इस सवाल पर दोस्ती खराब होने की गारंटी भी है, और सच जवाब न मिलने की भी

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कोई मोमिन जब एकेश्वरवाद की बात करें तो बता दीजिये कि दरगाह पर सड़ता मुर्दा पूजना मूर्ति पूजा से भी बदतर है और वैसे भी, इस्लाम में भी मान्य नहीं, शिर्क कहलाता है जो इस्लाम का सब से बड़ा पाप है. कह दीजिये कि पहले अपने दरगाह मजार उखाड़ कर आएं, फिर हम हिंदुओं से बात करें.

वैसे भी, वे जो कहते हैं वो एकोपास्यवाद है और सच में देखें तो मोहम्मद-पूजन है क्योंकि हजरत मोहम्मद को माने बिना अल्लाह आप की नहीं सुनता. नहीं तो ईसाई और यहूदियों से झगड़े का कोई कारण नहीं था क्योंकि इस्लाम मूसा और ईसा को भी अल्लाह के रसूल मानता है.

पूरा झगड़ा बस उनके हजरत मोहम्मद को न मानने को ले कर है. दूसरी बात जिस पर मुसलमान चुप्पी साधे रहता है वो बात है कि आप हजरत मुहम्मद को मुफ्त में मान नहीं सकते. याने बस मानते रहे, श्रद्धा रखते रहे तो काम नहीं चलेगा, अगर आप कमाते हैं तो ज़कात वसूली जाएगी. अगर आप सक्षम हैं तो आप ज़कात न देने की सोच भी नहीं सकते.

ईसाई और यहूदियों से झगड़ा यही तो था कि उन्होने हजरत मोहम्मद को अपना प्रोफेट मानने से इनकार कर दिया और ऑफ कोर्स, ज़कात देने से भी.

खुलकर शेयर कीजिये, पूछिये अपने मुसलमान मित्रों से ये सवाल, वे बात बदल देंगे या चर्चा करने को साफ मना कर देंगे कि वे रिलीजन पर बात नहीं करते, उससे दोस्ती खराब हो जाएगी.

आप ने ज़िद की तो आप पर दोस्ती खराब करने का इल्ज़ाम लगा देंगे कि जब वे रिलीजन की बात डिस्कस नहीं करना चाहते तो आप ज़बरदस्ती कर रहे हैं, दोष आप का है. सब के सामने आप को बुरा भला कहा जाएगा और ऊपर से यह भी कहा जाएगा कि इसमें दोष आप का ही है.

लेकिन अगर आप इस्लाम के बारे में जानना चाहो, कुबूल करने की नीयत से, तो यही व्यक्ति आप को सभी कागज़ी अच्छाईयों के हवामहलों की सैर करा लाएगा. अगर आप ने इस्लाम कुबूल करके अपना दिमाग अरब में गिरवी रखने की गलती की तब बाद में आप को पता चलेगा कि मुसलमान होने का मतलब, इस्लाम का मेम्बर होना होता है और जब तक वो जिंदा है, रोज़ी कमाता है, उसको कंपलसरी मेम्बरशिप चार्जेस देने होते हैं जिन्हें ज़कात कहा जाता है.

और तब आप को पता चलेगा कि आप सरकार को रो-बिलखकर टैक्स चुकाते हैं और उसका आप को क्या फायदा हुआ उस पर और भी ज़ोर-शोर से विधवा विलाप करते हैं, लेकिन आप की दी हुई ज़कात का क्या हुआ या क्या होना चाहिए यह पूछने का आप को कोई अधिकार नहीं होता. और जो विनियोग होता है उससे आप सहमत नहीं है तो उसपर आपत्ति उठाने का अधिकार तो आप को बिलकुल नहीं होता.

और आप इस्लाम की मेम्बरशिप छोड़ भी नहीं सकते. मेम्बरशिप छोड़ने की सज़ा है और वो है मौत.

पूछिये अपने मुसलमान मित्रों से इनमें से एक भी बात झूठ है तो. हाँ, दोस्ती खराब होने की गारंटी है. सच जवाब न मिलने की भी.

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