यह आत्महत्या सरकारी छात्र कल्याणकारी और ऐज्युकेशन लोन प्रणाली की है

विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) के अनुसार पूरी दुनिया में एक साल में लगभग आठ लाख लोग आत्महत्या करके मर रहे हैं. यानि हर चालीस सेकण्ड़ में एक व्यक्ति दुनिया में कहीं न कहीं आत्महत्या करके मर रहा है. जबकि आत्महत्या की कोशिश करने वालों की संख्या मरने वालों से बीस गुना अधिक, यानि एक करोड़ सांठ लाख के करीब होती है. यह भी एक आश्चर्य जनक सत्य है कि आत्महत्या से मरने वालों में सर्वाधिक लोग 15 वर्ष की आयु से लेकर 29 वर्ष की उम्र के पाये गए हैं. दुनिया में एक साल में जितने लोग मरते हैं उनमें 1.4% लोग सुसाईड़ करके मर रहे हैं. आज के समय में आत्महत्या उन 17 बड़े कारणों में गिनी जाने लगी है, जिनसे लोग अन्य बीमारियों से मर रहे हैं.

आत्महत्या एक मानसिक विकृति का प्रतिफल है. आत्महत्या करने वालों में सबसे पहले मेन्टल डिप्रेशन होता है. लम्बे समय तक डिप्रेशन के बाद मानसिक उदिग्नता इतनी प्रखर होने लगती है कि पीड़ित को अपने भविष्य में कोई उम्मीद नहीं बचती नजर आती, और हड़बड़ में यह कमजोर व्यक्ति अपनी जीवन लीला समाप्त करने का निर्णय ले लेता है. पूरी दुनिया में समाजशास्त्रियों ने आत्महत्याओं के कारण और उनकी रोक थाम के तरीकों पर बहुत शोध कार्य किया है. पर आत्महत्याओं की संख्या में प्रति दशक निरन्तर वृद्धि होती जा रही है.

विश्व स्वास्थ संगठन के आंकड़ों को अगर सही माना जाए तो हमारे भारत वर्ष में इस समय 5 करोड़ 67 लाख के लगभग लोग ‘डिप्रेशन’ से पीड़ित हैं. इन लोगों में एक करोड़ से अधिक लोगों में “सुसाईड़ल टेन्ड़ेन्सी” के लक्षण मौजूद हैं. WHO ने अभी 2017७ में एक गाईड़ लाईन की पुस्तिका जारी की है इसके अनुसार मीड़िया की पहल प्रचार करने पर आत्महत्याओं पर अंकुश लगाया जा सकता है.

पर हमारे भारत में होनहार,पढ़े-लिखे, नौजवान जब गरीबी, बीमारी से परेशान होकर आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं, तो यह हमारी सामाजिक, पारिवारिक और राष्ट्रीय व्यवस्था के असफल होने का कष्टप्रद संकेत हैं. यह कैसी विडम्बना है कि आज़ादी के 70 साल बाद जिस देश का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सभी अपने विद्यार्थी जीवन में गरीबी की “लू “ से पीड़ित रहे हों, उस देश में आज का एक होनहार नौजवान छात्र गरीबी और बीमारी से हतोत्साहित होकर आत्महत्या का रास्ता चुन रहा है.

इन्दौर स्थित कृषि महाविद्यालय के अन्तिम वर्ष में अध्ययन कर रहा छात्र ‘शुभम नाड़ियाल’ अपने पेट दर्द और गरीबी से परेशान होकर फांसी लगाकर मर गया. यह बेहद चौंकाने वाली दुर्घटना है. इसे सामान्य आत्महत्या मानकर कानूनी कार्यवाही करके, अनदेखा नहीं करना चाहिये. कितने भीषण दुख की बात है कि लड़के का पिता साधारण सा मजदूर है. उसके लड़के का इलाज इस कारण नहीं हो सका कि वह एक गरीब मजदूर का बेटा था. कहाँ गए मजदूरों के नेता, कहाँ गए होमी दाजी के कामरेड़, क्या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, एनएसयूआई के नेता भी मौसमी मेढ़कों की जमात बनकर रह गये है, जो सिर्फ अपने चुनावों के दिनों में टर्र टर्र करते हैं.

क्या कोई उत्तर देगा कि जब शुभम नाड़ियाल होस्टल में रहता था तो उसकी बीमारी का पता होस्टल बार्डन और कालेज के डीन को मालूम क्यों नहीं था? अगर उन्हें शुभम की बीमारी का पता था तो उन्होंने उसका कहॉ पर और कैसा इलाज कराया.

दूसरे विश्व विद्यालयों की तरह, कृषि विवि भी लम्बी चौडी फीस, हर विद्यार्थी से छात्र कल्याण निधि के रूप में उनके उत्तम स्वास्थ के लिये लेता है. क्या विवि की इस धनराशि का उपयोग छात्र शुभम के इलाज के लिये किया गया? यदि नहीं तो क्यों नहीं?

मध्यप्रदेश सरकार और विश्व विद्यालय अनुदान आयोग की सुस्पष्ट योजनाए हैं, कि गरीब छात्रों को स्नातक और स्नात्कोतर पढ़ाई के लिए साढ़े चार लाख रूपयों का “ऐज्युकेशन लोन” किसी भी बैंक द्वारा बिना किसी कोलेटरल गारण्टी के दिया जाता है. इस लोन के ब्याज का भुगतान राज्य सरकार करती है. इस लोन की किश्ते डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी या व्यवसाय करने के एक साल बाद से शुरू होती है.

जब शासन ने इतनी सुविधा गरीब छात्रों को दे रखी हैं तो फिर ऐसे कौन से कारण थे कि, छात्र “शुभम” को गरीबी और बीमारी की पीड़ा से परेशान होकर आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है. यह आत्महत्या निरीह शुभम नाड़ियाल ने नहीं की है, यह हमारी उच्चशिक्षा की घिनौनी नीतियों के कारण, दुखी पीड़ित छात्र का नीतिगत योजनाओं की विफलता से जानबूझ कर किया गया “कोल्ड ब्लडेड मर्डर“ है.

मैं इसे आत्महत्या नहीं “हत्या” की संज्ञा दूंगा. इसके लिये कोई अगर दोषी है तो होस्टल बार्डन, डीन और कृषि वि०वि० दोषी है जो कि छात्र कल्याण निधि के करोड़ों रूपयों का उपयोग कुलपतियों की विदेश यात्राओं में खर्च करता रहता है, और गरीब छात्र बीमारी से परेशान होकर पेड़ से लटककर फांसी लगा रहे हैं.

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