िल्म के विरोध में उठ रही आवाज़ें. अधिकांश वे आवाज़ें थीं जिन्होंने ‘न्यूटन’ का विरोध सिर्फ इसलिए कर दिया कि कुछ बड़े लेखकों ने उसे ‘देशविरोधी’ घोषित कर दिया. फिर ये देशविरोधी फ़िल्म ऑस्कर के लिए अधिकृत भी हो जाती है. तो जानें कि क्यों ‘न्यूटन’ देशविरोधी फ़िल्म नहीं है.

न्यूटन के सारे पात्र भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. हर पात्र खुद में एक ‘भारत’ है. नूतन कुमार उर्फ न्यूटन एक कर्तव्यनिष्ठ शासकीय कर्मचारी है, ईमानदार भारत. आत्मा सिंह ईमानदार फौजी है लेकिन सिस्टम की चक्की का एक कलपुर्जा है, विवश भारत. मलको दंडकारण्य की आदिवासी है लेकिन बदलाव लाने की ज़िद पर अड़ी है, जागता भारत. एक पुलिस अधिकारी सिस्टम की सड़ांध को जन्म देता है, भ्रष्ट भारत. लोकनाथ वरिष्ठ चुनाव अधिकारी है, सरकारीपन से बुरी तरह उकताया हुआ भारत.

दंडकारण्य के जंगलों में मतदान करवाने की दुश्वारियां क्या होती हैं, ये न्यूटन बखूबी बताती है. मतदान करवाने की जिद पर अड़े न्यूटन कुमार में मुझे वे ईमानदार अफसर याद आये जो भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध चट्टान बनकर खड़े हो जाते हैं. आत्मा सिंह जंगल में मतदान करवाने से हिचकता है क्योंकि उसकी टीम के पास नक्सलियों से लड़ने के लिए नाईट विजन और बुलेट प्रूफ जैकेट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं है. फ़िल्म में उसे घूसखोर फौजी नहीं दिखाया गया है.

कई लोग ये कह रहे कि बाहुबली को ऑस्कर में क्यो नहीं भेजा. उन मित्रों को तनिक पीछे ले जाता हूं. 2010 में स्टीवन स्पिलबर्ग की फ़िल्म ‘अवतार’ को ऑस्कर में भेजा गया लेकिन बाज़ी ‘हर्ट लॉकर’ ने मार दी. अवतार की कमाई के आगे हर्ट लॉकर पासंग भी नहीं थी लेकिन वो एक रियलस्टिक फ़िल्म थी और अवतार एक काल्पनिक कथा. बाहुबली भेजी जाती तो पहले राउंड में बाहर हो जाती.

फ़िल्म निर्देशक अमित मसूरकर ने एक अबूझ फ़िल्म बनाई है. इस अबूझ फ़िल्म को प्रशंसा तो खूब मिली लेकिन इसे ‘पढ़ा’ नहीं जा सका, इसका मलाल है कि फ़िल्म को स्तरीय और शास्त्रीय समीक्षाओं का अकाल पड़ गया. अमित मसूरकर की ये फ़िल्म एक समीक्षक को भरपूर ‘एस्थेटिक सेंस’ देती है लेकिन ज्यादातर समीक्षक इस नायाब फ़िल्म की सतही समीक्षा ही कर सके.

राष्ट्रवादियों से अपील

कोई भी राष्ट्र अपनी संस्कृति और कलाओं से स्पंदित होता है, पल्लवित होता है. जो देश अपनी कलाओं को भस्म कर देते हैं, वे तालिबान हो जाते हैं. इस देश मे ऐसे उदारहण भी हैं जब प्रधानमंत्री पर बनी फ़िल्म बैन होने के बाद खुद उन्होंने फिल्म के प्रदर्शन की राह प्रशस्त की थी. नक्सल समस्या कोई आज की नहीं है. सारी दुनिया हमारी ‘अंदरुनी बीमारी’ के बारे में जानती है. खुद सरकार की मंजूरी से ये फ़िल्म ऑस्कर में भेजी गई है. हम इसका समर्थन न करें तो विरोध भी न करें. घर से बाहर बात होने लगी है कि हम भारतीय अपने ही देशवासी की बनाई एक अद्भुत फ़िल्म को ‘देशविरोधी’ कह रहे हैं. अनबन यहीं सुलझाओ, घर की बात बाहर जाती है.

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