निराशा ताबूत की आखिरी कील है, विरोधी चाहते हैं यह कील अपनी ताबूतों में आप खुद ठोकें

प्रशांत चंद्र महालनोबिस साहब बड़े सांख्यिकी विशेषज्ञ थे. 1954 में नेहरू जी ने महालनोबिस को भारत में बेरोजगारी की समस्या को हल करने में मदद करने के लिए आमंत्रित किया. यह वही साल था जब महालनोबिस जी को दूसरी पंचवर्षीय योजना का जिम्मा भी दिया गया.

महालनोबिस लग गए काम पर. वैसिली लेण्टेफ़ और जोआन रॉबिन्सन जैसे अर्थशास्त्रियों से भी मिले. काम जोर-शोर से शुरू हुआ. चूंकि नेहरू जी ‘सोशलिस्ट पैटर्न ऑफ सोसाइटी’ को विकसित करने को प्रतिबद्ध थे इसलिए भारी औद्योगीकरण के साथ-साथ राज्य-नियंत्रण को तरजीह दी गई. प्राइवेट सेक्टर को बेहद सीमित मौके मिलने थे.

बी. आर शिनॉय ‘एक्सपर्ट पैनल’ के एकमात्र असहमत सदस्य थे. उनका मानना था कि राज्य को इतनी ज़िम्मेदारी नहीं उठानी चाहिए, लेकिन उनकी असहमति का कारण यह नहीं था. उनकी असहमति का कारण इस द्वितीय योजना का अति-महत्त्वाकांक्षी होना था. अति-महत्त्वाकांक्षा से मतलब यह कि इतने ऊंचे लक्ष्य बना लेना जो हासिल ही न हो सके.

मिल्टन फ्रीडमैन ने तो महालनोबिस प्लान को अत्यधिक गणितीय बताते हुए भी आलोचना की और यहां तक कह दिया कि ‘मानवीय पूंजी’ निर्माण की तरफ इस योजना का ध्यान बिलकुल नहीं है.

बी. वी कृष्णमूर्ति ने भी इस योजना की बुराई इस आधार पर की कि इस योजना में शिक्षा पर व्यय ‘मूर्खतापूर्ण ढंग’ से कम है.

नए-नए आज़ाद देश को हम नवजात बालक मान लें और देश की कुल उम्र अगर हम दो सौ साल मान लें तो शायद आज़ाद मुल्क के प्रारंभिक बीस वर्षों को हमें इसकी शैशवावस्था मानना पड़ेगा. शैशवावस्था के बारे में ‘फ्रायड’ का एक कथन है, ‘व्यक्ति को जो कुछ बनना होता है वह शैशवावस्था में ही बन जाता है.’ मानता हूं फ्रायड पूरे सही नहीं थे, लेकिन फ्रायड पूरे गलत भी नहीं थे.

कुछ चीज़ें केवल और केवल शैशवावस्था में बेहतर होने पर ही फल देती हैं.

आपके पास इंतज़ार की सहूलियत नहीं होती श्रीमान. विश्व का पहला देश जहां 1952 में ही जनसंख्या नियंत्रण के लिए आधिकारिक कार्यक्रम चला वह भारत था. स्पष्ट है कि देश के गद्दीनशीनों को पता था कि यह समस्या है, लेकिन इस समस्या को लक्ष्य आधारित नहीं बनाया गया. जनता से उम्मीद की गई कि वह खुद जागृत होकर इसे सम्हाल लेगी, लेकिन कमाल देखिए कि जागृति के लिए जो शिक्षा पहली शर्त जैसी है, उसपर खर्च कम रखा गया. जाहिर सी बात है कि कार्यक्रम केवल इसलिए लागू हुआ कि प्रयास हों भले न हों, होते हुए लगने जरूर चाहिए.

सीधी बात है. हम सभी को लगता है कि हमारा देश वास्तव में बहुत बड़ी ताकत है, लेकिन सच यह कि सशक्त होने का भ्रम सबसे खुशफहम भ्रमों में से एक है. हम जितने सशक्त होने की क्षमता रखते हैं उसके दसवें हिस्से भी नहीं हैं, क्योंकि हमने, आपने सच कहें तो अभी तक देश को सशक्त बनाने के लिए जिस निष्ठुरतापूर्वक ईमानदारी की ज़रूरत थी, वह देखी ही नहीं है. सभी चीजों में लोकतंत्र, गरीबी, मजबूरी, कमी के नाम पर आपको सहूलियत दिलवाकर कोई नेता खुद को ‘बड़ा नेता’ बना लेता है, आपको अपना वोटबैंक बना लेता है और हम बनते भी हैं.

देश निश्चित तौर पर संक्रमण काल के दौर में है. मोदी युग के साथ समस्या इस बात की है कि इस पर हिंदुत्ववाद और विकासवाद दोनों पर खरा उतरने का बेतहाशा दबाव है. एक राह पकड़ने पर दूसरा नाराज़ होता है. प्रशंसक कम हो रहे हैं. पार्टी के भूतपूर्व बड़े नेता निष्ठुरतापूर्वक किनारे लगाए जा रहे हैं, उनका असंतोष, बड़बोलापन भी जोर-शोर से हाइलाइट किया जा रहा है.

कुल मिलाकर इस युग की एक नकारात्मक छवि बनाई जा रही है, ताकि लोग हिम्मत हारें और परिवर्तन कभी न हो सके. ‘स्टेटस को’ मेन्टेन रखो सब खुश रहेंगे वाली ‘स्ट्रेटेजी’ क्षणिक तुष्टि भले दे, लेकिन ‘Long Term Solution’ कतई नहीं है.

आपने किसी बुद्धिजीवी, किसी Demagog के कहने पर उम्मीद नहीं जताई थी और आप सदैव जानते भी थे कि यह राह उतनी आसान नहीं जितनी ऊपर से लगती है. यह जान कर भी आपने इस सरकार को चुना था. आपने चुना था क्योंकि आप ‘यथास्थिति’ से ऊब चुके थे. आपने चुना था क्योंकि आप ‘चलता है’ वाले एटिट्यूड से ऊब चुके थे.

उस उम्मीद से उम्मीद खत्म नहीं हुई है. उस उम्मीद को ज़िंदा रखिए, क्योंकि वह लौ भी किसी बिसात पर ही जलती है.

सबल बनिए, सकारात्मक रहिए. निराशा ताबूत की आखिरी कील है. विरोधी चाहते हैं यह कील उनके लिए अपनी ताबूतों में आप खुद ठोंकें.

जय हिंद

(समस्त तथ्य रामचंद्र गुहा के ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ से.)

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY