श्रद्धांजलि : कुंदन शाह कह गए, अब जाने भी दो यारों

Kundan Shah

अभी खबर मिली कि हास्य को समझने वाले, विलक्षण प्रतिभा के धनी, हिंदी फिल्म और टीवी के निर्देशक कुंदन शाह का 69 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया तो एक सेकंड के लिये दिल ही बैठ गया.

मेरा कुंदन शाह से पहला परिचय तब हुआ जब 1983 में मैने दिल्ली के पहाड़गंज के पास एक खाली से फ़िल्म हाल में ‘जाने दो भी यारों’ देखी थी. जब मैं इस फ़िल्म को देखने गया था तब मैं कुंदन शाह को नहीं जानता था. यह फ़िल्म मैंने नसीरुद्दीन शाह, रवि वासवानी(चश्मे बद्दूर में उससे मिल चुका था) और ओम पुरी के लिये मूलतः देखी थी.

इस फ़िल्म के रिलीज़ से पहले एक अंग्रेजी में लेख पढ़ा था जिसमें यह लिखा था कि यह पूना फ़िल्म इंस्टिट्यूट्स से निकली प्रतिभाओं द्वारा बनाई जा रही गम्भीर समांतर आर्ट्स फ़िल्म के दौर में, उनके ही बीच से निकली एक ब्लैक कॉमेडी है जो भारत के दर्शकों के लिये एक नया अनुभव होगा. और जिसने भी यह लिखा था वह एक दम सत्य था. इस फ़िल्म के पहले सीन से लेकर अंतिम इंडिया गेट वाले शॉट तक यह शुद्ध रूप से एक ओरिजिनल और महान फ़िल्म थी.

इसी फिल्म ने मेरा परिचय कुंदन शाह, पंकज कपूर, सतीश शाह, सतीश कौशिक और एक लंबे अंतराल के बाद भक्ति बर्वे से कराया था. यह एक आश्चर्यजनक तथ्य है कि कुंदन शाह ने उसके बाद लम्बे समय तक कोई भी फ़िल्म नहीं बनाई बल्कि अपना ध्यान उन्होंने टीवी पर केंद्रित किया. उनका पहला सीरियल ‘यह जो है ज़िन्दगी’ बेहद सफल हुआ था और सतीश शाह द्वारा निभाय गये अलग अलग किरदारों ने हर घर के दिल मे जगह बना ली थी. इसके बाद सईद और अजीज मिर्ज़ा के साथ बम्बई की ज़िंदगी एक काला सच ‘नुक्कड़’, बम्बई की फिल्मी दुनिया पर सटायर ‘मनोरंजन’ और आर के लक्ष्मण का आम आदमी ‘वागले की दुनिया’ बनाई.

वैसे तो #Kundan_Shah ने बाद में शाहरुख खान के साथ ‘कभी हां कभी ना, और प्रिटी जिंटा अभिनीत ‘क्या कहना’ ऐसी सफल फ़िल्में भी बनाई लेकिन फिर भी वो ‘जाने दो भी यारो’ से लेकर ‘वागले की दुनिया’ का सफर दोहरा न सके.
 

आज कुंदन शाह भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन वो हमेशा ‘जाने भी दो यारो’ में जिंदा रहेंगे.

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