बेग़म साहिबा को गौर से सुनिए… वो एक-एक अक्षर गाती हैं

ठीक-ठीक तो याद नहीं पर शायद 22 या 23 साल की उम्र में मैंने बेग़म अख्तर को पहली बार सुना था. उस से पहले मैंने गुलाम अली और मेहदी हसन साहब को दो साल सुन लिया था.

इसी उम्र में, 1984 के आसपास अम्बाला में पंडित राजन साजन मिश्र आये थे. वहां रुक्मणी देवी हॉल में उनका एक concert हुआ था. मेरे एक मित्र हुआ करते थे, राजकमल जी, वो मुझे अपने साथ उस Concert में ले गए थे. उस महफ़िल को मैं अपने जीवन का एक turning point मानता हूँ.

हालांकि पहली बार शास्त्रीय संगीत सुन के पचा लेना कोई आसान काम नहीं. पहली बार तो यही समझ नहीं आता कि माजरा क्या है. पर फिर भी मैं सारी रात बैठा रहा. उसके बाद, इत्तेफ़ाक़न उस concert की एक recording हाथ लग गयी. उस रात मिश्र बंधु ने राग बिहाग गाया था.

मैंने जब उस cassette को सुनना शुरू किया तो बहुत जल्दी ये समझ आ गया कि नए सुनने वाले को खयाल गायन में पहले विलंबित नहीं बल्कि द्रुत बंदिश सुननी चाहिए. एक बार जब द्रुत भाने लगे तो फिर धीरे-धीरे विलंबित और आलाप की तरफ बढ़ना चाहिए.

ये कुछ कुछ ऐसा ही है जैसे आदमी अखबार पढ़ना सीखता है. बच्चा सबसे पहले पीछे से Sports page पढ़ना शुरू करता है, फिर कुछ सालों में Front page से होता हुआ Editorial तक जाता है. कुछ लोग अर्थ और व्यापार वाले page तक ताउम्र नहीं पहुंच पाते. तो ठीक वैसे ही शास्त्रीय संगीत सुनना सीखना पड़ता है.

बहरहाल 20 – 22 साल की उम्र तक मैंने कायदे से शास्त्रीय संगीत और ग़ज़लें सुनना शुरू कर दिया था. फिर एक दिन किसी TV प्रोग्राम में किसी बहुत बड़े गवैये के मुँह से बेग़म अख्तर की तारीफ सुनी. दिल्ली गए और उनकी एक cassette ले आये. सुनना शुरू किया.

उसके बाद, 1986 की बात है. उन दिनों भिवानी में SAI के Sports Hostel के छात्र थे. पहलवानी सुबह शाम की होती थी. दिन नेकी राम शर्मा library में या फिर Deven Kalra के साथ बीतता था. हम दोनों में आज तक ये clear न हुआ कि हम दोनों में कौन नीम था और कौन सा करेला.

दोनो के शौक एक से थे. Books और Music… music एक सा ही सुनते थे दोनो. एक बार उनके हाथ एक cassette लग गयी. वहीं भिवानी में ही TIT मने textile engineering का institute था, वहीं के एक लौंडे से दोस्ती हो गयी थी, उसी ने दी थी. cassette लगाई. कव्वाली थी. उस से पहले हम पाकिस्तान के साबरी बंधु को ठीकठाक सुन चुके थे. पर ये गवैया बहुत ऊंचे दर्जे का था.

अबे ई का बवाल है?

ई कोई नुसरत फतह अली साहब हैं. ये वो दौर था जब अभी हिंदुस्तान में नुसरत साब को कोई नहीं जानता था. लोगों ने नाम तक न सुना था. उस कैसेट में उनने किसी private महफ़िल में जोगी गायी थी… लगभग सवा घंटे की recording थी. एक बार नुसरत साब को सुनना जो शुरू किया तो वही एक कव्वाली पूरे साल भर सुनी, दिन रात… ऐसा नशा चढ़ा नुसरत साब का…

1986 से शुरू हुआ ये सिलसिला अगले 20 साल तक चला. इन बीस साल में मैने पूरे देश में घूम घूम के Classical Music के concerts सुने. बिल्कुल दीवानों की तरह. ऐसी दीवानगी थी कि Concert सुनने दिल्ली से पूना, जालंधर, अमृतसर, जयपुर, वाराणसी… दूर दूर तक यात्रा करके concerts सुने.

