वाड्रा की मिसाल देकर अमित शाह के बेटे को भ्रष्टाचारी बताने की फूहड़ कोशिश

अखबारों और टीवी चैनलों से आगे बढ़कर खबरें अब न्यूज़ वेबसाइट तक आ गयी हैं. आने वाले समय में न्यूज़ के लिए तमाम वेबसाइट्स हुआ करेंगी. और ऐसे में खुद को एस्टेब्लिश करने की होड़ भी मचेगी. अंग्रेजी में तमाम न्यूज़ साइट्स पहले भी थीं. स्क्रॉल, क्विंट, वायर.

क्विंट शायद आपको याद हो, कुछ समय पहले ही लांच हुई. इसकी एडिटर बरखा दत्त हैं. लांच होने के बाद इसने आर्मी के एक जवान का इंटरव्यू प्रकाशित किया था. वो जवान एक सैन्य अधिकारी के सहायक के तौर पर काम करता था. इंटरव्यू के बाद उस जवान ने आत्महत्या कर ली थी.

हिंदी पाठको के विशाल बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए बहुत से मीडिया हाउस हिंदी में न्यूज़ वेबसाइट्स ला रहे हैं. पिछले दिनों जिसका नाम प्रमुखता से सामने आया है वो The Wire वेबसाइट है.

आज इसी वेबसाइट ने एक लेख प्रकाशित किया है. अमित शाह के बेटे जय शाह पर. आधार रॉबर्ट वाड्रा हैं. वायर का कहना है कि जिन आधार पर वाड्रा अपराधी ठहरा दिए गए, उसी आधार पर जय शाह क्यों नहीं.

जय शाह पर वेबसाइट ने ऐसा आरोप लगाया है कि उनके स्वामित्व की कंपनी जिसका टर्नओवर महज 50,000 था. मोदी सरकार के आने के बाद 2015 में उसके टर्नओवर में 16 हजार गुना वृद्धि हुई. उसे वाड्रा की तर्ज पर कंपनियों से अन-सिक्योर्ड लोन मिले. और जिस कंपनी ने जय शाह की कंपनी टेम्पल इंटरप्राइज़ेज़ को लोन दिया उसके प्रमोटर रिलायंस समूह के अधिकारी राज्य सभा सांसद परिमल नाथवानी के समधी हैं.

वाड्रा को DLF ने ऐसा ही लोन दिया था. मिस्टर वाड्रा को सरकारी जमीन एलॉट हुई थी डेवलप करने के लिए. लेकिन उनके पास रुपया नहीं था. वाड्रा ने DLF से लोन लिया जमीन सरकार से खरीदी और DLF को सौ गुना दाम में बेच दी.

जय शाह और उनके पिता एक बिजनेस फैमिली से आते हैं. मुंबई में उनका पुराना बिजनेस हैं PVC पाइप्स का और स्टॉक ब्रोकिंग का. जय शाह पढाई के बाद से ही बिजनेस में हैं. उनकी कंपनियों का टर्नओवर 100 करोड़ के ऊपर है.

वायर की पत्रकार रोहिणी जिन्होंने आर्टिकल लिखा है, फैक्ट्स को ट्विस्ट करने में मास्टर हैं. अपने आर्टिकल में वो लिखती हैं कि कंपनी को 2013 में 2014 में लॉस हुआ, कुछ हजार रुपयों का. कंपनी का टर्नओवर 2014 में पचास हजार था. और अचानक से मोदी सरकार के सत्ता में आते ही 80 करोड़ हो गया. गोल्डन टच ऑफ़ जय अमित शाह. 16 हजार गुना.

जो बातें वो तुरंत नहीं बताती, जानबूझकर आर्टिकल में कहीं और लिखती है. 2014 तक कंपनी की नेट वर्थ 19 लाख थी. कुछ हजार टर्नओवर वाली कंपनी, सवा दो लाख की कैपिटल वाली कंपनी की नेट वर्थ 19 लाख.

क्योंकि कंपनी 2004 में शुरू हुई थी. पहले दस साल उसके बिजनेस, प्रॉफिट-लॉस का रोहणी जानबूझकर जिक्र नहीं करतीं.

