अलविदा कुंदन : बड़े शहरी से दिखने वाले लोगों में अभी भी ज़िंदा है कस्बा

फिल्मकार कुंदन शाह का दिल का दौरा पड़ने से कल दोपहर निधन हो गया. उनकी अंतिम फिल्म 2014 में आईपी से पीएम तक थी, पर हम सभी उन्हें उनकी बनाई दो फिल्में जाने भी दो यारो और कभी हाँ कभी ना के लिए हमेशा याद रखेंगे. ये दो फिल्में लंबे समय तक उनके नाम के साथ टिमटिमाएँगी.

1983 से लेकर 2014 के 31 साल के फिल्मी करियर में उन्होंने केवल आठ फिल्में और तीन सीरियल बनाये. विधु विनोद चोपड़ा की निर्देशक के रूप में बनी पहली फिल्म खामोश की स्क्रिप्ट लिखी और दूरदर्शन के लिए नुक्कड़, ये जो है जिन्दगी और वागले की दुनिया जैसे लाजवाब सीरियल बनाये. जाने भी दो यारो के बाद टीवी के सक्रिय रहे और फिर 1993 में कभी हाँ कभी ना के साथ फिल्मो में वापसी की.

इसके बाद के कुंदन शाह को न जाने तो ही बेहतर. इसके बाद आई उनकी फिल्में क्या कहना, हम तो मोहब्बत करेगा, दिल है तुम्हारा, एक से बढ़कर एक जैसी फिल्मों को देख कर किसे यकीन होगा कि इसी निर्देशक ने 1983 के साल को क्रिकेट का विश्वविजेता बनने के अलावा इस वजह से भी याद करने का मौका दिया कि इस साल क्लासिक कल्ट जाने भी दो यारो रिलीज हुई थी.

कुंदन शाह ने फिल्म इंस्टिट्यूट ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, पुणे से निर्देशन का कोर्स किया था और इस संस्थान से ये उनका प्रेम ही था कि विवादों से हमेशा दूर रहने वाले शाह ने इस संस्थान के छात्रों की हड़ताल को सपोर्ट करने के लिए जाने भी दो यारो के लिए मिले नेशनल अवार्ड को लौटाने की घोषणा की थी और अब उनके निधन पर ट्विटर के वीर लोगों द्वारा बेहद असंवेदनशील टिप्पणी की जा रही है और उसे बड़ी निर्ममता के साथ सोशल मीडिया पर साझा किया जा रहा है.

हम बची खुची संवेदनाओं को भी खत्म करते जा रहे हैं. किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने की बजाय छींटाकशी होना बेहद शर्मनाक है. विरोध की आड़ में हम धीरे धीरे सभी शिष्टाचार, नैतिकता और तर्क को भूलते जा रहे है. कुंदन शाह और जाने भी दो यारों से जुडे लोग वो हैं जिन्होंने हमें आज तक हंसने और सोचने का मौका दिया है.

जाने भी दो यारों के गुणी टीम का कप्तान भी चला गया है. ओमपुरी और रवि वासवानी पहले ही जा चुके हैं. इन सभी बड़े शहरी से दिखने वाले लोगों में अभी भी कस्बा जिन्दा है. ये कस्बाई जमीन के लोग इस एक एक करके हो रहे बिछोह को किस तरह देखते होंगे. संघर्ष के दिन और उन दिनों के साथी हमें बेहद अजीज होते है और विदा तो हमेशा से दुखदाई होती है. हर विदाई व्यक्तिगत आख्यानों की अनुगूंज से भरी होती हैं.

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