पटियाला जालंधर से दिल्ली तो यूँ जाते थे जैसे लोग घर से पान खाने जाते हैं. दीवानगी का आलम ये था कि एक बार हम दोनों मियाँ बीवी वाराणसी से चले जालंधर को, हरबल्लभ सुनने. ट्रेन में सीट न मिली. 24 घंटे की यात्रा जागते हुए की. पंडाल में शाम को पहुंचे. घंटे भर में नींद आ गयी. सारी रात उसी पंडाल में घोड़े बेच के सोये. उधर संगीत बजता रहा. ऐसी सुरीली नींद भी कोई सोयेगा? बाद में उस रात की सारी recordings खरीद के सुनी.

बेग़म अख्तर से हालांकि परिचय तो 22-23 साल की उम्र में हो गया था पर उनको मैंने कायदे से discover किया 40 साल की उम्र में. बहुत mature होने के बाद एक दिन अचानक यूँ हुआ कि जैसे कोई जादू सा हुआ… और उस रात मुझे समझ आया कि बेग़म अख्तर असल मे चीज़ क्या हैं.

फिर उनको मैंने कायदे से सुनना शुरू किया. पर दुर्भाग्य से उनका music, market में उपलब्ध न था. ले दे के वही 15-20 ग़ज़लें, ठुमरियाँ थीं. फिर youtube आया. आज के युग के युवा सोच भी नहीं सकते कि Youtube ने Music सुनना कितना आसान, सस्ता और सुलभ कर दिया है.

वरना वो भी दिन थे कि जब मेरी तनख्वाह 1000 रु थी तो हम गुलाम अली साहब की एक casette 60 रु की खरीदते थे, जिसमे कुल 6 ग़ज़लें होती थीं, उनमे भी सिर्फ 3 नई… बाकी सब पुरानी. इस तरह बेवक़ूफ़ बनाती और लूटती थी music कंपनियां हमें.

बहरहाल, Youtube आया, यूं बेग़म अख्तर का समग्र गायन दुनिया के सामने आया… और जब उनको सुना तो यकीन मानिये कि सब भूल गए…

शास्त्रीय संगीत की विधा अलग है… बेग़म साहिबा semi classical गाती थीं. ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, कजरी… और नुसरत साब कव्वाली…

शास्त्रीय संगीत फल फूल रहा है. नई पीढ़ी भी ठीक ठाक गा बजा रही है… पर बेग़म अख्तर और नुसरत साब के जाने के बाद ग़ज़ल और कव्वाली तो जैसे अनाथ ही हो गयी.

बेग़म साहिबा जैसा गाने वाला आज तक न कोई हुआ, न आगे होगा. उनकी गायकी बेजोड़ थी.

30 साल संगीत सुनने के बाद आज मैं इतना कह सकता है कि अच्छे-अच्छे गवैये ग़ज़ल की एक लाइन गाते हैं. गुलाम अली और मेहदी हसन साब जैसे दिग्गज एक-एक शब्द गा लेते हैं.

बेग़म साहिबा को गौर से सुनिए… वो एक-एक अक्षर गाती हैं.

और पूरी ग़ज़ल में कभी भी किसी एक शब्द की गायकी को repeat नहीं करतीं… मसलन उनकी ये ग़ज़ल सुनिये… इश्क़ में ग़ैरत ए जज़्बात ने रोने न दिया… इस ग़ज़ल में उन्होंने ये “दिया” शब्द कई बार गाया है… हर बार अलग गाया है…

इस ग़ज़ल में सुनिये कैसे वो एक एक अक्षर गाती थीं, और हर बार अलग, एक मुक्तलिफ़ अंदाज़ में गाती थीं.

आज बेग़म अख्तर का 100वां जन्म दिन है.

ज़िंदा होतीं तो आज 100 साल की होतीं.

उनके जैसा ग़ज़ल और ठुमरी का गवैया अब धरती पे पैदा न होगा.

अपने जीवन के अंतिम दिनों में मैं अपने नाती पोतों को गर्व से बताया करूँगा कि मैंने भी ज़िन्दगी में एक कायदे का काम किया… मैं बहुत खुशनसीब हूँ कि मैंने बेग़म अख्तर को सुना…

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