जानना ज़रूरी कि कौन थे, और हैं हमारे खलनायक!

क्या वामपंथियों ने भारत का इतिहास एक तरफ़ा और गलत लिखा है?… जी हाँ.
क्या मुगलों और अंग्रेजों का अतिरिक्त महिमामंडन किया गया है, जबकि मुग़ल बर्बर व अमानवीय और अंग्रेज क्रूर व कपटी शासक थे?… जी हाँ.
क्या स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी आधा-अधूरा इतिहास लेखन हुआ?…जी हाँ.
क्या इस दौरान भी एक व्यक्ति और एक परिवार विशेष को बड़ी चतुराई से इतिहास के केंद्र में स्थापित कर दिया गया?… जी हाँ.
क्या इतिहास का निष्पक्ष और नि:स्वार्थ भाव से पुनर्लेखन किया जाना चाहिए?… जी हाँ.

देश की बहुसंख्यक आबादी उपरोक्त सवालों के जवाब “जी हाँ” में ही देगी. दुनिया की प्राचीनतम सनातन सभ्यता को मुग़ल काल के बाद से ही क्यों सीमित कर दिया गया, वो इसके कारणों को भी जानती है. साथ ही वो अपने देश के इतिहास के सच को जानने के लिए बेकरार भी है.

ऐसे में आजकल कई विद्वान् मित्र उन महान व्यक्तियों के व्यक्तित्व के बारे में खूब लिख रहे हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानियों के लिए अदम्य साहस और वीरता का परिचय दिया था और अपने समय के महानायक थे. मगर इतिहास में इन महापुरुषों को षड्यंत्रपूर्वक जानबूझ कर उचित स्थान नहीं दिया गया.

कई तो ऐसे हैं जिनके नाम भी कोई नहीं जानता. इनके बारे में खोज-खोज कर लिखा जा रहा है जिसे खूब पढ़ा और बेहद पसंद भी किया जा रहा है. ऐसे ऐतिहासिक घटनाक्रम को बड़े चाव से उत्सुकतापूर्वक पढ़ा जाता है, जिनका जिक्र भी इतिहास में नहीं आता, जबकि वो देशप्रेम की भावना से भरे हुए हैं और त्याग-बलिदान की अनूठी मिसाल हैं. ये सब बातें नई पीढ़ी को रोमांचित करती है और उद्वेलित व प्रोत्साहित भी.

मगर एक बात हम ना तो जानना चाह रहे हैं, ना ही समझना और ना ही कोई इस पर लिख रहा है. और वो है उन खलनायकों के नाम और उनके कारनामे, जिनके कारण हम गुलाम हुए और रहे.

क्या कारण था जो मुट्ठीभर मुग़लों और अंग्रेजों ने बाहर से आकर हम पर हुकूमत की? क्या कारण रहा कि चन्द्रगुप्त, विक्रमादित्य से लेकर महाराणा प्रताप और शिवाजी व बाजीराव जैसे शूरवीर और दुनिया के महानतम राजनीतिक चिंतक चाणक्य की भूमि पर कोई बाहरी आकर कब्ज़ा कर गया?

इन सवालों के जवाब जानना और समझना आज ज्यादा जरूरी है. इसके बारे में बात करना चर्चा करना अधिक प्रासंगिक है. क्योंकि दुर्भाग्यवश इन दिनों जयचंदों की संख्या तेजी से बढ़ी है और ये पहले की अपेक्षा अधिक शातिर, स्वार्थी और संगठित हुए हैं.

चुनौती इस बात की है कि इन्होंने कई नकाब पहन रखे हैं. आज इन बहुरूपियों को पहचानना देशवाशियों के लिए अति आवश्यक हो गया है. अगर हम अँधेरे भविष्य से बचना चाहते हैं तो हमें अपनी कमज़ोर कड़ी को मज़बूत करना होगा और अवगुणों पर कड़ा प्रहार करना होगा, वो भी जल्द, क्योंकि इतिहास किसी के लिए इन्तज़ार नहीं करता.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY