जिस देश में बहुत ज़्यादा न्यूज़ चैनल हों वहाँ समाचार मत देखो, सोनी पे सूर्यवंशम देख लो

मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार Arthur Hailey ने अपने उपन्यास Evening News में लिखा है कि तब जबकि शाम को सिर्फ 15 मिनट का एक न्यूज़ बुलेटिन प्रसारित होता था, समाचार सम्पादक को सिर्फ 15 मिनट में दुनिया जहान की खबरें सुनानी होती थी… तब स्थिति कुछ ऐसी थी मानो you are trying to put 10 pounds of shit into an 8 pound bag… it keeps falling out…

तुलसी ने लिख दिया कि ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ई सब ताड़न के अधिकारी… बड़े खुशनसीब थे तुलसी क्योंकि उस जमाने में 24×7 न्यूज़ चैनल नहीं थे, अखबार नहीं थे, सोशल मीडिया नहीं था…

नहीं तो तुलसी की तो खाल उतार लेती पब्लिक. तुलसी पे politically correct होने का कोई दबाव नहीं था. जो चाहते लिख सकते थे. आज होते तो भैन मायावती जी, PETA वाली भैन मेनका गांधी जी, और बड़ी बिंदी गैंग की भोत सारी भैने तुलसी दास जी के पीछे बेलन ले के पड़ जाती.

हमारे हियाँ ऊपी में भी बहुत से लोक कवि हुए हैं. उनकी लोकोक्तियाँ भी भोत फेमस हैं…एक श्रीमान जी ने लिखा है कि – भाय, भतीजा, भांजा, भाट, भांड, भुइहार… तुलसी छहों भकार से, सदा रहो हुसियार… अब ये सचमुच तुलसी ने लिखा है या उनके नाम पे कोई और लिख गया पता नहीं, पर आज लिखा होता तो जातिवादी घोषित हो जाते.

इसी तरह एक और कोई लोक कवि हुए हैं जिन्होंने लिखा है कि जिस गाँव में भोत जादा मस मने मच्छर, मूस मने चूहे, मास्टर, और कोई दो और ‘म’ जिनका नाम मैं भूल गया हूँ (पूर्वांचल के कोई मित्र अवश्य जानते होंगे ये कहावत, वो याद दिला देंगे), सो जिस गाँव में ये 5 चीज़ ज़्यादा हों वहाँ रिश्तेदारी नहीं करनी चाहिए.

हमारे एक ताऊ जी थे, जिनने मुझे ये कहावत सुनाई थी, सो उनसे मैंने पूछा कि बाकी सब तो ठीक है पर गाँव में ज़्यादा मास्टर होने का क्या नुकसान है… सो उन्ने बताया कि इन सरकारी मास्टरों को कोई काम धाम तो होता नहीं, सो दिन भर गाँव में इसको उसको लड़ाते फिरते हैं…

कल एक न्यूज़ चैनल में सुना कि BHU में फिर किसी लड़की की सरेआम, क्लास में घुस के, सबके बीच इज्ज़त लूट ली गयी. पूरी खबर खोजी तो पता चला कि लड़की-लड़के में कोई इश्क मुश्क का चक्कर था.

फिर कालान्तर में उसने उस लड़के को घास डालना बंद कर दी और किसी और को घास खिलाना शुरू कर दी. सो प्रतिशोध की आग में जलते, घास के लिए छछाये लड़के ने किलास में घुस के, लड़की की चुटिया पकड़ के, मारा दुई पड़ाका… न्यूज़ चैनल ने खबर लगाई कि BHU में सरेआम लड़की की इज्ज़त लूट ली गयी.

उधर हिन्दू अखबार ने अपनी एक पत्रकार वेदिका चौबे के हवाले से छाप दिया कि मुंबई में एलफिंसटन रोड रेलवे स्टेशन में मची भगदड़ में एक मरती हुई औरत के साथ एक लड़के ने छेड़छाड़ की कोशिश की…

पत्रकार महोदया ने आरोप के प्रमाण के तौर पर ऐसी फोटो लगाई जिसमें एक लड़का एक महिला की तरफ हाथ बढ़ा रहा है… बाद में पता चला कि दरअसल लड़का लाशों और घायलों से दबी एक महिला को निकालने की कोशिश कर रहा था.

बाद में The Hindu ने अपनी पत्रकार पत्रकार वेदिका चौबे की इस झूठी खबर के लिए खेद प्रकट किया और अपने सभी portals से वो खबर हटा ली, पर तब तक जो नुकसान होना था, हो चुका था और Independent जैसे कई विदेशी अखबारों ने वो खबर ज्यों की त्यों छाप दी.

कुल मिला के ये पिक्चर पेंट की गयी कि हिन्दुस्तान महिलाओं के लिए बेहद खतरनाक जगह है जहां मरती हुई औरतों के साथ भी यहाँ के मर्द छेड़छाड़ करने से बाज़ नहीं आते, या जहां क्लास में घुस के, पूरी क्लास के सामने BHU जैसी यूनिवर्सिटी में दिन दहाड़े बलात्कार होते हैं.

आज जबकि सैकड़ों नहीं हज़ारों 24X7 न्यूज़ चैनल्स हैं, जिन्हें दिन रात खबर दिखानी है, और खबर कोई है नहीं, तो आखिर क्या दिखायें. कुछ नहीं तो यही सही… BHU में दिनदहाड़े बलात्कार और मुंबई में मरती हुई औरत से बलात्कार की कोशिश…

आज की समस्या ये है कि there is hardly any shit but you have to paint it to a 10 pound bag… जिस देश में बहुत ज़्यादा न्यूज़ चैनल हो वहाँ टीवी नहीं देखना चाहिए… सोनी पे सूर्यवंशम देख लो.

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