मृत्युप्रदाता-जीवनदाता : Fritz Haber, एक युद्ध-अपराधी, जिसे मिला रसायन का नोबल

मानव इतिहास में अचानक ही इतनी चीजें एक साथ हो जाती हैं कि उनका प्रभाव सकारात्मक पड़ा या नकारात्मक, निश्चय करना मुश्किल हो जाता है.

बीसवीं शताब्दी, औद्योगिक क्रांति, यूरोपीय देशों का राष्ट्रवाद, पड़ोसियों से उन्मादी होड़. फिर ऊपर से जानलेवा बीमारियों का सफल इलाज, आबादी का विस्फोट. शहर पट गए थे गाँव से आने वाले मजदूरों से. इंसान को भोजन चाहिए और यूरोप के खेतों में इतनी जान नहीं थी कि सबका पेट भर सके. तो जरूरत थी जादू की, जादुई खाद की.

कुछ 50 साल पहले जर्मन रसायनशास्त्री ‘युस्टुस फॉन लिबिह’ ये सिद्ध कर चुके थे कि पौधों के लिए सर्वाधिक आवश्यक उर्वरक नाइट्रोजन है. इसी शोध के आधार पर ये मालूम चला कि दो और उर्वरक फॉस्फोरस और पोटेशियम भी जरूरी हैं. (श्री युस्टुस आधुनिक कृषि के जनक कहे जाते हैं.) अब ये तो पता था कि हवा में नाइट्रोजन भरी पड़ी है, 78.09%, पर उसे खींच कर खाद कैसे बनाये? तो नाइट्रोजन की खोज के लिए पूरा यूरोप दुनिया खंगाल रहा था और उसे साउथ अमेरिका के पश्चिमी छोर पर प्रशांत महासागर के द्वीपों पर मिला ‘गुआनो’. गुआनो, ऊंचे ऊंचे टीले. काहे के? जी, चिड़िया की बीट के.

ये निर्जन द्वीप, जाने कितने वर्षों से समुद्री पक्षियों का घर, जो समुद्र से मछली खाते और बीट करते. उधर बारिश इतनी कम होती है कि वे टीले जैसे के तैसे बने रहे, घुल कर वापस समुद्र में नहीं मिले. कुछ तो 150 फुट ऊंचे.

पेरू में इन गुआनो का उपयोग 1500 साल से होता आया था. इसका दर्जा सोने के बराबर था. जैसा भारत में कालीमिर्च का हुआ करता था. हम मसालों की वजह से गुलाम बनाये गए, और ये साउथ अमेरिकी देश इस चिड़िया की बीट ‘गुआनो’ की वजह से.

इस बीट को यूरोप भेजा जाने लगा, जाने कितनी लड़ाइयां, कानून, संधियां, संधियां भंग होने पर फिर से लड़ाइयां हुई इसकी वजह से. जेम्स बांड के शौकीनों को उसकी पहली फिल्म ‘डॉक्टर नो’ याद होगी जिसका विलेन इस गुआनो का व्यापारी होता है.

उसी समय 1850 में जब पेरू के गुआनो के लिए युद्ध हो रहे थे, पड़ोसी देश चिली में साल्टपीटर अर्थात पोटैशियम नाइट्रेट के खनिज मिल गए. ये भी आने लगा यूरोप.

इनके जहाज को यूरोप तक लाना बड़ा खर्चीला था, फिर गुआनो के टीले कभी तो खत्म होने थे. तो 19वीं सदी के अंत में नाइट्रोजन के सस्ते विकल्प की खोज शुरू हुई और इसमें बाजी मारी जर्मनी के ही ‘फ्रिट्ज हेबर’ ने. उन्होंने 1908 में हवा से नाइट्रोजन खींच कर दिखा दिया. और इसे औद्योगिक स्तर पर ले आये कार्ल बॉश. इस प्रक्रिया को ‘हेबर-बॉश’ कहा जाता है. (ये बॉश महाशय फेमस इंजीनियर और स्पार्क प्लग के आविष्कारकर्ता रॉबर्ट बॉश के भतीजे थे)

वो जमाना यूरोपीय राष्ट्रवाद की महामारी का था, इस महामारी ने पहला विश्वयुद्ध करवा दिया. ब्रिटेन ने जर्मनी की नाकाबन्दी कर दी जिससे गुआनो लदे जहाज जर्मनी तक नहीं पहुंच सकते थे. तब हेबर-बॉश प्रक्रिया द्वारा हवा से नाइट्रोजन खींचकर बनाई गई अमोनिया ने जर्मनी को बनावटी खाद ही नहीं दी, असलहा और विस्फोटक भी दिया. माना जाता है कि अगर जर्मनी के पास अमोनिया बनाने का तरीका ना होता तो पहला विश्वयुध्द 4 की बजाय 2 साल में ही खत्म हो गया होता.

