“गरजते रहेंगे दक्षिणपंथी चौपाये”

लेफ्ट लिबरल को आजकल वामिस्लामी कहा जाने लगा है जो वास्तव में खुद को लिबरल मानने वालों को गहरे तक आहत कर जाने वाली अपमानजनक शब्दावली है. पर इसका दोष दक्षिणपंथियों को देने का फायदा!

बेचारे ज्यादातर लेफ्ट लिबरल अभी भी शीतयुद्ध के काल में जी रहे हैं. सब पचा सकते हैं पर अमेरिकी साम्राज्यवाद का काल्पनिक बेताल उनके कंधे से उतर ही नहीं रहा. रूस नहीं रहा तो अमेरिका को टक्कर देने के लिए कोई मजबूत कंधा ढूंढना पड़ेगा ही और यह संभावना उनको रेडिकल जेहादी इस्लाम में नजर आती है.

तब से वे येन केन प्रकारेण, चाहे शीर्षासन ही करना पड़े, रेडिकल जेहादी इस्लाम की करतूतों का ठीकरा अमेरिका, इज़राइल और अब हिंदू राष्ट्रवादियों पर फोड़ने को आमादा हैं. तुम ना होते तो जेहाद जैसी कोई चिड़िया ही पैदा नहीं होती.

जो करें उनकी मर्जी. पर पिछले तीन-चार साल इस वामिस्लामी ब्रिगेड के लिए दु:स्वप्न सरीखे रहे हैं. पहले मुख्य धारा की लिबरल मीडिया के मुंह पर तमाचा मार कर मोदी दिल्ली की गद्दी पर आसीन हो गए. उसके बाद रही सही कसर ब्रेक्जिट और फिर ट्रंप ने पूरी कर दी.

इन तीनों घटनाओं में मुख्यधारा का मीडिया कहीं से भी तटस्थ नहीं था. मोदी, ब्रेक्जिट और ट्रंप के विरोध में उन्होंने सब कुछ झोंक दिया. जी जान लगा देने के बाद होनी को वे रोक तो नहीं पाए पर अपनी विश्वसनीयता की जमा पूंजी गंवा बैठे. इस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी.

मुंह की खाने के बाद मुख्यधारा की मीडिया को समझ में आ गया कि अब असली अखाड़ा सोशल मीडिया है. भारत में मोदी के उदय के साथ बढ़ी दक्षिणपंथी ताकतों की मुखरता लेफ्ट लिबरल कानों में पिघले सीसे की तरह चुभ रही है.

ऐसे ही एक लेफ्ट लिबरल, इतिहासकार और सिविल लाइंस पत्रिका के सह संस्थापक मुकुल केशवन ने एनडीटीवी की वेबसाइट पर लिखे एक आलेख में ‘भक्तों’ का उपहास करते हुए कहा, “अखबारों के कॉलमों और वेबसाइटों में लगातार छन कर आ रहे बहुरंगी दक्षिणपंथी विचारों और टिप्पणियों की भरमार वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की एक खास विशेषता है. दशकों के धुंधले और ओझल अस्तित्व के बाद ये रूढ़िवादी पंडित अब खुले मैदान में नरेंद्र मोदी के आभामंडल से निकलने वाली धूप सेंक रहे हैं. इस रोशनी का रंग थोड़ा सा भगवा है, हवा में थोड़ी सी धूप-अगरबत्ती की महक है जिसमें मिमियाते हुए लिबरल ऑक्सीजन के लिए हांफ रहे हैं जबकि दक्षिणपंथ के विशालकाय चौपाये बुलंद आवाज़ में गरज रहे हैं.”

केशवन की साफगोई प्रशंसनीय है. उन्होंने माना तो कि दक्षिणपंथी इस कदर परिदृश्य से ओझल थे कि उनके धुंधले अस्तित्व को दूरबीन से ही देखा जा सकता था. पर यह कहना कि दक्षिणपंथी चौपाये बुलंद आवाज़ में गरज रहे हैं और मिमियाते हुए लिबरल ऑक्सीजन के लिए हांफ रहे हैं, अतिशयोक्तियों की उसी परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें इस धुंधले अस्तित्व के हौवे से भी परेशान लिबरल ‘फासीवाद’ और ‘सांप्रदायिकता’ के खिलाफ तलवार भांजते रहे हैं. दक्षिणपंथ से उठी एक भी आवाज़ उनके उस सुनहरे काल्पनिक संसार के लिए खतरे की घंटी है और कोरस फिर शुरू हो जाता है.

ये लेफ्ट लिबरल फिर से एक्शन में है. ताजा जुमला है “हेट स्पीच” जिसके हवाले से सोशल मीडिया की हर उस आवाज़ को बंद किया जा रहा है जो उनसे असहमत है. मोनोलॉग जारी रहना चाहिए था. सवाल पूछने वाला हर आदमी ट्रोल होता है इन लेफ्ट लिबरल मठाधीशों के लिए.

कोलकाता से निकलने वाले एक बड़े अंग्रेजी अखबार के एक बड़े से संपादक ने मुझे भांति-भाति के विशेषणों से नवाज़ने के बाद ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया. मैंने उनके ट्वीट के जवाब में बस इतना ही कहा था, Dawn is brighter at the other side.” इसमें हेट स्पीच का तत्व ढूंढ कर निकालें? यह उस दिन उस अखबार के फ्रंट पेज की लीड खबर की हेडिंग थी.

सदानंद धूमे ने टाइम्स ऑफ इंडिया में अपने आलेख में इस सवाल से बखूबी मुठभेड़ की. वे लिखते हैं, “अब इसे एक तरह से स्थापित सत्य मान लिया गया है कि ज्यादातर ट्रोल दक्षिणपंथी हैं. लेकिन एक स्वाभाविक सवाल कोई नहीं पूछता कि क्यों? संक्षिप्त उत्तर होगा, नेहरूवादी मूल्यों की रक्षा को समर्पित बुद्धिजीवियों और मीडिया के दरबानों ने उन लोगों को कभी भीतर घुसने ही नहीं दिया जिनसे उनकी असहमति थी. ट्रोल्स का भाजपा के प्रति एकतरफा झुकाव और जो भूमिका वे निभा रहे हैं, शायद उनके इस गुस्से को व्याख्यायित कर सकता है. सत्ता प्रतिष्ठान के नज़रिए से वे दरवाज़े पर दस्तक दे रहे बर्बर हैं, पर वैकल्पिक नज़रिए से देखें तो यह बेहद सुधारात्मक है और उनके लिए पहला वास्तविक अवसर है जिन्हें कभी भी टेलीविज़न चैनलों के स्टूडियों या अखबारों के संपादकीय पेज तक नहीं पहुंचने दिया गया जहां वे वैकल्पिक विचार रख सकें.”

“अंत में भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे को भयावह रूप से बढ़ाया-चढ़ाया गया है. खतरा सिर्फ अभिव्यक्ति पर एकाधिकार को है.”

हम कहेंगे कि यहां Thusidide Trap पूरे एक्शन में है? संक्षेप में कहें तो Thusidide Trap का मतलब यह होता है कि जब कोई उदीयमान शक्ति स्थापित शक्ति को चुनौती देने लगती है तो युद्ध अवश्यंभावी होता है.

तो मान कर चलें कि दक्षिणपंथ इस समय वामोन्मुखी लेफ्ट लिबरल के साथ युद्ध की स्थिति में है. एकाधिकारी शक्तियां अपने वर्चस्व को चुनौती बर्दाश्त नहीं कर पा रहीं. लेफ्ट लिबरल प्रवृत्ति यह रही है कि उसके विचार ही वैध हैं, बाकी जो है सब अवैध और त्याज्य है. पर इनके लिए जो त्याज्य और तिरस्कार योग्य था, वही आज की मुख्यधारा है. लेफ्ट लिबरल मठाधीश मास रिपोर्टिंग कर फेसबुक व ट्विटर पर एक-दो खाते बंद करा सकते हैं पर कारवां रुकने वाला नहीं. दक्षिणपंथी चौपाये गरजते रहेंगे.

भाई अजित सिंह के समर्थन में… जो लगता है कि लेफ्ट लिबरल और इस्लामिस्टों का प्रिय निशाना बन कर उभरे हैं और फेसबुक ने जिन्हें नियमित रूप से ब्लॉक करने को अपनी आदत बना लिया है.

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