यह है करवा चौथ की सच्ची कहानी

“हाय जे का भयौ… नल आते यी बिजली चली गयी… ना सुन रये!… नेंक वा मारे बिजली बारे ए फोन करौ बिजली छोड़वे कू… फेसबुक में घुस गए दीखें… नेंक जबाब उ ना एँ म्हों में…… जल्दी कर देओ नेंक फोन…“

सुबह जल्दी उठ टीवी के सामने कपालभाति करते हुये न्यूज़ देखने का अद्भुत आनंद हमारी मालकिन को पल भर नहीं भाता… रिरियाती आवाज़ कर्कश स्वर में बदले उससे पहले ही बिजली की गति से मैं उठ पड़ा… लेकिन बिजली आ गयी थी…

“नेंक रसोई की टंकी कौ बाल खोल दीयों… बड़ी टंकी कौ बाल जब तक बंद कर देओ…
मैं जल्दी सै स्टोर की सफाई करकै अभी नहा लऊं… देखियो टंकी भर गयी होगी बाहर नाली में पानी आरौ ए ऊपर कौ… अब वा बड़ी वारी टंकी ए चालू कर देओ…
हाय में कपड़ा तौ ला ना पायी… नेंक वा मेज पै रख आयी ऊं… दूर सै पकड़ कै बाथरूम में टांग आऔ”

मैं दांतों को भींच, गुस्से को रोक, टीवी न्यूज़ कानों से देखते हुये सोच रहा था आज इसे हो क्या गया… साथ ही आदेशों का पालन करते हुये सारे काम करता जा रहा था… आदेश अभी जारी थे…

“मोयै तौ देर है जावैगी, चाय तुमी बना लेओ… चायदान पन्नी सै पकड़ कै लियों…”

अब तो गुस्सा वाकई में फटने को था… तभी…

“मेरौ तौ व्रत ए आज… बस्स एक गिलास बनइयो… अकेले अपने कू…”

ध्यान आया आज तो करवा चौथ है, वो ‘व्रत…’, ‘अकेले अपने कू…’ शब्द मानो बर्फ के गोले की तरह गुस्से से गरम होते दिमाग पर वज़न के साथ गिर कर चिपक गए थे… सारा गुस्सा ना जाने कहाँ हवा हो गया था और दिमाग बड़ी अजीब तरह सुन्न सा हो गया…

क्षण भर में करवा चौथ का पूरे का पूरा दर्शन दिमाग पर छा गया था… मन में तमाम कल्पना और विचारों का सागर उफान मार कर लगभग डराने सा लगा… ओह ये करवा चौथ इसी लिए तो है ही… हम लोगों को अकेला छोड़ कर जाने के लिए तो है ही… ओह कितनी भयावह सचाई से रूबरू करा रहे थे वो शब्द…

‘बस्स एक गिलास… अकेले अपने कू ….!!!’

सुन्न से हुये मस्तिष्क में सवाल कौंध रहे थे – ‘आज तो मैं अपने लिए क्या पूरे घर और मेहमानों के लिए भी बना सकता हूँ… लेकिन तू तो मुझे अकेला चाय बनाने के लिए नहीं, अकेले-अकेले चाय पीने के लिए छोड़ कर जाने के लिए व्रत रख रही है ना… कभी सोचा भी है कि बिना तेरे कलेश और गुस्से के आज तक चाय पी है, सो फिर अकेला ही चाय पी लूँगा?’

‘क्यों नहीं चैन लेने देती… क्यों करती है दुकान पर फोन…’
“अब घर आनौ ए कै नाएँ… कब खवैगौ जे खानौ“
‘तू एक दिन मेरा खून पिये बिना खाना खा नहीं सकती… और मुझे यूँ ही शांति से अकेले खाने को छोड़ जाने को रखती है ना ये व्रत…’

‘वो जाड़े की रात जब बच्चे और मैं एक रज़ाई ओढ़ कर सोते हैं… और तू सुबह तक उस पर ना जाने कब कंबल डाल-डाल कर झिड़की खाती है… सबकी फटकार खा-खा कर ही सही, बुरी आदत तो तूने डाल ही दी है… और तेरा व्रत ऐसे समय के लिए अकेला छोड़ के जाने के लिए है जब हाथों से दूसरे कंबल को तो क्या एक रजाई को सम्हालना मुश्किल होगा…’

उस दिन बाज़ार में गर्मी से परेशान हो झुँझला पड़ा था ‘अब जे मोय संग ला कै परेशान मत करै कर…. लालू ए लियाय कर’.

तब इस परम कलेशयाई ने कैसा मासूम सा चेहरा बना कर कहा था “गाँव में विहाय कै एक जेई तौ सुख मिलौ ए तुमारे संग बाजार आवे कौ… तुम जाऊऐ खतम करौ तौ कर देओ”.

इसके इस डायलौग से पेट में रई सी चल गयी थी, पछतावे से भर उठा था अपने झुंझलाने पर…. लेकिन ये नहीं सोच रही कि जब ये सुहागिन ही चली जाएगी तब मैं अकेला बाज़ार आ भी जाऊंगा क्या?

इन्हीं भयावह कल्पनाओं के बीच चाय का पानी ना जाने कब जल कर सूख गया था… उधर मालकिन स्नान कर ठाकुर जी को जगाने की घंटरिया बजाते हुये चीख उठी… “हाय जे मोबाइल लै गए दीखें… फिर घुस गए सबेरे ई सबेरे फेसबुक की लुगाईयन में…”.

हड़बड़ा कर बर्नर बंद कर चाय बिना बनाए ही टीवी के सामने आकर फिर बैठ गया.

टीवी पर एंकर बता रही थी कि किस प्रकार अब लड़के भी अपनी पत्नियों के साथ व्रत रखते हैं… कुछ लड़कों की बाइट भी आ रही थी…

और इधर आँखों के रास्ते गालों पर आई नमी को मालकिन से छुपा, झेंप कर पोंछते हुये मैं सोच रहा था…

‘कितने पागल हैं ये लड़के… पट्ठे उसको अकेली छोड़ने के लिए व्रत रख रहे हैं… नालायक ये नहीं सोच रहे कि हम पुरुष लोग तो जैसे हैं वैसे, अपना अकेलापन बहू-बेटों, अड़ोसी-पड़ोसी, टीवी-फेसबुक, बाहर-भीतर रह कर जैसे हो वैसे काट भी लेंगे… लेकिन इनको किसके लिए अकेला छोड़ कर जाओगे…‘

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