भंसाली का एजेंडा : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़

अधिकांश हिन्दुओं को फिल्मों द्वारा फैलाये जा रहे ज़हर की परख तक नहीं है, बचाव और इसकी काट तो बहुत दूर की कौड़ी है. जब भंसाली की ‘पद्मावती’ की बात की जाती है तो तरह-तरह के कुतर्क सामने आते हैं. किसी को इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दिखती है तो किसी को लगता है कि जब तक फिल्म को देख न लिया जाय तब तक उसे गलत कैसे कहा जाय. कूल डूड और डूडनिओं का एक ऐसा वर्ग भी है जिसे सिर्फ मौज मस्ती से ही मतलब है. माने कव्वाली पर जमीला बाई नाचें या उनकी अम्मा इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, इन्हें तो पाउडर और ओंठ-लाली पोत कर बस वीक-एंड पे फिल्म एन्जॉय करनी है.

जहाँ तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न है, उसका हम भी सम्मान करते हैं, होना भी चाहिए, यही तो लोकतंत्र की असली ताकत है. पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़ की स्वतंत्रता तो नहीं दी जा सकती है. यदि संजय लीला भंसाली किसी काल्पनिक परम सुन्दरी नायिका का किरदार गढ़ कर उस पर किसी सुअर या श्वान को आसक्त दिखाकर महिमामंडन करें तो हमे कोई आपत्ति नहीं होगी. वो चाहें तो उस सुअर या श्वान की विभिन्न काम-मुद्राओं की श्रृंखला चलाएं, किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी… आखिर अडल्ट फ़िल्में भी इस देश में चलती ही हैं… उनका भी भरा पूरा बाज़ार है.

यहाँ असली समस्या है फिल्म की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, डिस्क्लेमर डालने का अर्थ हम सभी समझते हैं (जिसका खंडन होता है वही दिखाया गया होता है). समस्या, अनगिनत हिन्दू महिलाओं के शील भंजक, कामुक, लुटेरे, सुअर खिलजी के महिमामंडन और जौहर के पावन बलिदान को एक सामाजिक बुराई के रूप में प्रदर्शित करने से है.

कुछ लोग कहते हैं कि बिना फिल्म देखे ही आप क्यों शंका कर रहे हैं. तो उत्तर है कि फिल्म के मुख्य अभिनेता रणवीर सिंह का खिलजी की भूमिका में होना ही भंसाली की मंशा पर संदेह उत्पन्न करता है.

फिल्म में खिलजी के चचा जान माने जलालुद्दीन खिलजी तो मौजूद हैं पर इस कथा के असली नायक महायोद्धा गोरा और बादल को पूरी तरह से गायब कर दिया गया है. गोरा और बादल के चरित्र का पूरी तरह गायब होना ही भंसाली के असली एजेंडे की पोल खोल रहा है.

किसी फिल्म में, सिजरा नायक का दिखाया जाता है खलनायक का नहीं… अतः स्पष्ट है कि भंसाली की पटकथा का नायक खिलजी है, न कि राणा रतन सिंह. असली नायक गोरा और बादल तो पूरी तरह गायब हैं ही. ऐसे में फिल्म के आने तक की प्रतीक्षा करना और तब कुछ न कहने की बात करना, परम मूढ़ता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

कुछ मॉडर्न टाइप के हिन्दू कहते हैं कि, “अरे यार चिल मारो… जौहर तो पुरानी बात हो गई… हमें उन सबसे क्या लेना–देना, अपुन को तो वैसे भी हिस्ट्री कभी पल्ले नहीं पड़ी”

तो उत्तर है कि बेटा यदि जौहर न हुआ होता तो तुम आज चिल मारने की बजाय दिन में पांच पर अल्ला रहे होते और वीक-एंड की मस्ती की जगह कहीं हलाला का जुगाड़ खोज रहे होते.

यदि जौहर नहीं हुआ होता तो तमाम हिन्दू नारियाँ, हरमों में पहुँच कर न जाने कितने सलीम पैदा कर चुकी होंती. जिनसे रक्तोदर से उत्पन्न मलेच्छ, सामान्य मलेच्छों से कई गुना शक्तिशाली होते और आज भारतवर्ष के बीसियों पाकिस्तान बन चुके होते.

गज़वा–ए–हिन्द का मंसूबा ख्याली पुलाव न होकर आज धरातल की सच्चाई बन चुका होता. तो हे कूल डूड और डूडनिओं, ऐसे में तुम्हारा कोई अस्तित्व ही नहीं बचता. फटी जीन्स की जगह तुम सब सुबह-शाम तीन पत्थरों के जुगाड़ में ही व्यस्त रहते. कालीदास तो पेड़ की डाल काट रहे थे, तुम तो पेड़ ही काटने पर तुले हुए हो.

हमें उन सभी महान देवियों की चिताओं की धूल पूजनी चाहिए जिन्होंने आत्मोसर्ग द्वारा जनसँख्या–जिहाद की आंधी को रोक कर सनातन संस्कृति की रक्षा की. उनके चरित्र हनन का कोई भी प्रयास पूरे हिन्दू समाज का अपमान है. भंसाली का असली एजेंडा, जौहर को सामाजिक बुराई के रूप में प्रदर्शित कर जनसँख्या जिहाद का मार्ग प्रशस्त करना है. जेहादी को नायक दिखाकर भोली–भाली बालाओं के मस्तिष्क में उसके प्रति अनुराग भरना है.

ऐसे में, इस फिल्म को किसी भी हाल में आने से रोकना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य ही नहीं, धर्म भी है. सेंसर बोर्ड पर जबरदस्त दबाव बना कर भंसाली को सही इतिहास दिखाने या फिल्म को वापस लेने पर विवश किया जाना चाहिए.

आज प्रखर, प्रचंड और मुखर विरोध ही विकल्प है; अन्यथा धीरे–धीरे करके ये फ़िल्मी भांड सारा इतिहास कलंकित कर देंगे. जिन्होंने आप की सुरक्षा के लिए स्वयं अग्नि का वरण किया हो, उनके सम्मान के लिए जो इतना भी न कर सके ऐसे कृतघ्न का विनाश स्वयं महाकाल भी नहीं रोक सकते!

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