कांग्रेस : वहां से यहां तक

हालाँकि कांग्रेस के गठन के लिए एक अंग्रेज ए. ओ. ह्यूम का नाम लिया जाता है मगर इस संगठन की स्थापना में कई भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. इनमें दादा भाई नौरोजी, डब्ल्यू. सी. बनर्जी और डी. ई. वाचा व गोविंद रानाडे के नाम प्रमुख थे. कांग्रेस की स्थापना एक पवित्र उद्देश्य और अंग्रेजों की दमनकारी नीति के खिलाफ की गई थी, इसमें कोई शक नहीं.

धीरे-धीरे कांग्रेस का अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध चलने वाला आंदोलन, पूर्ण स्वराज की मांग में बदल गया और देश भर के अनेक प्रबुद्ध लोग इस से जुड़ते चले गए जैसे सरदार पटेल, मोतीलाल नेहरू, सरोजनी नायडू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जे. बी. कृपलानी, मोरारजी देसाई, जगजीवनराम और कामराज आदि.

इनमें से सिर्फ मोतीलाल नेहरू ये समझने में कामयाब रहे कि अंग्रेजों के लिए भारत में और अधिक समय राज चलाना घाटे का सौदा है इसलिए अब उन्हें जाना ही है. और ये भी कि गांधी अपनी लंगोटी, बकरी और कुटिया के कारण महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके हैं और हम भारतीय सन्यासी टाइप त्याग-तपस्या वाले लोगों को बहुत मानते हैं इसलिए अंततः उन्हीं का निर्णय माना जायेगा. इसी लिए मोतीलाल नेहरू ने बेटे जवाहर लाल को गाँधी के पीछे चिपका दिया.

नेहरू पूर्ण चाटुकारिता, रणनीति और साम दाम दंड भेद से अपने से अधिक पढ़े लिखे और योग्य लोगों को पछाड़ कर आज़ाद हिंदुस्तान की सत्ता पर काबिज होने में सफल रहे.

सामूहिक निर्णय और लोकतंत्र ख़त्म

कांग्रेस और आज़ाद हिंदुस्तान के नेहरू युग में पार्टी और राष्ट्रीय हितों में सामूहिक निर्णय और लोकतंत्र फिर भी थोड़ा बहुत बरक़रार था. सरकार चलने में नेहरू को पूर्ण निरंकुशता हासिल नहीं थी. महावीर त्यागी, कामराज और मोरारजी देसाई जैसे लोग नेहरू से सीधे टकराने का साहस रखते थे.

इंदिरा गांधी के आते-आते कांग्रेस पूरी तरह एक व्यक्ति की जेब की पार्टी बन गई थी. कांगेस के मूल स्तम्भों को पिछवाड़े पर लात मरकर बाहर फेंक दिया गया और सत्ता पर इंदिरा और उसके चाटुकारों का पूर्ण कब्ज़ा हो गया.

कांग्रेस पार्टी में जब-जब नेहरू परिवार से बाहर के लोग प्रधानमंत्री बने उन्हें कभी भी वो सम्मान नहीं मिला. लालबहादुर शास्त्री को तो वो मकान भी अपमानित होकर खाली करना पड़ा था जिसमे नेहरू रहते थे.

शास्त्री जी की संदिग्ध राजनैतिक मृत्यु के बाद चौकड़ी विशेष ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया.

खानदान की लिमिटेड कंपनी बन गई कांग्रेस

इंदिरा हद दर्जे की घमंडी, महत्वाकांक्षी और तानाशाह प्रवृति की महिला थी. वास्तव में यही वो काल था जब कांग्रेस नेहरू खानदान की लिमिटेड कंपनी बन गई. पार्टी में “इंदिरा इस इण्डिया” कहने वाले बरुआ जैसे चाटुकारों की जगह थी, बाकी सब अपमानित होकर बाहर कर दिए गए.

कहते हैं कि व्यक्ति जब किसी से नहीं हारता तो औलाद से हारता है. उन्ही दिनों संजय गाँधी की यूथ कांग्रेस का जन्म हुआ. वो काल मुझे अच्छी तरह याद हैं. भारत के शहर-शहर और गांव-गाँव के लफंगे, ऐयाश और निरंकुश लड़के यूथ कांग्रेस में भर्ती होकर चंदा वसूली और ऐयाशी करने लगे थे.

यूथ कांग्रेस के सम्मलेन में जाने वाली गाड़ी में शराब की बोतलें और कंडोम मिलते थे. गाड़ी के रास्ते में आने वाले स्टेशनों को लूट लिया जाता था. मैंने खुद उस गुंडागर्दी और चौथ वसूली को देखा हैं. उसी यूथ कांग्रेस के लफंगों ने बाद में पार्टी में स्थान हासिल किया.

भिंडरवाला को पाल पोस कर पंजाब में आतंक मचवाना, ऑपरेशन ब्लूस्टार के द्वारा एक जिंदादिल कौम को अपमानित करना, आवश्यक वस्तु जैसे साबुन और वनस्पति तेल तक के लिए राशन की लम्बी लाइने लगवाना, भयानक महंगाई, जगह जगह दंगे और भारतीय लोकतंत्र का काला पन्ना इमरजेंसी इंदिरा की उपलब्धियां रहीं.

