सकल घरेलू उत्पाद बढ़ोत्तरी, sensex सूचकांक और देश की प्रगति : भाग 1

आधुनिक युग में हमारे देश की तरक्की को नापने का पैमाना सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और sensex बन कर रह गया है. परंतु क्या ये दोनों पैमाने सही अर्थों में देश की प्रगति को दर्शाते हैं? क्या इसमें कहीं कुछ विरोधाभास भी है? पूरा विश्व इस मापदंड पर कहाँ उतरता है?

आगे की बात पढ़ने से पहले समझ लें यदि आप इस लेख को उन्मुक्त विचार से देखें तो ही ठीक रहेगा. यदि आप यह समझें कि क्योंकि पूरा विश्व या तथाकथित आर्थिक जगत यही कहता और करता है तो हमें भी करना चाहिए तो शायद यह लेख आपके लिए उपयुक्त न होगा.

आइये अब ज़रा विस्तार से समझें. पहले sensex की बात करें. 90 के दशक में भारत में sensex लगभग 5000 के आसपास था और आज यह 25000 के पास है यानि लगभग 500 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. यदि इसे हम प्रतिवर्ष की औसत में देखें तो लगभग 20 प्रतिशत से अधिक है. वहीं आप सकल घरेलू उत्पाद को 6 से 8 तक नहीं ला पा रहे हैं.

अब यह भी समझें कि sensex क्या है. बाज़ार से पैसा लेने के लिए बड़ी कंपनी अपनी भागीदारी बेचती हैं. लोग पैसा लगाते हैं अब जितना उस कंपनी की तरक्की होगी उसके अनुपात में पैसा लगाने वाले को पैसा मिलेगा. यह तो है आध्यात्मिक सत्य, परंतु होता कुछ और ही है. यह पूरे share की कीमत कृत्रिम रूप मात्र 5 व्यक्ति मिल कर भी बढ़ा सकते हैं.

यही हुआ था जब हर्षद मेहता कांड हुआ था. परंतु कुछ वर्षों से बेनामी पैसा जिसे आप काला धन कहते हैं वह भी share market में लग सकता है और भारत सरकार ने नियम बना कर इसकी इजाज़त दी है और इसके रास्ते बनाए हैं. उस रास्ते का नाम है participatory notes. पूरे विश्व में इसकी व्यवस्था नहीं है केवल एक ही देश यह करता है जिसे हम भारत कहते हैं. अब यह कहने की आवश्यकता नहीं है इसमें इस रास्ते से पैसे लगाने वाले लोग ही इस नियम को बनाते हैं.

अक्तूबर 2007 में कुल sensex बाज़ार में, sensex एक ही सप्ताह में 13% तक कम हो गयी क्योंकि participatory notes बाज़ार से निकाल लिए गए.

अब आप बात करें यदि यह धांधली न भी हो तो आप जानिए भारत में 4% से भी कम लोग share market में पैसा लगाते हैं, जिसका अर्थ हुआ यदि कोई घपला नहीं हो तो भी देश के मात्र 4% लोगों की संपत्ति में sensex के नाम से 20% सालाना की बढ़ोत्तरी हो रही है.

अब आप कल्पना करें कि क्या मात्र 4% लोगों के लिए ही देश की तरक्की नापी जाएगी. अब आजकल सरकार भी mutual funds के रास्ते से share market के लिए लोगों को प्रोत्साहित करती है परन्तु जब तक यह पूर्णतया ईमानदार प्रक्रिया नहीं बनेगी, देश के आम आदमी के पैसा की सुरक्षा दांव पर ही रहेगी.

अब बात करें सकल घरेलू उत्पाद की. आइये सबसे पहले यह समझते हैं कि GDP या सकल घरेलू उत्पाद को नापा कैसे जाता है? इसके लिए एक बहुचर्चित समीकरण दिया जाता है जो है : Y = C + I + G + (X – I)

इसमें C का अर्थ है personal consumption अर्थात व्यक्तिगत खपत, I का अर्थ है investment या निवेश या और आसान शब्दों में आप ने जो पैसा आपने भविष्य के लिए कल-कारखानों या मशीनों में लगाया है, G का अर्थ है government expenses अर्थात सरकारी खर्चा जिसमें सरकार चलाने का खर्चा गिना जा सकता हैं.

इसमें सरकारी लोगों की तनख्वाह, सरकारी दफ्तरों के खर्चे इत्यादि जोड़ा जाता है. (X – I) का अर्थ है export minus import अर्थात विदेश व्यापार घाटा या मुनाफा. इसमें से सबसे आसान है सरकारी खर्चे को बढ़ाना. अब छटे या सातवें pay commission से सरकारी तनख्वाह को बहुत बढ़ा दिया गया.

देश की सरकार चलाने का खर्चा बढ़ गया. क्या इससे सरकार के काम करने की क्षमता मे कोई बढ़ोत्तरी हुई. पर इससे आपके सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी मानी जाएगी. यदि आपके देश में लोग बीमार हो कर दवाएं अधिक खाएं और अधिक इलाज करवाएँ तो GDP बढ़ेगी परंतु दूसरे शब्दों में देश और बीमार हो गया है.

यदि इस आंकड़े को सरकार, कंपनी, कृषि और अन्य में रखें तो सरकार का 21%, कंपनी का 15%, कृषि का 17% और 47% अन्य में आता हैं. अब इसके बारे में थोड़े विस्तार से समझेंगे. पर इसी भाग में यह ज़रूर समझें कि यह आंकड़ा कुछ गलत भी लगता है. सरकारी आंकड़ों में जहां 2012-13 मे इसका आंकड़ा 89.80 लाख करोड़ का था, आज 2016-17 में 168 लाख करोड़ हो चुका है. पिछले बजट के अनुसार. पाँच साल में लगभग 80% की बढ़ोत्तरी!!! अगले अंक में अधिक विस्तार से चर्चा.

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