Bad Time Management के विश्व गुरु हैं हम

हम और आप ज़रा गौर करते हैं… गौर करेंगे तो पता चलेगा कि हम सब अव्यवस्थित और बेढंगे लोग हैं… सड़क पर चलते हुए जब आप मुड़ रहे होते हैं तो उस समय भी दूसरा आपके बाएं या दाएं से घुस के आपको ओवरटेक करने की कोशिश करता है – Vice Versa too applicable.

रेल, बस, सिनेमा घर, बिजली बिल आदि जैसी कोई भी जगह हो, कहीं लाइन लगाने की आदत नहीं, लाइन लगने पर भी आगे जाने का जुगाड़ और झिकझिक होना एक आम दृश्य है. हमको समय का ज्ञान नहीं इसलिए हमारे पास समय नहीं… कहीं भी घण्टों गप्प मारेंगे लेकिन सारी जल्दी, सड़क पर चलने में और इस चक्कर में अपने साथ दूसरों की जान खतरे में डालते हुए अव्यवस्था फैलायेंगे… Bad Time Management के विश्व गुरु हैं हम.

एक दिन आइसक्रीम के ठेले पर एक जनाब दो बच्चों को आइसक्रीम खिलाने लाए, ठेलेवाले द्वारा रैपर को रखे हुए कूड़ेदान फेंकने को कहने पर भी रैपर बाहर गिरा दिए – उनके सामने ही हमने उठा के कूड़ेदान में डाल दिया तो उन्होंने बेशर्मी के साथ दूसरा रैपर भी जमीन पर फेंक दिया और बोले सिर्फ हमारे करने से क्या फर्क पड़ता है.

आप बच्चे को स्कूटर, मोटर साइकिल पर आगे बैठा के, बिना हेलमेट पहने, उलटी सीधी और हॉर्न पर चढ़कर गाड़ी चलाते हुए जा रहे होते हैं… आपको पता नहीं कि आपकी मूर्खता और बददिमागी को आपका बच्चा आपसे ही सीख रहा है. जब वो गाड़ी चलाएगा तो उसके, जान की परवाह न करते हुए सड़क पर मूर्खता करने के जिम्मेदार आप ही हैं.

हर तरह का बेढंगापन और मूर्खता करना हमारी राष्ट्रीय पहचान बन चुकी है. फर्क घर के अंदर नहीं बाहर दिखना चाहिए… अपना-अपना घर तो सभी साफ़ रखते हैं लेकिन जो मोहल्ला साफ़ होता है वो सभ्य लोग होते हैं… लेकिन अक्सर मोहल्ले गंदे ही मिलते हैं.

हम किस तरह स्वयं की भलाई नहीं समझते, उसका उदाहरण है हमारा किसी भी नियम को तोड़ने पर आर्थिक दण्ड की राशि बढ़ने का विरोध! लेकिन उस नियम को नहीं तोड़ने के बारे में सोचते तक नहीं.

हम रेलवे स्टेशन जाने पर लगने वाले प्लेटफार्म टिकट का विरोध करते हैं लेकिन ये नहीं समझते कि छोड़ने वालों की बेहिसाब भीड़ बढ़ने से कितनी अव्यवस्था फैलती है…

उचित तब होगा जब प्लेटफार्म टिकट ही न लगे… लेकिन फिर देखिये भीड़ – जितने जाने वाले उससे ज्यादा छोड़ने वाले. हम इस तरह निम्न सोचने के अभ्यस्त हो चुके हैं कि हम समझते ही नहीं कि असल में प्लेटफार्म टिकट अर्थ दण्ड है, फालतू में आपके वहां आ धमकने का…

अगर किसी को आपने दफ्तर में मिलने का समय दिया है और बाद में उसके जाने पर उसको दरवाज़े तक छोड़ने की छोटी सी सभ्यता नहीं रखने वाले, महिला और बुजुर्ग को दरवाजे से पहले आने-जाने का रास्ता नहीं देने की सभ्यता रखने वाले, कुर्सी पर स्वयं बैठने से पहले दूसरे को जगह नहीं देने की सभ्यता न रखने वाले, एम्बुलेंस को रास्ता देने की बजाय रेस बढ़ा के उससे आगे निकलने वाले… यही है हमारी सोसाइटी…

सरकारी दफ्तरों में बाबू लोग घूस कमा के घटिया सड़क, रास्ते और नाले बनाने वाले इतनी भी सोच नहीं रखते कि उसमें जरूर उनके दफ्तर का या घर का ही कोई गिर के हाथ पैर तुड़वाएगा या मर सकता है…

औद्योगिक विकास की जिम्मेदारी निभाने वाला विभाग का घूसखोर – निकम्मा बाबू और अधिकारी समझता ही नहीं कि इस काम में रोड़े लगा के वो अपनी ही पीढ़ियों से अपने शहर में लगने वाला रोजगार छीनकर उसे आने वाले दिनों में सदा के लिए अपने से दूर ही भेजने का काम कर रहा है. उसकी निम्न सोच ये ख्याल ही नहीं आने देती कि वो सिर्फ कई पीढ़ियां बर्बाद कर रहा है…

कुल मिलकर हमारी सोच इस कदर छोटी हो चुकी है कि खुद का ही भला नहीं समझते… और अपनी मूर्खता से उपजे प्रत्येक नुकसान को किसी दूसरे इंसान, संस्था या सरकारों पर मढ़ के अपने दोष की इतिश्री समझ लेते हैं…

एक सभ्य, अनुशासित, उच्च, सामयिक और असल में सामाजिक सोच वाला समाज ही एक महान राष्ट्र बनता है… इस मूल मन्त्र को जब तक लोग अपनाएँगे नहीं तब तक उन्नत और मजबूत राष्ट्र बनाने की हर बात बेकार और खोखली है.

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