जयप्रकाश नारायण, अटलबिहारी बाजपेई, चौधरी चरण सिंह, चंद्रशेखर और मोरारजी देसाई जैसे बड़े कद के नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया. लोकतंत्र की हत्या हो गई.

सुलगते देश में मिस्टर क्लीन का शपथग्रहण

भारत ही नहीं शायद दुनिया के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि माँ या कहो कि पूर्व प्रधानमंत्री की लाश घर में पड़ी थी, देश सिक्खों की हत्याओं और आगजनी से चीख रहा था और बेटे राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिलवाई जा रही थी. हाय री सत्ता.

आंगन में पड़ी थी माँ की लहूलुहान लाश और राजीव गाँधी को प्रधानमंत्री की शपथ दिलवा दी गई तो इसमें मैं राजीव गाँधी का दोष नहीं मानता. राजीव गाँधी तो राहुल से भी अधिक राजनीति से विरक्त इंसान थे. चाटुकार अपने नंबर बढ़ाने और असुरक्षा की भावना से इतने ग्रस्त थे कि उन्होंने देर करना उचित नहीं समझा. सिक्खों को गले में टायर बांध कर जलाया जा रहा था, देश जल रहा था और मिस्टर क्लीन शपथ ले रहे थे.

सब पर हावी इटली की मैडम

खैर, हम बात कर रहे थे राजीव के शासन काल की. संजय की चांडाल चौकड़ी राजीव की सरकार ने पैठ बना चुकी थी किन्तु सब पर हावी थी इटली की मैडम. क्वात्रोची का ये स्वर्णकाल था. मंत्रालय और सरकार में उसकी इतनी धाक थी कि उसने एक मंत्री को एक दिन में पद से बर्खास्त करवा दिया था.

सोनिया गाँधी की दो बहनें और दोनों बहनोई भारत में आकर जम गए. उन्हें कई प्रकार के ठेके उलटे सीधे दामों पर दिए गए और ये ठेके भी आश्चर्जनक थे. राजीव के एक साढ़ू को अर्ध सैनिक बालों को ट्रेनिंग देने का कॉन्ट्रैक्ट मिला था. दूसरे को बुलेट प्रूफ वाहन बनाने का. दोनों को इन कामो का कोई तुजुर्बा भी नहीं था.

इसी काल में बोफोर्स हुआ और जब घोटाला खुला तो क्वात्रोची को माल लेकर फरार करवा दिया. बाद में उसके सील किये बैंक खाते भी खुलवा दिए गए थे. इसी समय भारत के एंटीक पीस बक्से में भर भर कर विदेश के बाजारों में बेच दिए थे.

सोनिया गाँधी ने मेनका का कांटा पहले ही निकाल दिया था. उन्होंने धीरे-धीरे नेहरू वंश की सभी संथाओं पर कब्ज़ा जमा लिया. एक विदेशी महिला दोनों हाथों से अपने खानदान के साथ मिलकर देश का दोहन कर रही थी और खानदान के चाटुकार छीछड़े खाकर खुश थे.

राजीव का शासन

यदि राजीव गाँधी का दोष की चर्चा नहीं की गई तो ये वर्णन अधूरा रह जायेगा. राजीव गांधी एक अनिच्छुक राजनेता थे ये मैं पहले ही बता चुका हूँ. उनके शासन काल में सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण सोनिया के दोस्त क्वात्रोची, चाटुकारों और संजय की ऐय्याश चौकड़ी का रहता था.

एक मुस्लिम महिला शाह बानो ने तलाक के बाद अपने अधिकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी. जब कोर्ट ने आदेश दिया कि इस बेसहारा महिला को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए तो कांग्रेस की तुष्टीकरण चांडाल चौकड़ी ने राजीव गाँधी को समझाया कि यदि इस बुढ़िया को दो सौ-चार सौ का गुजरा भत्ता मिल गया तो मुस्लिम वोट गई समझो.

मिस्टर क्लीन ने एक असहाय, अबला, निराश्रय, गरीब महिला से डरकर बाकायदा लोकसभा में कानून पास कराया और उसके मुँह का निवाला छीन लिया. ये कांग्रेस के इतिहास का एक काला पन्ना था.

दूसरा मूर्खतापूर्ण निर्णय जिसने राजीव गाँधी की जान ले ली. भारत के राज्य तमिलनाडु मूल के तमिलों का जब श्रीलंका में उत्पीड़न होता तो वे भारत की तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखते और श्रीलंका सरकार अमेरिका से गुहार लगती कि मुझे भारत से बचाओ.

राजीव गाँधी ने लिट्टे के गढ़ में अपने सैनिक भेजकर न केवल अनेक निर्दोष भारतीय जवानो को मौत के मुँह में धकेल दिया बल्कि अकारण लिट्टे से टकराकर अपने जीवन की रक्षा भी नहीं कर पाए. इस तरह इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी दोनों अपने गलत निर्णयों की भेंट चढ़ गए जिसे कोंग्रेसी शहीद होना कहते हैं.

सैम पित्रोदा जैसा धूर्त व्यापारी भारत को इक्कीसवीं सदी में ले जाने के लिए विदेश से कंप्यूटर से चलने वाली काल्पनिक गाड़ी लाया और सरकार का अरबों का बजट निगल गया. चारों तरफ लूट मची थी. जिसके हाथ जो लगा, लेकर सटक गया. राजीव गाँधी का शासन और उसके घोटाले देश को मीलों पीछे ले गए थे.

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