गुजर जा अक्ल से आगे कि ये नूर, चराग़े-राह है मंज़िल नहीं है

Making India Geetmala Laila Majnu
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आज से करीब चार हज़ार साल पहले मध्य-पूर्व में एक पैगंबर हुए, नाम था इब्राहीम. उनका किस्सा भी भक्त प्रहलाद की तरह ही है. प्रहलाद की तरह इब्राहीम को भी उस समय के ज़ालिम बादशाह नमरूद ने आग में डालने का हुक्म दिया था.

इब्राहीम जब आग में फेंके जा रहे थे तब उन्होंने एक बार भी नमरूद से रहम की भीख नहीं माँगी और ख़ुशी-ख़ुशी आग में कूद पड़े. इब्राहीम की अपने माबूद से इसी मुहब्बत को इश्क़ और अक्ल के ताअल्लुक से अल्लामा इक़बाल ने अपने इस शेर में बयान किया है. इकबाल कहते हैं : बे-खतर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़/ अक्ल है महवे-तमाशा-ए-लबे-बाम अभी.

यानि इब्राहीम के लिये नमरूद ने आतिश (आग) जलाया और आग देखते-देखते इतनी भड़क गई कि उसकी लपटें आसमान छूने लगी, अब इसमें कूदने की हिमाकत कौन करे. आग में उतर जाऊं या नमरूद से माफ़ी मांग के इससे बच जाऊं, इसका फैसला अगर इब्राहीम अक्ल से करने जाते तो अक्ल कहती, न कूदो, जल जाओगे पर इब्राहीम ने अक्ल से नहीं इश्क़ से फैसला किया और आग में कूद गये.

इसी को इकबाल ने कहा है कि जब इश्क़ कामिल हो तो वो आग में कूदने से पहले कुछ नहीं सोचता और बेखतर कूद पड़ता है जबकि अक्ल होंठों पे अंगुली रखकर छत पर खड़ी अभी भी सोच रही है कि आग में कूदूं कि न कूदूं.

इश्क़ और अक्ल की ये जंग सिर्फ इलाही मुहब्बत में ही नहीं दुनिया के हर प्रेम-कथाओं में है, गेसुदराज़ की इबादत से लेकर लैला-मजनूं की कथाओं में भी. लैला का आशिक अगर अक्ल के भरोसे रहता तो कभी भी उसे लैला से मुहब्बत न होती क्योंकि बेचारी लैला काली थी.

अक्ल कहती, अरे ख़बीस, मुहब्बत करनी है तो किसी गोरी और सुन्दरी को खोज, कहाँ इस काली-स्याह लैला के पीछे पागल हुआ पड़ा है, वो इश्क़ था जिसने मजनूं को लैला का दीवाना बनाया हुआ था.

गेसुदराज़ एक बार सर्द रात में यमुना में उतर गये और अपने माबूद से कहा, जब तक तू ये न कहेगा कि तू मेरा महबूब है और मैं तेरी माशूका हूँ, मैं यमुना से बाहर नहीं निकलूँगा.

अब अगर गेसुदराज़ अक्ल के सहारे होते तो कभी खुद को माशूका न कहते पर वो इश्क़ में थे इसलिये खुद को माशूका कहा और कहा जाता है कि वो तब तक यमुना के ठन्डे पानी में खड़े रहे जबतक गैब से ये आवाज़ न आई कि हाँ-हाँ, तू मेरी माशूका है.

इकबाल कहते हैं : गुजर जा अक्ल से आगे कि ये नूर,
चराग़े-राह है मंज़िल नहीं है.

यानि

* अक्ल बेशक नूर है पर मंजिल नहीं है
* अक्ल से आगे निकलोगे तो मंजिल वहां है, जहाँ सिर्फ इश्क़ लेकर जा सकती है
* अक्ल और इश्क़ में इश्क़ आला है, अक्ल में हाँ और ना दोनों है जबकि इश्क में सिर्फ ‘हाँ’ है.
* अक्ल सोचती है, इश्क़ कर गुजरता है.
* अक्ल सिर्फ इस जहां के लिये है जबकि इश्क दोनों जहानों का है.

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