सच में एक मज़ेदार देश है भारत, गजब के हैं अवार्ड वापसी गिरोह के साहित्यकार

जिन लोगों को पुराना वाजपेयी जी का दौर याद होगा, उन्हें ये भी याद होगा कि उस दौर में सुषमा स्वराज सूचना एवं प्रसारण मंत्री हुआ करती थी. वो दूरदर्शन का ज़माना था जब केबल टीवी भी हर जगह नहीं पहुंचा था. पता नहीं कैसे सोशल मीडिया के ना होने पर भी उस दौर में अफवाहें हमेशा हर जगह पहुँचती रहती थीं.

ऐसी ही अफवाहों में से एक अफवाह थी, गर्भनिरोधकों जैसे माला डी वगैरह के प्रचार को रात दस बजे के बाद प्रसारित किये जाने के फैसले का किस्सा. कहते हैं, एक बार जब सुषमा किसी काम से दवा की दुकान पर गईं तो उनके साथ उनकी बिटिया भी थी. वो वहां टॉफ़ी लेने की जिद पर अड़ गई. जब पूछा गया कि कौन सी लोगी तो और आफत! वो माला डी (जिसका प्रचार अक्सर आता था) लेने की जिद लेकर बैठ गई! चुनांचे इस किस्म के प्रचार देर रात आने लगे.

शब्दों का सही मतलब ना समझ पाने का किस्सा यहीं ख़त्म नहीं होता. ऐसा भी नहीं है कि ये हमेशा बच्चे ही करते रहे हों. कई बार मासूम, भटके हुए नौजवान भी एक ख़ास किताब का गलत मतलब निकाल लेते हैं. पेट पर बम बांध लेने वाले ये भोले भाले लोग बस वही एक किताब क्यों पढ़ते हैं, जिसका मतलब समझना इतना मुश्किल हो, ये मुझे नहीं पता.

इसके अलावा जब से इंटरनेट आया तब से बच्चे जैसी शॉर्ट फॉर्म की भाषा इस्तेमाल करने लगे हैं, ये अफवाह वाले किस्से का ठीक उल्टा भी होने लगा है. कई बार बड़े ही सही मतलब नहीं समझ पाते!

ऐसा ही एक किस्सा अनु गर्ग सुनाते हैं, जो अंग्रेजी शब्दों और उनकी व्युत्पत्ति के जाने माने लेखक हैं. उन्हें भी शब्द समझने में दिक्कत होती है. उनका किस्सा कुछ यूँ था कि वो अपनी बेटी के साथ स्कूल की एक विज्ञान प्रदर्शनी में गए. वहां कई और चीज़ों के साथ एक वाटरप्रूफ इलेक्ट्रॉनिक का नमूना भी था. उसे पानी में डुबाया जाता तो उसकी स्क्रीन पर “FYL” लिखा उभरता. अब अनु गर्ग को नमूना तो मजेदार लगा, लेकिन वो FYL का सही मतलब नहीं समझ पा रहे थे.

तो जैसे ही प्रदर्शनी में सवाल जवाब का दौर आया उन्होंने हाथ उठाया और पूछ लिया. पूरे हॉल में सबने उनका सवाल अनदेखा कर दिया. भारतीय पत्रकार बिरादरी की तरह, लोग अमेरिका में, सवाल मुंह में ठूंसने की कोशिश नहीं करते तो उन्होंने अगली बार फिर हाथ उठाया. उनका सवाल फिर अनदेखा हुआ. तीसरी बार वो हाथ उठा ही रहे थे कि बिटिया ने हाथ नीचे खीचा और कान में कहा “डैड, उसका मतलब “F*%$ you life” होता है, अब और नाक ना कटवाओ!”

तो अब उल्टा भी होता है. ये भी नहीं कि ऐसा सिर्फ बच्चो या बड़ों के कुछ ख़ास वर्गों पर होता है. कलाकार, लेखक, फिल्म-नाटक जैसे क्षेत्रों से जुड़े तथाकथित बुद्धिजीवियों के साथ भी ऐसा होता है. विचारधारा और नारीवाद के चक्कर में वो भी कई चीज़ें समझ नहीं पाते. भारत में साहित्य और फिल्म-टीवी या कला के और रूपों में भारतीय परिवारों के रिश्तों का अभाव इसी वजह से नज़र आता है. रोजमर्रा की फिल्मों-टीवी, कहानियों या कला में आपको पारिवारिक सम्बन्ध नहीं दिखते.

जैसे माला डी वाले मामले में हुआ था, वैसे ही संबंधो को भी देखना हो तो आपको प्रचार देखने होंगे. प्रचार बनाने वालों के साथ ये मजबूरी होती है कि उनका बनाया कोई टीवी सीरियल या किताब नहीं है. उसे देखना लोगों की समय काटने की मजबूरी नहीं. एक बार खरीद लिया तो किताब जैसा पढ़ो या ना पढ़ो, बिकने का काम तो हो गया, ऐसा भी नहीं. उन्हें एक ही चीज़ लोगों को बार बार दिखानी है, और लोग उस से खुद को रिलेट कर पायें ये बहुत जरूरी है.

कोक का प्रचार कर रहा व्यक्ति यूथ आइकॉन ना हो तो नहीं चलेगा. निरमा का प्रचार विमला जी ही कर सकती हैं. सनी लियॉन पूरे दिन चाहे मैनफ़ोर्स के ऐड में दिखें आप उनसे धूप-लोबान का प्रचार नहीं करवाते. रामानंद सागर वाली रामायण में जिसने सीता का किरदार निभाया था वो पहली ही फिल्म के आपत्तिजनक किरदार से ख़त्म हो गई थीं.

प्रचार के तीस सेकंड-एक मिनट के समय में ही वो पूरे किस्से सुना डालते हैं. मेरे जैसी तीन गज की पोस्ट भी नहीं लिखते. अभी टीवी पर देखने लायक कौन कौन से सीरियल आते हैं ये लोग भले ना बता पायें, पसंद और नापसंद वाले चार प्रचार जरूर गिना देंगे.

आजकल टीवी पर अमेज़न का एक प्रचार आता है. उसमें बहन अपने भाई को, या भाई अपने बहन को फोन करके किसी प्रोडक्ट के सस्ते होने का बताता है. वही जो “खरीद लो, खरीद लो” और “खरीद लिया, खरीद लिया” पर ख़त्म होता है. भाई बहन के भावनात्मक सम्बन्ध कैसे होते हैं, ये उस प्रचार में दिख जाता है. अमेज़न एक विदेशी कंपनी है जो भारतीय भावनात्मक संबंधों को अपने उत्पाद बेचने के लिए इस्तेमाल कर रही है. उसे ये भाई-बहन का रिश्ता बड़ी आसानी से दिख गया.

कितने मज़े की बात है कि नारीवाद, पुरुष प्रधान सम्बन्ध, शोषण, हक़ की लड़ाई, जैसे बड़े-बड़े जुमले उछालने वाले हिंदी साहित्यकारों ने कभी इसपर एक पन्ना भी नहीं लिखा! भारत सच में एक मज़ेदार देश है, इसके अवार्ड वापसी गिरोह के साहित्यकार, फ़िल्में-सीरियल बनाने वाले भी गजब के हैं.

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