युद्ध के बाद पहले तो श्री फ्रिट्ज हेबर को युद्ध-अपराधी कहा गया, पर बाद में उनकी खोज की महत्ता देखते हुए उन्हें रसायन का नोबल दिया गया. अजीब है ना, डायनामाइड के आविष्कारकर्ता अल्फ्रेड नोबल के नाम पर ये सारे पुरस्कार जिसमें शांति का पुरस्कार भी है. खैर…

फ्रिट्ज ने कभी कहा था कि वैज्ञानिक शांतिकाल में दुनिया का, पर युद्धकाल में केवल अपने देश का होता है. फ्रिट्ज रासायनिक हथियारों के भी जनक थे. जहरीली गैस क्लोरीन का सफल उपयोग पहले युद्ध में 22 अप्रैल 1915 को हुआ. इसे करवाने के लिए फ्रिट्ज खुद बेल्जियम गए थे. इस अमानवीय कृत्य को लेकर उनकी पत्नी ने उनसे बहस की और गोली मार कर आत्महत्या कर ली. इसके अगले ही दिन ये महान वैज्ञानिक रूसी सेना पर रासायनिक हथियार छोड़ने मोर्चे पर चला गया.

जर्मनी हारा, विश्वयुद्ध खत्म. और हिटलर तथा नाजी पार्टी का उदय. नाजी शासन को बड़ी रुचि थी रासायनिक हथियारों में, इन्हें बड़ा लुभावना सा कॉन्ट्रैक्ट मिला. इसी बीच हिटलर की यहूदियों से नफरत उजागर होने लगी थी. श्री फ्रिट्ज, घनघोर राष्ट्रवादी, वर्षों पहले धर्मांतरित ईसाई पर किस्मत की मार कि थे पैदाइशी यहूदी. इतना डरे कि 1933 में इंग्लैंड भाग गए. वहां से इजराइल के लिए चले पर रास्ते में स्विट्जरलैंड में इनका देहांत हो गया (यहूदियों की भूमि, पर उस समय इजराइल ‘देश’ नहीं बना था’).

इनके गैस पर किये शोध को जर्मनी ने खूब बढ़ाया और ‘जाएक्लॉन-बी’ नामक गैस बनाई, जिसने बड़े सस्ते में ही लाखों यहूदियों को चुटकी में खत्म कर दिया. माना जाता है कि इन मरने वालों में श्री फ्रिट्ज के कई रिश्तेदार भी थे.

हेबर-बॉश प्रक्रिया से बने हथियारों ने अब तक 15 करोड़ लोगों की जान ले ली है. पर फ्रिट्ज हेबर की कहानी यही खत्म नहीं होती. दूसरे युद्ध के बाद अमोनिया के कारखाने बन्द नहीं हो गए, इन कारखानों में अमोनिया से बनावटी खाद यूरिया बनने लगी.

अपने बुजुर्गों से पूछियेगा कि एक समय हमारे पास खाने को अन्न नहीं हुआ करता था. 2 अक्टूबर को शास्त्री जी का जन्मदिन मनाया तो खाद्यान्न संकट भी जानते होंगे. एक टाइम का भुखमरा भारत आज इतना अनाज उगाता है कि वो गोदामों में पड़े-पड़े सड़ जाता है. हमें और विश्व को आत्मनिर्भर बनाने में इस यूरिया का योगदान अहम है. कई वैज्ञानिक फ्रिट्ज हेबर की अमोनिया की खोज को पिछली सदी की सबसे महत्वपूर्ण खोज मानते हैं.

जो खोज आज हमें अन्न दे रही है, उसने पहले कितनी तबाही मचाई है. ये अभी भी (धीमी) तबाही ही मचा रही है, कभी आगे किसी लेख में चर्चा करेंगे इस पर.

पर ये खोज हुई किस चीज के लिए? नाइट्रोजन के लिए, पौधों को खाद देने के लिए. जबकि प्रकृति ने इसका इतना आसान तरीका दिया हुआ है कि…

फिर कभी…

विषय से इतर:

यहां मैंने कई बार ‘राष्ट्रवाद’ शब्द का प्रयोग किया है. कुछ मित्रों को ये खलेगा तो कुछ खिल जाएंगे कि मैंने इसको गलत/अनुचित दर्शाया है. दरअसल अधिकांश परिभाषाएं पश्चिमी हैं, यूरोप के राष्ट्रवाद का मतलब था खुद को श्रेष्ठ बनाने के लिए दुनिया भर के सैनिक दृष्टि से कमजोर पर प्राकृतिक संसाधनों से मजबूत देशों का हरण, उपनिवेशवाद की स्थापना. स्वस्थ शरीर पर चिपटी हुई जोंक.

पर भारत के मामले में ऐसा कुछ नहीं. इतिहास में एक उदाहरण नहीं कि हमने कभी किसी अन्य राष्ट्र या संस्कृति पर हमला किया हो. जोंक बनकर खून चूसा हो. हम तो इतने ‘महान’ हैं कि अपने राज्य सिक्किम को गैरविवादित बनाने के लिए सांस्कृतिक मित्र ‘तिब्बत’ सौंप देते हैं. हमारा राष्ट्रवाद ‘अपने संसाधनों’ के बल पर खुद को मजबूत करना चाहता है, किसी को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति और प्रकृति ना हमारी कभी थी, और ना कभी होगी.

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