80 करोड़ के टर्नओवर के बाद भी कंपनी को सवा करोड़ का घाटा होता है, और कथित गोल्डन टच के बावजूद कंपनी 2016 में बंद हो जाती है.

कंपनी ने 2015 में कृषि प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट किया. घाटा हुआ, कंपनी बंद हुई.

रोहिणी अपने आर्टिकल में कहती हैं कि टेम्पल इंटरप्राइज़ेज़ को रिलायंस के एक अधिकारी के स्वामित्व वाली कंपनी ने 15 करोड़ का अन-सिक्योर्ड लोन दिया. इसके अलावा एक को-ऑपरेटिव बैंक ने 25 करोड़ का लोन दिया.

KIFS फाइनेंशियल सर्विसेस जिसने जय शाह की कम्पनी को लोन दिया, वो एक शेयर बाजार में पब्लिकली लिस्टेड कम्पनी है. एक NBFC है. जिसका कोई एक मालिक नहीं होता. जिसके बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर में ढेरों लोग होते हैं. उनमे से एक नाम राजेश कण्डवाला है. जिसे बड़ी खूबसूरती से रोहिणी ने अम्बानी की तरफ मोड़ दिया. मोदी – अमित शाह – अम्बानी रिश्ता.

NBFC का काम लोन देना भी होता है. रोहिणी जी, वाड्रा को भी ऐसा ही लोन मिलने का उदाहरण देती हैं. लेकिन ये अंतर नहीं बताती कि DLF एक रियल एस्टेट कंपनी है न कि लोन देने वाली कंपनी.

इसी तरह रोहिणी अपने आर्टिकल में जय शाह की एक दूसरी कंपनी के ऊपर उंगली उठा रही हैं और उसे सरकारी मिनी रत्न IREDA द्वारा मिले लोन को करप्शन के रूप में पेश कर रही हैं.

जबकि इस सरकारी कंपनी का काम रिन्यूएबल एनर्जी के लिए कंपनियों को लोन देना भी है और ये अब तक 37,000 करोड़ के लोन विभिन्न कंपनियों को दे चुकी है.

ऐसा ही झूठ को ऑपरेटिव बैंक द्वारा लोन देने का है. 25 करोड़ का लोन.

रोहिणी अपने आर्टिकल में जय शाह के वकील का अपने प्रश्नो के दिए उत्तरों का जिक्र करती हैं और उनके द्वारा दी गयी वार्निंग को धमकी के रूप में पेश करती हैं.

ये नहीं बताती कि जय शाह के वकील बता रहे हैं कि बैंक ने 7 करोड़ की सिक्योरिटी पर 25 करोड़ का लोन नहीं लेटर ऑफ़ क्रेडिट दिया था.

जब पेमेंट बैंक के जरिये होती हैं इसे लेटर ऑफ़ क्रेडिट कहते हैं. इसी के लिए बैंक ने सिक्योरिटी ली. 25 करोड़ मैक्सिमम अमाउंट था इस LoC का जिसका पूरा उपयोग नहीं हुआ.

एक्चुली पारदर्शिता आने के बाद से आप रजिस्ट्रार ऑफ़ कम्पनीज़ में जाकर किसी भी कंपनी की बैलेंस शीट, एनुअल रिपोर्ट, प्रॉफिट एन्ड लॉस रिपोर्ट देख सकते हैं.

ऐसी बहुत सी रिपोर्ट पब्लिक लिमिटेड कंपनी की अखबारों में आती हैं. क्योंकि उन्हें अपने सालाना, क्वार्टर्ली रिपोर्ट, प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट अखबारों में पब्लिश करने होते हैं.

ऐसे ही आप अगर किसी कंपनी के शेयर होल्डर रहे होंगे तो आपके पास एनुअल रिपोर्ट्स भी आयी होंगी.

क्या आप एनुअल रिपोर्ट पढ़कर उस कंपनी के स्कैम का पता लगा सकते हैं? आर्टिकल लिख पब्लिश करवा सकते हैं?

रोहिणी ने ऐसा ही किया है… बधाई तो बनती है वायर वेबसाइट को. वाकई पत्रकारिता को नया आयाम दिया इन्होने.

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  1. और इनसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है ।
    वाह वाह तो बनता है ।

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