Assume Consent : लड़की की ‘ना’ से ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि पुरुष ने क्या समझा!

Assume Consent

महमूद फारूखी, आमिर खान द्वारा निर्मित पीपली लाइव के सह निर्देशक थे. पिछले कुछ समय से बलात्कार के अपराध में 7 साल की सज़ा काट रहे थे. दस दिन पहले हाई कोर्ट ने इस सज़ा के खिलाफ उनकी अपील स्वीकार करते हुए उन्हें बरी कर दिया. बाइज्जत किया, ऐसा पता नहीं.

महमूद फारूखी के ऊपर अमेरिका की एक रिसर्च स्कॉलर के साथ शराब पीकर दुष्कर्म का आरोप था. ट्रायल कोर्ट ने उन्हें अपराधी मानकर 7 साल की सजा सुनाई. जिसके खिलाफ फारूखी ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की. दिल्ली हाई कोर्ट में उन्हें रिप्रेजेंट करने वाले वकीलों में प्रमुख वकील कपिल सिब्बल थे.

सिब्बल साहब ने फारूखी के बचाव में सबसे प्रमुख तर्क ये दिया – महमूद फारूखी बाइपोलर डिसऑर्डर (एक्स्ट्रीम मूड स्विंग) का शिकार था. उसकी मित्रता इस लड़की से हुई जो फारूखी के पास नाथ संप्रदाय के बारे में जानने आयी थी. घटना की शाम फारूखी नशे की हालत में था.

फारूखी लड़की की ना को नहीं समझ सका. कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि नशे की हालत में, पुरानी दोस्ती के चलते फारूखी लड़की की ना नहीं सुन सका और उसने लड़की की हाँ को Assume कर लिया.

Assume Consent

पिंक फिल्म बनी ही इसलिए थी कि लड़की की ना का अर्थ, ना होता है. निर्भया रेप केस के बाद बलात्कार कानून बदले गए और उसमे कंसेंट शब्द को फिर से परिभाषित किया गया था.

लेकिन अब ये Assume Consent.

लड़की की वकील वृंदा ग्रोवर ने हालाँकि इस तर्क का विरोध किया और कहा कि ये अपराध आरोपी की जबरदस्ती से हुआ है न कि मेन्टल कंडीशन की वजह से. लेकिन हाई कोर्ट जज आशुतोष कुमार ने लड़की के तर्कों को ख़ारिज कर दिया.

उन्होंने अपने जजमेंट में लिखा – बाइपोलर डिसऑर्डर एक खतरनाक मानसिक बीमारी है. हालाँकि फारूखी की मेन्टल कंडीशन कोई ग्राऊंड नहीं है उसके द्वारा किये गए अपराध को ख़ारिज करने का. लेकिन इस केस उसकी मानसिक अवस्था का रोल महत्वपूर्ण है.

कोर्ट ने कहा कि इसमें संदेह है कि फारूखी ने लड़की के द्वारा कम्युनिकेट की गयी ‘ना’ को समझा भी हो. माननीय कोर्ट ने कहा कि जब पहले से जान पहचान थी, पढ़े लिखे बड़े लोग हों, बुद्धिमान हों, तो ‘ना’ को ‘ना’ समझ पाना बहुत मुश्किल होता है.

माय लार्ड आशुतोष जी ने कहा लिटल रेसिस्टेन्स, नो रेजिस्टेंस, या फीबल नो समझना मुश्किल होता है. दुष्कर्म हुआ, लेकिन क्या उसमें लड़की की रज़ामंदी शामिल नहीं थी, कहना मुश्किल है? और अगर रज़ामंदी शामिल नहीं थी तो क्या फारूखी उस ‘ना’ को समझ पाया.

अदालत ने इस आधार पर फारूखी को रिहा कर दिया.

इसी फैसले के दो-तीन दिन पहले पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट ने तीन नौजवान छात्रों की बीस साल जेल की सज़ा को सस्पेंड करके ज़मानत पर रिहा कर दिया. ये लड़के सोनीपत की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के छात्र थे. इनमें से एक छात्र के पीड़िता से सम्बन्ध थे. शारीरिक भी. ब्रेकअप के बाद लड़के ने पीड़िता को उसकी तस्वीरो के आधार पर ब्लैकमेल किया. बलात्कार किया और अपने दो दोस्तों को उसमें शामिल किया.

पीड़िता पुलिस में गयी. मुकदमा शुरू हुआ. ट्रायल कोर्ट ने तीनों को बीस साल कठोर कारावास की सज़ा दी. तीनों ने हाई कोर्ट में अपील की. जज साहब… माननीय जज साहब के पास तर्क पहुंचे.

जज साहब ने शारीरिक संबंधों को लड़की का एडवेंचरिज्म माना. उन्होंने कहा कि पीड़िता की गवाही से पता लगता है कि उसकी लड़कों से कैजुअल रिलेशनशिप थी, पहचान थी, सेक्सुअल एनकाउंटर थे. सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट थे.

लड़की ने तर्क के जवाब में कहा कि उसे ब्लैकमेल किया गया. लेकिन जज साहब ने अपने फैसले में नयी जनरेशन के डिजनरेटिव माइंडसेट, शराब, ड्रग्स कैजुअल सेक्स को जिम्मेदार बताया. नयी पीढ़ी के इस एडवेंचरिज्म पर अफ़सोस जाहिर किया. बलात्कार पर अफ़सोस जताया. तीनों लड़कों के आने वाले सुनहरी भविष्य की चिंता की.

लड़की को दस लाख मुआवज़े का आदेश देते हुए तीनों लड़कों की जेल की सज़ा सस्पेंड हो गयी. वो जेल से बाहर आ गए.

आज जब लड़किया बेहद तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं. हर क्षेत्र में आगे बढ़कर नेतृत्व कर रही हैं. शिक्षा में हैं, कारपोरेट वर्ल्ड में हैं. सेना, पुलिस में हैं. न सिर्फ रोज़गार के हर क्षेत्र में हैं, बल्कि हर तरह की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं.

लड़के लड़कियों के बीच वर्जनाएं टूट रही हैं. कभी लड़के ही सिर्फ गाली देते थे, शराब पीते थे. अब ये कॉमन है. सम्बन्ध दोस्ती से ऊपर जाते हैं. सही गलत की बात नहीं है.

क्या दोस्ती में आगे बढ़ने, रोजगार, शिक्षा में आगे आने का अर्थ ऐसे फैसले स्वीकार करना है?

जहाँ पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट के जज ने लड़की के चरित्र को दोषी ठहराया, भरी अदालत में अपने फैसले में उसे शर्मसार किया.

दिल्ली हाई कोर्ट ने मित्रवत संबंधों में हुए बलात्कार को साबित करने की पूरी जिम्मेदारी लड़की पर डाल दी.

साबित करो तुमने ‘ना’ कहा. और न सिर्फ ‘ना’ कहा बल्कि उसे स्पष्ट तरीके से पुरुष को कम्युनिकेट किया या नहीं, साबित करो. लड़की की ‘ना’ से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि पुरुष ने क्या समझा है.

आने वाले समय में ये Assume Consent न जाने कितने रेप केसेज़ में बचाव का आधार बनेगा. ये हाई कोर्ट के फैसले हैं जो आने वाले समय में नज़ीर बनेंगे. तमाम ऐसे केसेज़ में इनका रेफरेंस जायेगा.

लड़कियों के लिए नारी मुक्ति की लड़ाई बेहद मुश्किल हो सकती है. पर क्या उन्हें परवाह है. इन फैसलों के खिलाफ कहीं भी उनकी आवाज़ दर्ज़ है?

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